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कहां छुपा रही है एप्पल अपनी बेशुमार दौलत?

Mon, 27 Nov 2017 06:50 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Mon, 27 Nov 2017 06:50 PM IST
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Where is Apple hiding Uncountable wealth?
एप्पल
आप टैक्स क्यों चुकाते हैं? सरकार आप से टैक्स क्यों वसूलती है?
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अगर ये सवाल हैं तो जवाब ये है कि असल में आप से वसूला गया ये टैक्स सरकार आप की भलाई में ही खर्च करती है। अस्पताल, स्कूल और सड़कें बनाने में। जनता की मदद के लिए सरकार जो योजनाएं चलाती है, वो इसी टैक्स के पैसे से चलते हैं। सरकार सिर्फ आम जनता से टैक्स नहीं लेती। बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों, कंपनियों से भी टैक्स वसूला जाता है। लेकिन बहुत से ऐसे लोग, ऐसी कंपनियां हैं, जो तरह-तरह के नुस्खे आजमा कर, गलत-सही काम कर के टैक्स बचाती हैं, टैक्स की चोरी करती हैं। इसके लिए फर्जी कंपनियां बनाई जाती हैं। विदेशों में निवेश दिखाया जाता है। कंपनी में घाटा दिखाया जाता है ताकि सरकार को टैक्स न देना पड़े।

पिछले कुछ सालों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए लीक से टैक्स चोरी के ऐसे बड़े राजों पर से पर्दा उठा है। पनामा पेपर्स से लेकर पैराडाइज पेपर्स तक इन सनसनीखेज दस्तावेजों के सामने आने से बहुत से लोग बेनकाब हुए हैं। अमरीका से लेकर हिंदुस्तान और चीन तक, बहुत से सफेदपोशों के गुनाहों से पर्दा हटा है। बहुत-सी कंपनियों के कारनामे सामने आए हैं। मार्च 2014 में बहुत-सी जगहों पर एक ई-मेल पहुंचा था। ये ई-मेल ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स, द कैमन आइलैंड्स, बरमूडा, मॉरीशस, द आइल ऑफ मैन, जर्सी और गर्नसे- जैसे देशों को भेजे गए थे। ये सभी जगहें टैक्स हेवेन, यानी टैक्स से बचत चाहने वालों के लिए जन्नत कही जाती हैं।
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Where is Apple hiding Uncountable wealth?
एप्पल
14 सवालों वाले ये ई-मेल भेजने वाली कंपनी का नाम था, एप्पल। दुनिया की सबसे मुनाफे वाली कंपनी। एप्पल ने इन देशों से पूछा था कि उनके यहां निवेश करने से उसका कितना टैक्स बचेगा? कितने तरह के फायदे होंगे? यानी एप्पल जैसी अरबों डॉलर का मुनाफा कमाने वाली कंपनी भी टैक्स बचाने के रास्ते तलाश रही थी। पूरी दुनिया में ये खबर आग की तरह फैल गई थी। सुर्खियां बनी थीं कि एप्पल टैक्स देने से बचती है।

एप्पल कोई पहली कंपनी नहीं जो टैक्स बचाने के तरीके तलाश रही थी। बहुत सी बड़ी कंपनियां और बड़े कारोबारी ऐसे तरीकों की तलाश में रहते हैं। ये लोग मॉरीशस से लेकर ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स तक तमाम ऐसी जगहों में निवेश दिखाते हैं जहां टैक्स कम है, या नहीं के बराबर है। यूं तो टैक्स चोरी करने वालों की हमारे प्रति कोई सीधी जवाबदेही नहीं बनती। मगर, जब ये टैक्स चोरी करते हैं, तो उसका असर जनता के ऊपर पड़ता है। देश की तरक्की में खर्च करने के लिए पैसे कम आते हैं। सरकार को आमदनी बढ़ाने के लिए जनता पर टैक्स लगाना पड़ता है। आखिर क्या वजह है कि एप्पल जैसी कंपनियां कम टैक्स भरती हैं? आखिर क्यों बड़े उद्योगपति और कंपनियां, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का फायदा उठाकर आमदनी पर टैक्स देने से बच जाते हैं?


