फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   hat do the ancient texts, the traditions, on the meat sauces of Indians?

भारतीयों के मांसाहार पर प्राचीन ग्रंथ, परंपराएं क्या बताती हैं?

Tue, 28 Mar 2017 12:56 PM IST
पुष्पेश पंत / फूड एक्सपर्ट, बीबीसी हिंदी के लिए
पुष्पेश पंत / फूड एक्सपर्ट, बीबीसी हिंदी के लिए Updated Tue, 28 Mar 2017 12:56 PM IST
विज्ञापन
hat do the ancient texts, the traditions, on the meat sauces of Indians?
दिल्ली के आसपास के इलाके की पुरानी कहावत है- माँस बिना सब घास रसोई! इस घड़ी जब देश की सबसे बड़ी आबादी वाले प्रदेश में कसाईखाने ताबड़तोड़ युद्ध स्तर पर बंद कराए जा रहे हैं, हम कुछ घबराए यह सोचने को मजबूर हो रहे हैं कि आने वाले दिन घास-फूस की जुगाली करते ही बिताने पड़ सकते हैं।
विज्ञापन


भारत में मांसाहार के बारे में प्रचलित मिथकों की वजह से कसाईखानों की तालाबंदी के बारे में ठंडे दिमाग से बहस करना लगभग असंभव हो गया है। ज्यादातर लोग यह मानने को तैयार नहीं कि हिंदुस्तान की आबादी का बड़ा हिस्सा शुद्ध शाकाहारी नहीं है।
विज्ञापन


जैन, कुछ ब्राह्मण और वैश्य ही इस श्रेणी में रखे जा सकते हैं। कश्मीर के तथा मिथिला के ब्राह्मणों के पारंपरिक भोजन में सामिष व्यंजनों की लंबी सूची है। सागर तटवर्ती प्रदेश के निवासी सारस्वत ब्राह्मण तथा ओड़िया ब्राह्मण भी चाव से मांसाहार करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

माँस के गुण-दोष

hat do the ancient texts, the traditions, on the meat sauces of Indians?
कट्टर वैष्णवों के अलावा बंगाल और असम के शक्ति के उपासक माँस को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। राजस्थान में 'शूले' दहकते अंगारों पर भुने सींक कबाब की याद दिलाते हैं और 'खड खरगोश' अवधी जमींदोज मछली का रिश्तेदार लगता है।

नाम भले 'शामी' न हो, संस्कृत की पुस्तकों में जिस मसालेदार 'भद्रितक' का जिक्र मिलता है वह गोलाकार टिकिया की शक्ल में माँसाहारी कबाब ही थे। माँस और मसालों के साथ घी में तले चावलों के 'पुलाव' से भी हिंदुस्तानी परिचित थे।
 

तंदूरी मुर्ग

hat do the ancient texts, the traditions, on the meat sauces of Indians?
पारसी रसोई में विभिन्न देशी-विदेशी पाक शैलियों का अनोखा संगम देखने को मिलता है। साली बोटी, धानसाक, जड़दालू गोश्त इसकी मिसाल हैं। पंजाब फख्र करता है तंदूरी मुर्ग की ईजाद पर तो साग गोश्त के चाहने वाले जात धर्म के आधार पर बाँटे नहीं जा सकते।

यह बात दोहराने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि इससे यह नतीजा निकालने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए कि हमारे देश में सभी लोग हमेशा गोश्त ही खाते रहते थे। हाँ, साधन संपन्न वर्ग की पौष्टिक स्वादिष्ट खुराक का हिस्सा माँस-मछली सदा से रहे हैं।

ईसा के जन्म से कई सौ साल पहले सोलह महाजनपदों के काल में जब बुद्ध उपदेश दे रहे थे और हिंसक वैदिक कर्म कांड को त्याग जनसाधारण उनकी ओर खिंच रहा था तब भी मठों में रहने वाले भिक्षु ही शाकाहारी थे। आबादी का बड़ा हिस्सा चाव से माँस खाता था।
 

