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क्या था खालिस्तान आंदोलन और कहां गए उसको शह देने वाले नेता

Thu, 29 Nov 2018 02:13 PM IST
न्यूज डेस्क, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, नई दिल्ली Updated Thu, 29 Nov 2018 02:13 PM IST
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What is khalistan movement and who is gopal singh chawla
श्रीगुरुद्वारा प्रबंधन समिति के अध्यक्ष के साथ खालिस्तान समर्थक गोपाल चावला - फोटो : Amar Ujala
अगर सबकुछ ठीक रहा तो 28 नवंबर की तारीख भारत और पाकिस्तान में लंबे समय तक याद रखी जाएगी। वजह है गुरुद्वारा करतारपुर साहिब को पंजाबी सिख धर्मावलंबियों के लिए खोला जाने का फैसला। दरअसल पाकिस्तान और भारत ने करतारपुर तक जाने वाले मार्ग को विशेष कॉरिडोर की शक्ल में विकसित करने का फैसला करते हुए इस पर कार्य शुरू कर दिया है।
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इस कॉरिडोर के शिलान्यास समारोह में भारत से दो केंद्रीय मंत्री और पंजाब के मंत्री तथा पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिद्धू ने शिरकत की। गौरतलब है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और नवजोत सिद्धू समकालीन क्रिकेट खिलाड़ी तथा मित्र हैं। इस कार्यक्रम में पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा भी मौजूद थे। साथ ही एक ऐसा व्यक्ति भी वहां था, जिसकी वजह से यह कॉरिडोर पहले दिन से ही सुर्खियों में आ गया है।
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यह शख्स है पाकिस्तान में सक्रिय खालिस्तानी आतंकी गोपाल सिंह चावला। यह वही चावला है जिसने अपने फेसबुक पेज पर सिद्धू को पाजी (पंजाबी में बड़े भाई को प्रा जी कहते हैं) लिखा है। 28 नवंबर को गोपाल सिंह पाक सेना प्रमुख बाजवा के साथ दिखाई दे रहा था। वहीं कुछ महीनों पहले मुंबई के 26/11 हमलों के साजिशकर्ता हाफिज सईद के साथ भी उसकी एक तस्वीर वायरल हो चुकी है।
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उल्लेखनीय है कि खालिस्तान मूवमेंट को भारत से पूरी तरह उखाड़ा जा चुका है। लेकिन पाकिस्तान और कनाडा आज भी इससे समर्थकों की तादाद बनी हुई है। पाकिस्तान तो इस आंदोलन का समर्थक माना जाता रहा है। करतारपुर साहिब कॉरिडोर के कार्यक्रम में गोपाल सिंह चावला की उपस्थिति से इसकी पुष्टि होती है। यही वजह है कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को यह चिंता सता रही है कि कहीं इस कॉरिडोर का उपयोग खालिस्तान के बीज दोबारा बोने के लिए न होने लगे। चावला पाकिस्तान पंजाबी सिख संगत का अध्यक्ष है और खालिस्तान का कट्टर समर्थक भी।

तो आइए जानते हैं कि आखिर क्या है यह पूरा खालिस्तान मसला

खालिस्तान को समझने के लिए यह जानना जरूरी है: 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश आजाद हुआ था और दो हिस्सों में बांटा गया था। इसी के साथ बंटा था पंजाब सूबा। जिसका बड़ा भाग पाकिस्तान के पास चला गया और कुछ हिस्सा हमारे पास बचा। बंटवारे के दौरान हिंदुओ और मुस्लिमों को जान-माल का बहुत नुकसान हुआ। लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान सिखों को हुआ। भारत के सिखों को और नए-नए बने पाकिस्तान के सिखों को। लाहौर, जो कभी सिख साम्राज्य की राजधानी था वो एक मुस्लिम राष्ट्र में चला गया। इससे आहत होकर फुसफुसाहट में ही सही सिखों की भी अलग राष्ट्र की मांग जोर पकड़ने लगी।