बीबीसी की रेडियो सिरीज 'द इन्क्वायरी' में रूथ एलेक्जेंडर ने इस बार इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की। रूथ ने इस सिलसिले में दुनिया भर के कई एक्सपर्ट्स से बात की।
इनमें से पहले थे, अमरीका के अल्बर्ट मेयर। मेयर एक फोरेंसिक एकाउंटेंट हैं। उनकी पड़ताल से कई लोग जेल जा चुके हैं। मेयर ने जब एप्पल के बही-खातों की जांच की तो पता चला कि कंपनी कोई फर्जीवाड़ा नहीं कर रही है। वो कानूनन जितना टैक्स बनता है, वो चुका रही थी। मेयर के काम से खुद एप्पल कंपनी इतनी मुतासिर है कि उनके लेख कंपनी की तरफ से अपनी सफाई में पत्रकारों को भेजे जाते हैं।

अल्बर्ट मेयर कहते हैं कि अमरीका में एप्पल पर जितना टैक्स बनता है, कंपनी उसे पूरी ईमानदारी से भरती है। मेयर के मुताबिक एप्पल की कुल आमदनी का तीस फीसद हिस्सा अमरीका से आता है। अमरीकी टैक्स कानूनों के मुताबिक किसी कंपनी को अपने मुनाफे पर करीब 35 फीसद टैक्स देना पड़ता है। हालांकि अगर कंपनी रिसर्च और विकास के काम में कुछ खास रकम खर्च करती है, तो उसे टैक्स में छूट भी मिलती है। मेयर के मुताबिक, अमरीका में कंपनियों को औसतन करीब 31.9 प्रतिशत टैक्स भरना पड़ता है। एप्पल ये रकम पूरी ईमानदारी से सरकार के खजाने को देती है।

एप्पल की कमाई का सत्तर फीसद हिस्सा दूसरे देशों से आता है। जिन देशों से एप्पल को ये कमाई होती है, वहां के नियमों के मुताबिक कंपनी टैक्स भरती है। बची हुई रकम मुनाफे के तौर पर एप्पल के खाते में दर्ज होती है। फिर आखिर एप्पल कंपनी कम टैक्स क्यों देती है? अल्बर्ट मेयर कहते हैं कि कानूनन कंपनी को ज्यादा टैक्स देने की जरूरत ही नहीं। क्या ये वाकई पूरा सच है? अगर ये सच है, तो फिर एप्पल आखिर टैक्स बचाने के तरीके क्यों तलाश रही है?

कैसे करती थी एप्पल ये सब

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एप्पल
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए बीबीसी ने ईमर हंट से बात की। हंट आयरलैंड की राजधानी डब्लिन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय टैक्स कानूनों की लेक्चरर हैं। एप्पल कंपनी, लंबे वक्त से आयरलैंड में निवेश करती आई है। वजह ये है कि आयरलैंड में टैक्स की दरें बहुत कम हैं। अमरीका के मुकाबले करीब एक तिहाई। इसी वजह से एप्पल ने 1980 में ही आयरलैंड में कारोबार शुरू किया था। आज आयरलैंड में छह हजार लोग एप्पल के लिए काम करते हैं।

आयरलैंड ने विदेशी निवेश लुभाने के लिए 1950 के दशक में ही अपने टैक्स कानूनों को सरल कर दिया था। एप्पल सीधे निवेश के अलावा, आयरलैंड के रास्ते अपनी दूसरे देशो की आमदनी पर भी टैक्स बचाती है। ईमर हंट बताती हैं कि 1990 के दशक में एप्पल ने अपनी दो सहायक कंपनियां बनाई थीं। इन कंपनियों का कारोबार तो आयरलैंड में दिखाया गया था। मगर, इनका रजिस्ट्रेशन किसी भी देश में नहीं हुआ था। इन दोनों सहायक कंपनियों के पास ही एप्पल के बौद्धिक संपदा के अधिकार हैं। मतलब ये कि एप्पल की दो सहायक कंपनियां एप्पल की सबसे कीमती चीज की मालिक हैं। वो आयरलैंड में काम करती हैं। मगर कोई टैक्स नहीं भरतीं।

आयरलैंड के टैक्स कानून में एक तरीका है जिसका नाम है-डबल आयरिश। यानी कोई कंपनी आयरलैंड में रजिस्टर्ड होकर, बाहर कारोबार कर सकती है। इस तरह से आयरलैंड में रजिस्टर्ड कंपनी को किसी और देश में कमाई करने पर आयरलैंड में कोई टैक्स नहीं भरना होगा। आयरलैंड के इस कानून का एप्पल ने जमकर फायदा उठाया था। आयरलैंड में रजिस्टर्ड सहायक कंपनियों के जरिए एप्पल मोटा मुनाफा कमा रही थी। दूसरे देशों से हो रही कमाई भी कंपनी इन्हीं सहायक कंपनियों की आमदनी में दिखा रही थी। लेकिन, टैक्स कानून में झोल की वजह से उसे कोई टैक्स नहीं भरना पड़ रहा था।

