अपने ही बेटे से हारे मुलायम, जानिए उनके राजनीतिक सफर की पूरी कहानी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
77 साल के मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी के संस्थापक हैं। उस समाजवादी पार्टी के जिसने 2012 में उ.प्र. में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। इस सरकार में उनके पुत्र अखिलेश यादव राज्य के मुख्यमंत्री बने और अभी भी हैं, लेकिन कहते हैं समय सबका इतिहास लिखता है।
समय ने मुलायम सिंह का भी इतिहास लिख दिया है। जीवन भर राजनीति के अखाड़े में कभी मात न खाने वाले मुलायम ने चुपचाप हर जंग तो जीत ली, लेकिन अपने ही घर में चित हो गए।
वह अपने पुत्र और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, अपने ही चचेरे भाई रामगोपाल यादव से राजनीतिक लड़ाई हार गए। राजनीति से संन्यास लेने की उम्र में मुलायम के हाथ से उनके अपनों ने ही न केवल राजनीति पार्टी ही नहीं, बल्कि चुनाव चिन्ह समेत सबकुछ छीन लिया। जबकि मुलायम ने इससे पहले राजनीतिक जीवन में कभी हार नहीं मानी। हर जंग लड़े और जीतते चले गए।
सहयोगी परास्त, माने लोहा
मुलायम सिंह यादव के कभी कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया बहुत करीबी थे, लेकिन मुलायम ने समय आने पर उनसे चुपचाप दूरी बना ली। इसके बाद मुलायम ने जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। नए साथी मिलते गए, कारवां बनता गया।
पैदल, साइकिल, मोटर साइकिल, गाड़ी, रेलगाड़ी मुलायम पूरे उ.प्र. में घूमते रहे। सैफई, एटा, इटावा,मैनपुरी, कन्नौज से बाहर निकलकर धीरे-धीरे मुलायम गोरखपुर से गाजियाबाद तक अपना राजनीतिक साम्राज्य फैलाते चले गए। डीपी यादव से लेकर न जाने किस-किस का साथ मिला। राम शरण यादव से लेकर तमाम साथी आए।
1987 में बोफोर्स घोटाले की आवाज उठाने के बाद वह वीपी सिंह के संपर्क में आए। संयुक्त मोर्चा का गठन हुआ। 1989 में उ.प्र. में सरकार बनी। वीपी सिंह का चुपचाप सहयोग पाकर मुलायम सिंह यादव उ.प्र. में अपनी ताकत दिखाकर मुख्यमंत्री हो गए। उनके राजनीतिक गुरू चौधरी चरण सिंह के बेटे चौधरी अजीत सिंह टापते रह गए। आज भी चौधरी अजीत सिंह को 1989 में मिले झटके का दर्द सालता है।
वीपी, चंद्रशेखर भी फेल
राजनीति के जानकार बताते हैं कि मुलायम सिंह ने आगे भी अपना राजनीति में विजयी दौर जारी रखा। आरक्षण के आंदोलन में जाति उभरी। संयुक्त मोर्चा की केन्द्र में सरकार अल्पमत में आई। प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देते ही वीपी सिंह पीछे छूट गए। चंद्रशेखर और समाजवादी जनता पार्टी उनका नया ठिकाना बना।
चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने और बस बात कुछ महीनों की थी। मुलायम ने 1992 में समाजवादी पार्टी बनाई। समय का पहिया आगे बढ़ा। मुलामय समाजवादी पार्टी के संस्थापकों में से एक केवल जनेश्वर मिश्र से अलग नहीं हो पाए। बाकी बेनी, आजम सब नाराज हुए, पार्टी छोड़ी और फिर पार्टी में आए।
हमेशा अपनी औकात में रहे। बेनी को अपने बेटे राकेश वर्मा को ही टिकट दिलाने, मंत्री बनवाने की छूट मिलती रही तो आजम की पत्नी इस बार राज्यसभा सांसद हैं। इतना ही नहीं अमर सिंह को भी समाजवादी पार्टी छोड़नी पड़ी और खुद को धुर समाजवादी कहने वाले राजबब्बर भी कांग्रेस में हैं। मुलामय के परिवार से दर्जन भर से अधिक लोग समाजवादी पार्टी का हिस्सा बने और सबसे बड़ा राजनीतिक परिवार बन गया।
राजनीतिक दलों को भी छकाया
1992 में बसपा के साथ मुलायम ने सरकार बनाई। जब बसपा नेता मायावती ने समर्थन वापस लिया तो गेस्ट हाऊस कांड हो गया। जगदंबिका पाल के नेतृत्व में एक दिन की सरकार बनवाने में भी मुलायम ही शिल्पी थे। भाजपा के सहयोग से 2003 में मुलायम ने उ.प्र. में सरकार बनाई।
जबकि भाजपा से उनका हमेशा 36 का राजनीकि समीकरण रहा। मुलायम ने सोनिया गांधी का विदेशी मूल के मुद्दे पर विरोध किया और 2008 में यूपीए-1 सरकार को अल्पमत के दौरान समर्थन दिया। इतना ही नहीं बाद में इसे बड़ी राजनीतिक भूल भी बताया।
मुलायम की समाजवादी पार्टी का उदय कांग्रेस के विरोध की राजनीति पर टिका रहा, लेकिन पिछले डेढ़-दो दशक से मुलायम की समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच चुनावी गठबंधन की सिर्फ चर्चा हुई। कभी गठबंधन नहीं हुआ। तभी तो समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह कहते हैं कि उनके डीएनए में कांग्रेस का विरोध है।
मुलायम का सफर
इटावा के सैफई गांव के साधारण से परिवार से उ.प्र. की राजनीति में शीर्ष पर पहुंचे मुलायम आगरा विश्वविद्यालय से एमए हैं। जैन इंटर कालेज, करहल(मैनपुरी) से बीटी करने के बाद उन्होंने कुछ सालों तक अध्यापन भी किया है।
1967 में मुलायम सिंह यादव पहली बार विधायक और मंत्री भी बने। इसके बाद 5 दिसंबर 1989 को मुलायम पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। अब तक तीन बार वह मुख्यमंत्री बन चुके हैं। वह केंद्र में रक्षा मंत्री रह चुके हैं। शुरुआती दिनों में मुलायम सहकारी बैंक के निदेशक भी रहे।
मुलायम ने अपना राजनीतिक अभियान जसवंत नगर विधानसभा सीट से शुरू किया और सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से आगे बढ़े। मंत्री बनने के लिए मुलायम सिंह यादव को 1977 तक का इंतजार करना पड़ा। केन्द्र और उ.प्र. में जनता पार्टी की सरकार बनी और वह राज्य सरकार में मंत्री बनाए गए। बाद में चौधरी चरण सिंह की पार्टी लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष बने। विधायक का चुनाव लड़े और हार गए। 1967, 74, 77, 85, 89 में वह विधानसभा के सदस्य रहे। 1982-85 में विधानपरिषद के सदस्य रहे। आठ बार राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे।