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सीबीआई इतनी कमजोर क्यों है कि जो चाहे इसे गिरफ्तार कर ले

Mon, 04 Feb 2019 10:51 AM IST
Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली 
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली  Published by: Jitendra Bhardwaj Updated Mon, 04 Feb 2019 10:51 AM IST
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Why CBI is so powerless that anybody can arrest him
सीबीआई अधिकारी को गिरफ्तार करके ले जाती बंगाल पुलिस - फोटो : PTI

पश्चिम बंगाल में सीबीआई को कोलकाता पुलिस ने ही गिरफ्तार कर लिया। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह एक बड़ी घटना है। इन सबके बीच एक सवाल खड़ा होना लाजमी है। ’क्या सीबीआई को तोता बनाने का नतीजा है पश्चिम बंगाल की घटना’। राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते सुप्रीम कोर्ट तक ने देश की केंद्रीय जांच एजेंसी को 'तोता' कह दिया। वजह, जिस एक्ट के तहत सीबीआई का गठन हुआ यानी ‘दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेबलिशमेंट एक्ट-1946’ में सीबीआई नाम ही नहीं लिखा है। जब यह संवैधानिक संस्था नहीं है तो फिर इसे पूर्ण स्वायत्तता कहां से मिलती। गोवाहाटी हाईकोर्ट 2013 के अपने एक फैसले में सीबीआई को असंवैधानिक करार दे चुका है। यह केस आज भी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है। चूंकि सरकार को स्टे मिल गया, इसलिए सीबीआई अपना काम कर पा रही है। आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल सीबीआई के मामले में केंद्र को दी अपनी सहमति वापस ले चुके है, इसके पीछे जांच एजेन्सी के पास संवैधानिक दर्जा न होना एक बड़ा कारण रहा है। 

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सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डॉ. एलएस चौधरी का कहना है कि गोवाहाटी हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में सीबीआई को असंवैधानिक करार दिया था। केंद्र सरकार ने तुरत-फुरत इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में नौ नवंबर 2013 को दूसरे शनिवार की छुट्टी के दिन स्टे ले लिया। खास बात, तब से लेकर आज तक सुप्रीम कोर्ट में वह अपील पेंडिंग है। सरकार हर बार नई तारीख ले लेती है। यही वजह है कि 'सीबीआई' तोते की छवि से बाहर नहीं निकल पाई। 
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दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेबलिशमेंट एक्ट-1946 में 'सीबीआई' कहीं नहीं लिखा है
   
अधिवक्ता डॉ. एलएस चौधरी बताते हैं, दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेबलिसमेंट (डीएसपीई) एक्ट-1946, के तहत सीबीआई के गठन या उसके अधिकार क्षेत्र की बात कही जाती है। खास बात है कि डीएसपीई एक्ट में 'सीबीआई' शब्द ही नहीं लिखा है। इस एक्ट में संशोधन हुए, मगर सीबीआई नाम फिर भी शामिल नहीं हो सका। संविधान के किसी भी चैप्टर में सीबीआई के गठन का कहीं कोई प्रावधान ही नहीं है। चौधरी के मुताबिक, यही वजह है कि 'केंद्रीय जांच एजेंसी' को आज भी संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं है। सीबीआई एक अप्रैल 1963 को एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के तहत बनी थी। 
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संविधान सभा के सदस्यों ने इस जांच एजेंसी बाबत क्या कहा था

संविधान सभा के सदस्य नजीरुददीन अहमद और डॉक्टर बीआर अंबेडकर ने सीबीआई जैसी संस्था होने की बात कही थी। उनका कहना था कि ऐसी एजेंसी केंद्र सरकार की ‘संघ सूची’ के विषयों में शामिल रहेगी। इसका कामकाज क्रिमिनल केस दर्ज करना या अपराधी को गिरफ्तार करना नहीं होगा। यह एजेंसी केंद्र सरकार के पास विभिन्न अपराधों की जो सूचनाएं आती हैं, उन्हें क्रॉस चैक कर सकती है। एजेंसी के पास अंतरराज्य अपराधों की तुलना कर उसकी रिपोर्ट केंद्र सरकार को देने का अधिकार था। पुलिस, जो कि 'राज्य सूची' का विषय है, उसकी तर्ज पर यह जांच एजेंसी न तो किसी को गिरफ्तार कर सकती है और न ही किसी से पूछताछ। आज सीबीआई द्वारा किसी को गिरफ़्तार करने, जांच करने या पूछताछ का जो भी अधिकार मिला है, वह डीएसपीई एक्ट के तहत संभव हो सका है। 

सीबीआई को लेकर गोवाहाटी हाईकोर्ट का फैसला, इसे ऐसे समझें

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डॉ. एलएस चौधरी, जिन्होंने सीबीआई की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी, के मुताबिक गुवाहाटी हाईकोर्ट ने छह नवंबर 2013 को अपने फैसले में कहा था कि सीबीआई संवैधानिक संस्था नहीं है। इसके पास किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार नहीं है। खास बात, हाईकोर्ट ने कहा, संविधान के अनुसार केंद्र सरकार ऐसी एजेंसी या फोर्स नहीं रख सकती। अदालत ने सीबीआई को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया था। अगर सीबीआई को पुलिस की तरह अधिकार देने हैं तो उसे संविधान की 'समवर्ती सूची' में शामिल करना होगा। 

थोड़ी मजबूती मिली, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं थमा

सुप्रीम कोर्ट ने विनीत नारायण मामले में सीबीआई निदेशक को थोड़ी मजबूती देने का काम किया। इस फैसले के बाद निदेशक का कार्यकाल न्यूनतम दो साल कर दिया गया। इसके बाद यह उम्मीद की गई कि अब जांच एजेंसी का निदेशक केंद्र सरकार के दबाव में आकर काम नहीं करेगा। सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद ही सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए एक चयन समिति का गठन हो सका। इसके बावजूद सीबीआई पर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप लगते रहे। पिछले साल आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल सरकार ने अधिकारिक तौर पर सीबीआई को राज्य में जांच करने और छापा मारने के लिये दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली है। इन राज्यों का आरोप था कि सीबीआई निष्पक्ष जांच एजेंसी नहीं है। यह एजेंसी सरकार के इशारे पर राजनीतिक विरोधियों को जानबूझकर प्रताड़ित करती है। 

सीबीआई को 'पिंजरे का तोता' क्यों कहा गया था

सीबीआई के पूर्व निदेशक सरदार जोगेंद्र सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था, जांच एजेंसी के पास एक वकील रखने का अधिकार तो है नहीं। गिरफ्तारी हो या चार्जशीट, हर बात के लिए सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती है। इस इंतजार में कई बार साक्ष्य नष्ट हो जाते हैं। अफसोस की बात है कि आजादी के इतने सालों बाद भी यह जांच एजेंसी डीएसपीई एक्ट के तहत चल रही है। सीबीआई को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने के लिए इसे संवैधानिक दर्जा देना होगा। इस एजेंसी को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने का एकमात्र यही तरीका है। डॉ. एलएस चौधरी कहते हैं कि दिल्ली हाईकोर्ट ने जयदेव बनाम भारत सरकार केस में कहा था, सीबीआई का अपना डायेक्टर प्रोसिक्यूशन होगा। बाद में जांच एजेंसी ने इसकी स्वायत्तता पर भी अंकुश लगाकर इसे पुलिस नियमों के मुताबिक काम लेना शुरु कर दिया। 

ऐसे मिल सकती है सीबीआई को पूर्ण स्वायत्तता

अधिवक्ता डॉ. एलएस चौधरी का कहना है कि सीबीआई को संवैधानिक दर्जा दिलाने के लिए सरकार को संविधान संशोधन करना होगा। इसके लिए दोनों सदनों में अलग-अलग दो तिहायी बहुमत से प्रस्ताव पास होना जरुरी है। सीबीआई के पूर्व निदेशक यूएस मिश्रा ने एक साक्षात्कार में कहा था, पूर्ण स्वायत्तता न होने के कारण जांच एजेंसी को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। पूर्व दूरसंचार मंत्री सुखराम के मामले में निदेशक को पीएम ने बड़ी मुश्किल से मिलने का समय दिया था। पूर्व निदेशक आरके राघवन ने भी स्वीकारा था कि जांच एजेंसी पर राजनीतिक दबाव रहता है। हर बात में मंजूरी लेनी पड़ती है, मामलों की जांच में देरी होती है, नतीजा कोर्ट की फटकार खाओ। इससे बचाव का एक ही तरीका है कि जांच एजेंसी को पर्याप्त स्वायत्तता और अधिकार दिए जाएं। 
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