महाभारत

hat do the ancient texts, the traditions, on the meat sauces of Indians?
स्वयं बुद्ध का देहांत भिक्षा पात्र में मिले दूषित मांस के कारण हुआ था, ऐसा माना जाता है। जातक कथाओं में राजपरिवारों एवं अमीर व्यापारियों के घरों का जो बखान मिलता है उससे यही बात पता चलती है। अहिंसा का संकल्प लेने के बाद भी सम्राट अशोक के महल में परंपरा के निर्वाह के लिए माँस पकता था इसका जिक्र उसके शिलालेखों में दर्ज है।

महाभारत का रचनाकाल चौथी सदी ईस्वी पूर्व से चौथी सदी ईस्वी के बीच माना जाता है। इसमें भारत वर्ष के अनेक प्रदेशों के निवासियों की रोजमर्रा की जिंदगी की झलकियों के साथ-साथ त्योहारों, शादी ब्याह के मौकों पर पकाए, खाए जाने वाले पकवानों का जो वर्णन मिलता है

उससे भी यही साबित होता है कि देश भर में माँस खाया जाता था। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के वक्त जो राजा महाराजा इंद्रप्रस्थ पहुँचे उनकी खातिरदारी में पेश माँस की कई किस्म के व्यंजनों का बखान सुलभ है।

शाकाहार या मांसाहार

hat do the ancient texts, the traditions, on the meat sauces of Indians?
दिलचस्प बात यह है कि कई जगह ब्राह्मण मेहमानों के लिए तैयार किए जाने वाला भोजन भी पूर्णत: शाकाहारी नहीं होता था। क्षत्रिय शासक ही नहीं, वनवासी आदिवासी भी माँसाहारी रहे हैं। राजसिक और तामसिक मिजाज के व्यक्ति अपने स्वभाव और प्रकृति के मुताबिक इच्छानुसार शाकाहार या मांसाहार करने को स्वतंत्र थे।

जिन सात्विक लोगों के लिए माँस वर्जित समझा जाता था वह भी दूसरे आहार के अभाव में आपत्धर्म के अनुसार माँस खा सकते थे। ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार यह घोषणा जायज नहीं कि गोश्तखोरी को किसी मजहब या संप्रदाय विशेष के साथ जोड़ा जा सकता है।

हैदराबाद की बिरयानी

hat do the ancient texts, the traditions, on the meat sauces of Indians?
यह जरूर सच है कि बहुसंख्यक आबादी के लिए वर्जित गोमांस खाने से परहेज न करने वाले मुसलमानों और बाद में अंग्रेज (अन्य यूरोपीय) ईसाइयों के आगमन के बाद ही मांसाहार को 'फिरंगी विधर्मियों' के साथ जोड़कर दूषित समझने वाली मानसिकता प्रबल हुई। हिंदुस्तान के अलग-अलग प्रदेशों के निवासी अपनी सांस्कृतिक विरासत में अपने खान-पान को प्रमुख स्थान देते आए हैं। कश्मीर में वाजवान की दो धाराएँ देखने को मिलती हैं।

पंडित वाजवान माँसाहारी व्यंजनों में मुसलमान वाजवान से होड़ लेता है। अवध के गलौटी काकोरी कबाब, दम पुख्त, दिल्ली का इष्टू और पसंदे और हैदराबाद की बिरयानी, हलीम और दाल्चा गोश्त इन जगहों की देखने लायक इमारतों या संगीत और साहित्य से कम दिलकश नहीं। स्थानीय पहचान इन व्यंजनों के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी है। फिर एक बार सतर्क रहने की जरूरत है।माँसाहारी खाना सिर्फ तुर्कों- अफगानों और मुगलों की देन नहीं।

आज से हजार साल पहले चोल सम्राट दक्षिण पूर्व एशिया तक पहुँच चुके थे। उस वक्त के चेट्टियार नाविक सौदागर शौक से कई किस्म के सूखे और तरीवाले माँसाहारी व्यंजन खाते थे। वास्तव में अंग्रेजी का 'करी' शब्द तमिल 'कारी' का ही अपभ्रंश है। तमिलनाडु के सौदागर दो हजार साल पहले रोम के साथ व्यापार कर रहे थे और मलाबार तट अरब जगत से आने वाले व्यापारियों के संपर्क में रहा है। यह सोचना तर्क संगत नहीं कि यह आदान-प्रदान शुद्ध शाकाहारी रहा है!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed