क्या दीवाली बना रही है हवा को जहरीला?
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क्या आप उत्तर भारत में दिल्ली-एनसीआर इलाके या उसके आस-पास रहते हैं? क्या पिछले कुछ दिनों में आपको सांस लेने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी है, खांसी बढ़ गई है और जुकाम भी बार-बार होने लगा है? और दीवाली के दिन, शाम या उसके बाद आपका घर से बाहर घूमने-फिरने का प्लान भी बन रहा है? अगर हाँ, तो हवा में बढ़े हुए प्रदूषण की वजह से थोड़ी ज्यादा तकलीफ उठाने के लिए भी कमर कस लें।
पर्यावरण मामलों की संस्था सीएसई की जाँच के अनुसार 7 से लेकर 24 अक्तूबर के बीच दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का स्तर 'काफी खराब' रहा है। विशेषज्ञ अनुमिता रॉय चौधरी के मुताबिक, "आने वाले दिनों में ये स्तर बढ़ सकता है क्योंकि दीवाली भी पड़ रही है।" दरअसल मामला सिर्फ दीवाली में जलने वाले पटाखे और उनसे होने वाले वायु प्रदूषण से कहीं बड़ा है।
दिल्ली से सटे राज्यों, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में फसल की कटाई के बाद खेतों में जलाए जाने वाले पुआल का भी इसमें खासा योगदान है। टॉक्सिक लिंक्स में वायु प्रदूषण मामलों के जानकार रवि अग्रवाल के मुताबिक स्थिति बेहद चिंताजनक है और इस समस्या का सीधा असर आपके स्वास्थ्य पर पड़ता है। उन्होंने बताया, "प्रदूषण के स्तर में पीएम-10 नामक कण की मात्रा इस धुएं के कारण बुरी तरह बढ़ती है और ये सीधे फेफड़ों पर असर करता है।"
पुआल जलाने की मजबूरी के अलावा कोई चारा नहीं
कुछ दिन पहले दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण के मामले पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने यूपी, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान सरकरों से पूछा था कि फसल जलाने ( क्रॉप बर्निंग) को लेकर उनकी क्या तैयारियां हैं। जबकि दिल्ली सरकार ने अदालत में पिछले कुछ वर्षों की सैटेलाइट तस्वीरें वाली एक रिपोर्ट पेश की जिसमें कथित तौर से क्रॉप बर्निंग को प्रदूषण या स्मॉग की बड़ी वजह बताया गया है।
हालांकि, अमृतसर, पंजाब में सरवन सिंह पंधेर जैसे किसान कहते हैं कि उनके पास फुआल जलाने की मजबूरी के अलावा कोई चारा नहीं। उन्होंने कहा, "किसान इस बात से अनभिज्ञ नहीं कि भूसे को जलाने से वायु प्रदूषण होगा। लेकिन कटाई अब मशीन से होती है और उसके बाद फुआल जलाना ही सबसे सस्ता विकल्प है। ऑप्शन भी नहीं है क्योंकि पहले से ही ज्यादातर किसान कर्जे में हैं।"
खेतों में क्रॉप बर्निंग के मामले पर सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल भी रोक लगा चुके हैं और इसके बाद से राज्य सरकारों ने भी इस पर सख्ती बरतनी शुरू की है। लेकिन मामला सिर्फ दूर-दराज के खेतों में जलाए जाने वाले पुआल का ही नहीं है और दिल्ली-एनसीआर में भी कूड़े को जलाने की समस्या अभी भी बनी हुई है।
स्कूली बच्चों के लिए एक कैंपेन पहले से जारी
इसी वर्ष जनवरी में सरकार ने ऐसा करने पर 15,000 से लेकर एक लाख रुपए तक का जुर्माना लगाने का नियम बनाया था लेकिन दिल्ली, नोएडा और गुड़गांव में अभी भी इसकी तमाम शिकायतें सुनाई पड़ती हैं। वायु प्रदूषण पर दिल्ली सरकार की गठित संस्था 'डायलॉग एंड डेवेलपमेंट कमीशन' के कोऑर्डिनेटर नमित अरोड़ा का मानना है कि इस तरह के मामलों में सरकरों को पहले विकल्प प्रदान करने चाहिए और उसके बाद नियमों का पालन करवाना चाहिए।
उन्होंने कहा, "स्कूली बच्चों के लिए एक कैंपेन पहले से जारी है जिसमें न सिर्फ वायु बल्कि ध्वनि प्रदूषण के भी नुकसान बताए जा रहे हैं। रहा सवाल धुएं से होने वाले वायु प्रदूषण का तो क्रॉप बर्निंग, कूड़ा जलाना और पटाखों से तो सबसे ज्यादा खतरा बना हुआ है। इन सभी वजहों से सल्फर जैसे जहरीले कण हवा में मिल जाते हैं जो स्वस्थ से स्वस्थ व्यक्ति को भी बीमार कर सकते हैं।"
इन तीनों कारणों को बढ़ावा देने का काम मौसम कर सकता है जिसमें वायु प्रदूषण से निजात मिलना फिलहाल तो मुश्किल लग रहा है। वजह है वेस्टरली या पश्चिम से चलने वाली हवाओं के बदले अब ईस्टरली यानी पूरब से चलने वाली हवाओं का आगमन हो चुका है।
जानकारों के मुताबिक इस मौसम में प्रदूषण के कण हवाओं में मिल कर ठहराव की स्थिति बना देते हैं जिससे खांसी और सांस लेने में दिक्कत हो सकती है और दमे की बीमारियां बढ़ सकती हैं। बहराल, अब जब दीवाली करीब है तो इस बात कि चिंता अपने चरम पर है कि वातावरण में प्रदूषण का स्तर क्या है। लेकिन असल चिंता ये भी है कि हर वर्ष दीवाली के पहले ही इस पर विचार ज्यादा क्यों होता है।