स्वतंत्रता सेनानी की विधवा को 30 साल तक कराया पेंशन का इंतजार
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मद्रास हाईकोर्ट ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को एक स्वतंत्रता सेनानी की विधवा के लिए पेंशन जारी करने का निर्देश दिया है। साथ ही महिला के आवेदन पर विचार के लिए तीन दशक से अधिक की देरी के लिए उसकी आलोचना की।
जस्टिस आर सुरेश कुमार ने कहा कि इतने समय तक आवेदन को लंबित रहने के लिए जिम्मेदार अधिकारी पदावनत के काबिल हैं। उन्होंने कहा कि या तो आवेदन पर 1973 में ही फैसला ले लिया जाना चाहिए था या तो इसे रद्द कर देना चाहिए। इससे आवेदनकर्ता या तो स्वतंत्रता सेनानी परिवार का सदस्य होने से पेंशन का लाभ उठा पाती या फिर वह इसे कानूनी ढंग से चुनौती दे सकती लेकिन लंबे वक्त तक आवेदन को लंबित रखना उचित नहीं था।
1973 से 2003 तक लंबित रखा गया आवेदन, 2003 में किया गया था खारिज
स्वतंत्रता सेनानी लक्ष्मणा थेवर की विधवा एल कथाई अम्माल पिछले 30 साल से पेंशन का इंतजार कर रही थी। आवेदनकर्ता के पति इंडियन नेशनल आर्मी के जवान थे जो मलयेशिया में आईएनए में शामिल हुए थे। बाद में उन्हें ब्रिटिश ने बंधक बना लिया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद लक्ष्मणा थेवर ने तमिलनाडु और केंद्र सरकार से स्वतंत्रता सेनानी पेंशन की मांग की लेकिन आवेदन पर विचार से पहले ही 1969 में उनकी मौत हो गई।
इसके बाद उनकी विधवा ने पेंशन की अपील की लेकिन केंद्र ने 1973 से 2003 तक आवेदन लंबित रखा और 2003 में इसे खारिज कर दिया। आवेदन को खारिज करने के आदेश को रद्द करते हुए जज ने केंद्र सरकार को आवेदन करने की तिथि से स्वतंत्रता सेनानी पेंशन स्वीकृति करने का निर्देश दिया।
साथ ही एरियर की गणना कर सालाना 6 फीसदी ब्याज दर के साथ भुगतान का आदेश दिया। जज ने अधिकारियों के लापरवाहीपूर्ण रवैये के चलते गृह मंत्रालय पर 10000 रुपये का जुर्माना लगाया और आदेश की कॉपी मिलने के दो महीने के अंदर यह राशि आवेदनकर्ता को देने का निर्देश दिया।