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लड़कियों की सैलरी लड़कों के बराबर क्यों नहीं होती, जानिए अंदर की बात

Thu, 16 Apr 2015 12:12 PM IST
Updated Thu, 16 Apr 2015 12:12 PM IST
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salary difference between boys and girls

महिलाएं आज भले ही हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, लेकिन जब बात सैलेरी की आती है, तो वो खुद को पुरुषों के मुकाबले कमतर समझकर मोलभाव नहीं कर पाती हैं।

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नौकरी के लिए इंटरव्यू के दौरान जब भी बात सैलेरी की होती है, तो महिलाएं सामान्य से कम सैलेरी की मांग करती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह लैंगिक आधार पर आमदनी की खाई लगातार बढ़ रही है।
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एक ताजा अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है। पुरुषों की अपेक्षा ज्यादातर महिलाएं लगभग 5 गुना कम सैलेरी में काम करने को तैयार हो जाती हैं। फाइनेंस और एकाउंट्स के क्षेत्र में तो यह अंतर काफी ज्यादा देखने को मिलता है।

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कम सैलेरी मांगती हैं महिलाएं

salary difference between boys and girls

यह बात चौंकाने वाली है कि आज जब महिलाएं हर जगह बराबर की हिस्सेदार हैं, तो फिर सैलेरी के मामले में वो खुद को अपने पुरुष सहकर्मियों से कमतर क्यों समझती हैं? यही नहीं, कई मामलों में तो महिलाएं अपनी क्षमता को नजरअंदाज करके भी कम सैलेरी मांगती हैं।

महिलाओं द्वारा इस तरह से खुद को कमतर और हीन भावना से ग्रस्त समझने पर समाजशास्‍त्री भी हैरान हैं। Reed.co.uk ने लंदन में किए गए अध्ययन में पाया है कि नौकरी के लिए आवेदन करने वाली ज्यादातर महिलाएं औसतन 19,900 पाउंड सैलेरी की अपेक्षा रखती हैं। जबकि नौकरी की तलाश कर रहे पुरुष औसतन 23,800 पाउंड सैलेरी चाहते हैं।

हालांकि इंडस्ट्री के आधार पर सैलेरी की डिमांड अलग-अलग होती है। एकाउंटेंसी में महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा 29 प्रतिशत, बैंकिंग में 22 प्रतिशत, एनर्जी सेक्टर में 21 प्रतिशत और एजुकेशन सेक्टर में 18 प्रतिशत कम सैलेरी की मांग करती हैं। जबकि मैन्युफैक्चरिंग और लीगल सेक्टर में आमदनी से जुड़ा जेंडर गैप नौ प्रतिशत तक ही सीमित है।

अंधेरे में रखा जाता है महिलाओं को

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वहीं, आईटी और सिक्योरिटी इंडस्ट्री में महिलाएं ज्यादा सैलेरी की मांग करती हैं। यूके की मशहूर जॉब वेबसाइट रीड से जुड़े लिन कैहिलेन के मुताबिक ′हमारी रिसर्च महिला एवं पुरुषों की आमदनी से जुड़ी अपेक्षाओं में गहरे अंतर को बयां करती है। लेकिन, आप नई नौकरी की तलाश में हैं, तो लैंगिक आधार पर खुद को कमतर आंकना सही नहीं है।′

कई महिला वर्करों का यह भी कहना है कि उन्हें इस बात को लेकर अंधेरे में रखा जाता है कि उनके पुरुष सहकर्मियों की सैलेरी कितनी है। इस वजह से भी कई बार महिलाएं अपनी कार्यक्षमता का सही आकलन नहीं कर पाती हैं।

कैहिलेन के अनुसार ऑफिस में आपकी पहचान लैंगिक आधार नहीं, बल्कि आपके काम के आधार पर बनती है। इसलिए वाजिब सैलेरी की मांग करने से हिचकना नहीं चाहिए। आप अपनी मौजूदा नौकरी से खुश हैं, मगर सैलेरी कम होने से खुश नहीं है, तो एक कठिन दौर का सामना करने के लिए तैयार हो जाएं, जो सबकी जिंदगी में कभी न कभी जरूर आता है। महिलाएं भले ही पुरुषों की बराबरी कर रही हैं, लेकिन बात जब सैलेरी की आती है, तो ज्यादातर महिलाएं पुरुषों की तरह मोलभाव करने से चूक जाती हैं।

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