कई बरस बाद यूरोपीय यूनियन को एप्पल की ये चालाकी समझ में आ गई। यूनियन ने इसके खिलाफ जांच की। पता ये चला कि एप्पल तो अपनी आमदनी पर आयरलैंड को एक फीसद से भी कम टैक्स दे रही थी। यानी एप्पल ने कम टैक्स देने के लिए आयरलैंड में अपना ठिकाना बनाया। मगर, हद तो ये हो गई कि आयरलैंड में भी कंपनी कोई टैक्स नहीं दे रही थी। इस तरह एप्पल ने करीब 13 अरब यूरो का टैक्स बचाया था। अब ये मामला यूरोपीय अदालतों में चल रहा है।

एप्पल की 'चालाकी'

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एप्पल
एप्पल की चालाकी से सबक लेते हुए आयरलैंड ने 'डबल आयरिश' नियम को खत्म कर दिया है। आयरलैंड के इस कदम के बाद से ही एप्पल ने टैक्स बचाने के लिए नए ठिकाने तलाशने शुरू कर दिए। इसीलिए कंपनी ने वो ई-मेल तमाम देशों को भेजे थे, जिनका जिक्र हमने शुरुआत में किया था।

एप्पल का कहना है कि वो अपनी आमदनी पर करीब 21 प्रतिशत की दर से टैक्स देती है, हालांकि जानकार कहते हैं कि कंपनी महज 5 फीसद की दर से टैक्स दे रही है। ईमर हंट कहती हैं कि अमरीकी कानून के मुताबिक एप्पल ने अमरीका में टैक्स भरने के लिए कुछ रकम बचाकर रखी है। इसे ही वो ज्यादा टैक्स भरने के हवाले के सबूत के तौर पर पेश करती है। मगर, यहां भी झोल है। कंपनी, विदेश में होने वाला मुनाफा अमरीका लाती ही नहीं। जब पैसे अमरीका आएंगे ही नहीं, तो उन पर एप्पल को टैक्स भी नहीं देना पड़ेगा।

पत्रकार ली शेपार्ड साप्ताहिक मैगजीन टैक्स नोट इंटरनेशनल के लिए काम करती हैं। शेपार्ड पूरा मामला समझाती हैं। शेपार्ड कहती हैं कि एप्पल के पास विदेशों से हुए मुनाफे के करीब 250 अरब डॉलर की रकम है। ये रकम कहीं और नहीं बल्कि अमरीका के नेवादा में ही है। ये रकम एप्पल के हेज फंड में निवेश कर के रखी गई है। ली शेपार्ड कहती हैं कि बड़ी कंपनियों से लेकर अरबपति कारोबारी तक कोई भी टैक्स हेवेन यानी टैक्स बचाने के लिए जन्नत कही जाने वाली जगहों पर अपना पैसा नहीं रखते। मिसाल के तौर पर एप्पल ने अपनी विदेशों से हुई कमाई को अमरीका में अपने ही फंड के जरिए लगा रखा है। फिर भी अमरीकी सरकार उस रकम को छू तक नहीं सकती क्योंकि ये एप्पल की विदेशी सहयोगी कंपनियों का पैसा है।


शेपार्ड बताती हैं कि एप्पल बस अमरीकी टैक्स कानूनों में झोल का फायदा उठा रही है। अमरीका के टैक्स कानून वहां की कंपनियों को इस बात की इजाजत देते हैं कि वो जब तक चाहे विदेशों में अपनी आमदनी को स्वदेश वापस लाना टाल सकती है। एप्पल जैसी बहुत सी कंपनियां इस मुनाफे को अमरीका लाने का फ़ैसला अनंतकाल के लिए टाल देती हैं। अगर ये कंपनियां इस आमदनी को अमरीका लाने की औपचारिक घोषणा करती हैं तो उन्हें इस रक़म पर 35 फीसद की दर से टैक्स भरना होगा। मगर, विदेशी आमदनी को स्वदेश लाने का फैसला टालकर ये कंपनियां टैक्स में अरबों डॉलर बचा रही हैं।