पंजाबी भाषी लोगों के लिए एक अलग राज्य की मांग की शुरुआत पंजाबी सूबा आंदोलन से हुई थी। यह पहला मौका था जब पंजाब को भाषा के आधार पर अलग दिखाने की कोशिश हुई थी। अकाली दल का जन्म हुआ और कुछ ही वक्त में इस पार्टी ने बेशुमार लोकप्रियता हासिल कर ली। अलग पंजाब के लिए जबरदस्त प्रदर्शन शुरू हुए और अंत में 1966 में ये मांग मान ली गई। भाषा के आधार पर पंजाब, हरियाणा और केंद्र शाषित प्रदेश चंडीगढ़ की स्थापना हुई।

आनंदपुर साहिब रेसोल्यूशन के नाम पर उठाई गई मांगें

  • हरियाणा में पंजाबी भाषी या सिख बाहुल्य जिलों को पंजाब को देना
  • चंडीगढ़ पूरी तरह पंजाब को देना
  • पंजाब में भूमि सुधार और औद्योगिकरण
  • पूरे देश में गुरुद्वारा समिति का निर्माण
  • फौज में सिखों की भर्ती अधिक से अधिक
हालांकि इस मांग को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह ‘देशद्रोही’ मांगें हैं। उन्होंने कहा था कि ये कोई ऑटोनोमी की मांग नहीं है, बल्कि उसकी आड़ में अलग देश की संरचना बनाने की योजना है।

'खालिस्तान' के तौर पर स्वायत्त राज्य की मांग ने 1980 के दशक में जोर पकड़ा। धीरे-धीरे ये मांग बढ़ने लगी और इसे खालिस्तान आंदोलन का नाम दिया गया। अकाली दल के कमजोर पड़ने और 'दमदमी टकसाल' के जरनैल सिंह भिंडरावाला की लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही ये आंदोलन हिंसक होता चला गया।

जरनैल सिंह भिंडरावाला के बारे में कहा जाता है कि वो सिख धर्म में कट्टरता का समर्थक था। सिखों के शराब पीने, बाल कटाने जैसी चीजों के वो सख्त खिलाफ था।

डीआईजी हत्या से बिगड़ा मामला

साल 1980-1984 के बीच पंजाब में आतंकी हिंसाओं ने जबरदस्त उछाल आया। 1983 में पंजाब के डीआईजी अटवाल की स्वर्ण मंदिर परिसर में ही हत्या कर दी गई। इसी साल से भिंडरावाला ने स्वर्ण मंदिर को अपना ठिकाना बना लिया था। सैकड़ों हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों से वो हमेशा घिरा रहता था, साथ ही हथियारों का जखीरा भी वहां जुटाया जाने लगा था। कह सकते हैं कि मंदिर को किले में तब्दील करने की तैयारी शुरू हो गई थी।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए सिरदर्द बने इस मुद्दे के कई विकल्प शुरुआत में तलाशे गए। भिंडरवाला को स्वर्ण मंदिर से निकालने की तैयारी की जाने लगी। 'ऑपरेशन सनडाउन' बनाया गया, 200 कमांडोज को इसके लिए ट्रेनिंग दी गई। लेकिन बाद में आम नागरिकों को ज्यादा नुकसान की आशंका के चलते इस ऑपरेशन को नकार दिया गया।

सिख संत से खालसा आतंकी बनने की कहानी

रणप्रिय सिखों में सेना के प्रति झुकाव कई बार उनके नाम से पता चल जाता है। जैसे- जरनैल सिंह, करनैल सिंह और मेजर सिंह आदि। जरनैल शब्द की उत्पत्ति सेना के पद जनरल से हुई है, उसी तरह करनैल शब्द कर्नल से आया है।

एक समय पंजाब को ब्रितानी-भारतीय सेना में भर्ती के लिए सबसे उपजाऊ जमीन माना जाता था। ये एक अजीब इत्तेफाक है कि जिस व्यक्ति को 1980 के दशक में सिख चरमपंथ का जन्मदाता माना जाता है, उनके माता-पिता ने उनका नाम जरनैल सिंह रखा था।

जरनैल सिंह के नाम के साथ भिंडरांवाले तब जुड़ा जब वो अपेक्षाकृत कम उम्र में सिख धर्म और ग्रंथों के बारे में शिक्षा देने वाली संस्था-दमदमी टकसाल का अध्यक्ष चुना गया था। 

