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शायद आग़ाज़ हुआ फिर किसी अफ़साने का...

शकील बदायूंनी
                
                                                         
                            शकील बदायूंनी
                                                                 
                            

शायद आग़ाज़ हुआ फिर किसी अफ़साने का
हुक्म आदम को है जन्नत से निकल जाने का 

उनसे कुछ कह तो रहा हूं मगर अल्लाह न करे 
वो भी मफ़हूम न समझे मेरे अफ़साने का 

देखना देखना ये हज़रत-ए-वाइज़ ही न हों 
रास्ता पूछ रहा है कोई मैख़ाने का 

बेताल्लुक़ तेरे आगे से गुज़र जाता हूं 
ये भी एक हुस्न-ए-तलब है तेरे दीवाने का 

हश्र तक गर्मी-ए-हंगामा-ए-हस्ती है 'शकील'
सिलसिला ख़त्म न होगा मेरे अफ़साने का

साभार- कविता कोश 
9 वर्ष पहले

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