ट्रंप प्रशासन

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एप्पल
इन कंपनियों को उम्मीद है कि डोनल्ड ट्रंप की सरकार जल्द ही अमरीका के टैक्स कानूनों में रियायत देगी। इससे उनकी टैक्स की देनदारी कम हो जाएगी। ट्रंप की सरकार अमरीका के टैक्स कानूनों में बड़े पैमाने पर बदलाव करने की तैयारी में है। कंपनियों के लिए टैक्स की दरें 35 प्रतिशत से घटाकर 20 फीसद तक लाने की तैयारी है। इससे एप्पल पर टैक्स का बोझ कम होगा।
साथ ही ट्रंप सरकार विदेशों में आमदनी पर एक बार टैक्स में छूट देने पर भी विचार कर रही है। इस आमदनी पर 10 फीसद की दर से टैक्स लगाया जाएगा। अगर ट्रंप सरकार ऐसा करती है तो एप्पल जैसी कंपनियों की तो बल्ले-बल्ले हो जाएगी।

पहले तो उन्हें घरेलू आमदनी पर कम टैक्स देना होगा। फिर उन्हें विदेश में हुई आमदनी पर भी कम टैक्स भरना पड़ेगा। यानी टैक्स चोरी करके भी एप्पल जैसी कंपनियां मुनाफे में ही रहेंगी। आगे चलकर तो अमरीकी सरकार विदेशों में होने वाली आमदनी पर कंपनियों को टैक्स से पूरी तरह छूट देने की तैयारी में है। लेकिन ली शेपार्ड को लगता है कि इससे कंपनियों का टैक्स चोरी करना रुकेगा नहीं। वो और भी नए-नए तरीक़ों से टैक्स बचाने की कोशिश करेंगी क्योंकि उन्हें पता है कि आखिर में सरकारें तो उन्हें रियायत देंगी ही। इसी उम्मीद में एप्पल और दूसरी कंपनियों ने विदेशों में हुई अपनी कमाई को अमेरिका लाना टाल दिया है।

कंपनियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस टैक्स चोरी को रोकने का एक ही तरीका है। दुनिया भर के तमाम देश इस बात के लिए एकजुट हों। टैक्स के नियम ऐसे हों कि कोई कंपनी एक देश का मुनाफा दूसरे देश में न दिखा सके। अमरीकी अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलित्ज इसीलिए काम कर रहे हैं। स्टिगलित्ज दो बार अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जीत चुके हैं। स्टिगलित्ज कहते हैं कि कंपनियों ने टैक्स बचाने का हुनर सीख लिया है। वो नया प्रोडक्ट बाद में लाती हैं। पहले टैक्स बचाने के तरीके तलाशती हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्टिगलित्ज़ जैसे कई अर्थशास्त्रियों ने मिलकर टैक्स चोरी रोकने के लिए एक आयोग बनाया है। वो उन कंपनियों से टैक्स वसूलने का तरीका तलाश रहे हैं, जो एक साथ कई देशों में कारोबार करती हैं। स्टिगलित्ज कहते हैं कि कनाडा और स्विटजरलैंड जैसे कई देशों ने अपने कानून बदलकर कंपनियों को सही तरीके से टैक्स भरने पर मजबूर किया है। खुद अमरीका ने इसके लिए अपने यहां कानून बदले हैं। हालांकि स्टिगलित्ज मानते हैं कि अभी कंपनियों की टैक्स चोरी रोकने के लिए बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।

लेकिन सवाल ये है कि क्या तमाम देश मिलकर एप्पल जैसी कंपनियों की चालाकी पर लगाम लगाएंगे?

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एप्पल
जोसेफ स्टिगलित्ज मानते हैं कि बात राजनैतिक इच्छाशक्ति पर टिकी है। वो कहते हैं कि एप्पल जैसी कंपनियां मुनाफे के लालच में अंधी हो गई हैं। यही वजह है कि आज कंपनियों की मुनाफाखोरी के चर्चे आम हैं। उनकी टैक्स चोरी की चालाकी पर से पर्दे उठ रहे हैं।

अमरीका हो या भारत, तमाम देशों की सरकारें इनके खिलाफ एक्शन लेने की बातें कर रही हैं। पर, कुल मिलाकर सच ये है कि झोल कानून में ही है। अपने यहां निवेश बढ़ाने के चक्कर में तमाम देश एप्पल जैसी कंपनियों को खुली बेईमानी का मौका देते हैं।

वो टैक्स नहीं भरतीं, क्योंकि उन्हें नियमानुसार टैक्स भरने की जरूरत ही नहीं है। नुकसान हमारा है। हमारी भलाई के काम में खर्च करने के लिए सरकार के पास पैसे ही नहीं होते। आम जनता पर टैक्स का बोझ बढ़ता है। वहीं एप्पल जैसी कंपनियां भारी मुनाफा कमाकर भी टैक्स देने से बच जाती हैं। जोसेफ स्टिगलित्ज कहते हैं कि वक़्त आ गया है कि इस पर लगाम लगाई जाए।
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