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समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का

अकबर इलाहाबादी
                
                                                         
                            -अकबर इलाहाबादी-
                                                                 
                            

समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का 
'अकबर' ये ग़ज़ल मेरी है अफ़साना किसी का 

अल्लाह ने दी है जो तुम्हे चांद-सी सूरत
रौशन भी करो जाके सियहख़ाना[1] किसी का 

अश्क आंखों में आ जाएं एवज़ नींद के साहब 
ऐसा भी किसी शब सुनो अफ़साना किसी का 

इशरत[2] जो नहीं आती मेरे दिल में न आए 
हसरत ही से आबाद है वीराना किसी का

करने जो नहीं देते बयां हालत-ए-दिल को 
सुनिएगा लब-ए-ग़ौर से अफ़साना किसी का 

कोई न हुआ रूह का साथी दम-ए-आख़िर
काम आया न इस वक़्त में याराना किसी का 

हम जान से बेज़ार रहा करते हैं 'अकबर' 
जब से दिल-ए-बेताब है दीवाना किसी का

1.वीरान मकान 2.ख़ुशी
9 वर्ष पहले

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