कुरुक्षेत्र के तृतीय सर्ग के तीसरे भाग में लिखा है कि
यहां बताया गया है कि किस प्रकार न्याय के लिए युद्ध करना बेहद ज़रूरी हो जाता है। वीर पुरुष युद्ध में जीतते हैं या मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। अधिक दया करने से या अत्याचार सहने करने से पौरुष की क्षति होती है। कई बार क्रोध अनिवार्य है। प्रभु राम तीन दिन तक समुद्र की विनय करते रहे कि वह उन्हें रास्ता दे सके लेकिन समुद्र की ओर से कोई जवाब नहीं आया। तब राम अधीर हो गए और अपना धनुष उठा लिया। तब समुद्र उनकी शरण में आ गिरा।
न्यायोचित अधिकार माँगने
से न मिलें, तो लड़ के,
तेजस्वी छीनते समर को
जीत, या कि खुद मरके।
किसने कहा, पाप है समुचित
सत्व-प्राप्ति-हित लड़ना ?
उठा न्याय के खड्ग समर में
अभय मारना-मरना ?
क्षमा, दया, तप, तेज, मनोबल
की दे वृथा दुहाई,
धर्मराज, व्यंजित करते तुम
मानव की कदराई।
हिंसा का आघात तपस्या ने
कब, कहाँ सहा है ?
देवों का दल सदा दानवों
से हारता रहा है।
मनःशक्ति प्यारी थी तुमको
यदि पौरुष ज्वलन से,
लोभ किया क्यों भरत-राज्य का?
फिर आये क्यों वन से?
पिया भीम ने विष, लाक्षागृह
जला, हुए वनवासी,
केशकर्षिता प्रिया सभा-सम्मुख
कहलायी दासी
क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल,
सबका लिया सहारा;
पर नर-व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा?
क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुए विनत जितना ही,
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।
अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है,
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।
क्षमा शोभती उस भुजंग को,
जिसके पास गरल हो।
उसको क्या, जो दन्तहीन,
विषरहित, विनीत, सरल हो ?
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रघुपति की विनय
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