भगत सिंह और संत भिंडरांवाले

भिंडरांवाले का रहस्यपूर्ण, लेकिन असाधारण तरीके से प्रमुखता में आना पंजाब में 'मुक्ति' की सबसे भीषण लड़ाई के बारे में काफी कुछ बताता है और इस लड़ाई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिख सुमदाय से जोड़कर भी देखा जाता है।

दमदमी टकसाल के अध्यक्ष का पद

उस समय कोई इस बात की कल्पना नहीं कर सकता था कि 30 वर्ष की आयु में जिस भिंडरांवाले ने दमदमी टकसाल के अध्यक्ष का पद ग्रहण किया था। अगले कुछ महीनों में ऐसी नई परिकल्पना को हवा देगा कि इस सीमांत प्रांत में अप्रत्याशित उथल-पुथल पैदा हो जाएगी। फिर ये उथल-पुथल एक दशक से अधिक तक चली और इस दौरान निर्दोष लोगों समेत हजारों की जान चली गई। 

निरंकारियों से टकराव

वर्ष 1977 में उसे दमदमी टकसाल का प्रमुख नियुक्त किए जाने के साक्षी, उस समय के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और सिखों की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष गुरचरण सिंह तोहड़ा थे, जो अपनी शुभकामनाएं देने के लिए वहीं मौजूद थे।

क्या है दमदमी टकसाल

दमदमी टकसाल एक सिख शैक्षिक संगठन है। जिसका मुख्यालय अमृतसर से 25 मील दूर चौक मेहता शहर में स्थित है।


भिंडरांवाले की नियुक्ति के तुरंत बाद उस इलाके में राजनीतिक विमर्श बदलने लगा। जिस समय भिंडरांवाले ने दमदमी टकसाल के अध्यक्ष का पद ग्रहण किया था, उस समय दमदमी टकसाल का सीधा टकराव निरंकारियों से हो चुका था।

प्रदर्शनकारी दमदमी टकसाल और अखंड कीर्तनी जत्थे से संबंधित थे। वर्ष 1978 की खूनी वैशाखी की घटना के बाद पंजाब जैसे हमेशा के लिए बदल गया, दोबारा पहले जैसा कभी नहीं हो पाया।

ऑपरेशन ब्लू स्टार

आखिर में इंडियन आर्मी ने 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' को अंजाम दिया गया। 1 से 3 जून 1984 के बीच पंजाब की रेल, रोड और एयर ट्रांसपोर्ट सर्विस को रोक दिया गया। स्वर्ण मंदिर में पानी और बिजली की सप्लाई काट दी गई। स्वर्ण मंदिर के अंदर 6 जून 1984 को व्यापक अभियान चलाया गया, भारी गोलीबारी के बाद जरनैल सिंह भिंडरवाला का शव बरामद कर लिया गया। 7 जून 1984 को स्वर्ण मंदिर पर भारतीय सेना का नियंत्रण हो गया।

इस ऑपरेशन के बाद सिख समुदाय के लोग इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ जबरदस्त गुस्से में थे, कैप्टन अमरिंदर सिंह समेत कई सिख नेताओं ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। खुशवंत सिंह समेत कई लेखकों ने अपने अवॉर्ड वापस कर दिए थे।

महज 4 महीने बाद ही 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही 2 सिख सुरक्षाकर्मियों ने कर दी थी।

 

खालिस्तान आंदोलन यहीं खत्म नहीं हुआ, इसके बाद से कई छोटे-बड़े संगठन बने। 23 जून 1985 को एक सिख राष्ट्रवादी ने एयर इंडिया के विमान में विस्फोट किया, 329 लोगों की मौत हुई थी। दोषी ने इसे भिंडरवाला की मौत का बदला बताया।

 

10 अगस्त 1986 को पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल एएस वैद्य की दो बाइक सवार बदमाशों ने हत्या कर दी थी। वैद्य ने ऑपरेशन ब्लूस्टार को लीड किया था। इस वारदात की जिम्मेदारी खालिस्तान कमांडो फोर्स नाम के एक संगठन ने ली थी। 31 अगस्त 1995 को पंजाब सिविल सचिवालय के पास हुए बम विस्फोट में पंजाब के तत्कालीन सीएम बेअंत सिंह की हत्या कर दी गई थी। ब्लास्ट में 15 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।

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