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क्या भारत-चीन युद्ध के कगार पर खड़े हैं
बीबीसी हिन्दी
Updated Thu, 20 Jul 2017 09:29 PM IST
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modi, Xi Jinping
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दोनों ही देशों के बीच जबानी लड़ाई एक-दूसरे को धमकी देने वाली है। एक भारतीय अख़बार का कहना है कि चीन इसलिए चेतावनी दे रहा है ताकि "यह तकरार बढ़कर युद्ध संघर्ष तक पहुँच जाए।" इसी बात को इस तरह से भी व्यक्त किया जा रहा है, "चीन ने अपना रुख कड़ा किया।"
चीन की सरकारी मीडिया ने भारत को 1962 की लड़ाई में मिली शिकस्त की याद दिलानी शुरू कर दी है। 'द ग्लोबल टाइम्स' ने सबसे पहले भारत पर भूटान की स्वायत्ता में सड़क परियोजना के बहाने दखल देने का आरोप लगाया और फिर लिखा कि अगर भारत, "चीन के साथ टकराव को बढ़ावा देता है तो उसे इसके परिणाम झेलने पड़ेंगे।"
भारत और चीन के बीच मौजूदा तकरार की शुरुआत जून के मध्य में शुरू हुई थी। तब भारत ने डोकलाम क्षेत्र में सड़क निर्माण के बहाने चीन के दखल का विरोध किया था। डोकलाम चीन, पूर्वोत्तर भारत के राज्य सिक्किम और भूटान के बीच का क्षेत्र है और अभी चीन और भूटान के बीच इसे लेकर विवाद है।
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भारत भूटान के दावे का समर्थन करता है। भारत की चिंता यह है कि अगर यह सड़क बन जाती है तो चीन भारत के बीस किलोमीटर चौड़े कॉरिडोर 'चिकन्स नेक' के नज़दीक पहुंच जाएगा। यह गलियारा पूर्वोत्तर के राज्यों को भारत के मुख्यभाग से जोड़ता है। जब से ये तकरार दोनों देशों के बीच शुरू हुई है। दोनों ही पक्षों ने अपनी-अपनी फ़ौज को सीमा पर तैनात कर रखा है और एक-दूसरे को पीछे हटने की धमकी दे रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब दोनों देश एक-दूसरे के सामने सीमा-विवाद को लेकर आए हैं। छोटी-मोटी मुठभेड़ तो भारत-चीन सीमा पर होती रही है।
1967 में भारत और चीन के बीच संघर्ष हो चुका है. इसके अलावा 1986-87 में दोनों देशों के बीच अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर लंबे समय तक तनातनी रह चुकी है। विशेषज्ञ अजय शुक्ला कहते हैं। "भारत को लगता है कि चीन, भूटान को लेकर भारत की प्रतिबद्धता को परख रहा है। चीन हमेशा से भूटान के साथ भारत के करीबी रिश्ते को लेकर नाराज़ रहता है। इसलिए वो हमेशा इसे तोड़ने की कोशिश करता रहता है।"
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चीन की सरकारी मीडिया ने भारत को 1962 की लड़ाई में मिली शिकस्त की याद दिलानी शुरू कर दी है। 'द ग्लोबल टाइम्स' ने सबसे पहले भारत पर भूटान की स्वायत्ता में सड़क परियोजना के बहाने दखल देने का आरोप लगाया और फिर लिखा कि अगर भारत, "चीन के साथ टकराव को बढ़ावा देता है तो उसे इसके परिणाम झेलने पड़ेंगे।"
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भारत और चीन के बीच मौजूदा तकरार की शुरुआत जून के मध्य में शुरू हुई थी। तब भारत ने डोकलाम क्षेत्र में सड़क निर्माण के बहाने चीन के दखल का विरोध किया था। डोकलाम चीन, पूर्वोत्तर भारत के राज्य सिक्किम और भूटान के बीच का क्षेत्र है और अभी चीन और भूटान के बीच इसे लेकर विवाद है।
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भारत भूटान के दावे का समर्थन करता है। भारत की चिंता यह है कि अगर यह सड़क बन जाती है तो चीन भारत के बीस किलोमीटर चौड़े कॉरिडोर 'चिकन्स नेक' के नज़दीक पहुंच जाएगा। यह गलियारा पूर्वोत्तर के राज्यों को भारत के मुख्यभाग से जोड़ता है। जब से ये तकरार दोनों देशों के बीच शुरू हुई है। दोनों ही पक्षों ने अपनी-अपनी फ़ौज को सीमा पर तैनात कर रखा है और एक-दूसरे को पीछे हटने की धमकी दे रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब दोनों देश एक-दूसरे के सामने सीमा-विवाद को लेकर आए हैं। छोटी-मोटी मुठभेड़ तो भारत-चीन सीमा पर होती रही है।
1967 में भारत और चीन के बीच संघर्ष हो चुका है. इसके अलावा 1986-87 में दोनों देशों के बीच अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर लंबे समय तक तनातनी रह चुकी है। विशेषज्ञ अजय शुक्ला कहते हैं। "भारत को लगता है कि चीन, भूटान को लेकर भारत की प्रतिबद्धता को परख रहा है। चीन हमेशा से भूटान के साथ भारत के करीबी रिश्ते को लेकर नाराज़ रहता है। इसलिए वो हमेशा इसे तोड़ने की कोशिश करता रहता है।"
india china border
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लू कांग ने बीजिंग में पत्रकारों से मंगलवार को कहा, "भारतीय फ़ौज को 'टकराव की स्थिति को बढाने से रोकने' के लिए डोकलाम के इलाक़े से पीछे हट जाना चाहिए। भारतीय विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की चेतावनी को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है।
चीन के मसलों पर करीब से नज़र रखने वाले एक विशेषज्ञ ने मुझ से कहा, "आम तौर पर चीन की तैयारी ऐसे ही बयानबाजी और चेतावनी के साथ होती है। इसलिए हमें चीन को हल्के में नहीं लेना चाहिए या इसे सिर्फ़ धमकी नहीं समझना चाहिए।" 1962 में चीन की सरकारी मीडिया शिन्हुआ ने पहले ही चेतावनी दी थी कि, "भारत को लड़ाई से अपने कदम पीछे खिंच लेने चाहिए।"
1950 में कोरिया के साथ लड़ाई के दौरान चीन ने अमरीका को चेतावनी दी थी कि अगर वो येलो नदी पार करते हैं तो चीन भी लड़ाई में कूद पड़ेगा। दक्षिण कोरिया और उत्तरी कोरिया के बीच छिड़ी इस लड़ाई में अमरीका दक्षिण कोरिया की तरफ से था। वहीं चीन उत्तरी कोरिया की ओर से। तत्कालीन सोवियत संघ ने भी भी उत्तर कोरिया का साथ दिया था। मौजूदा परिस्थिति में ऐसा बिल्कुल दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि चीन वाकई में युद्ध की ही तैयारी कर रहा। दोनों ही पक्ष इस तकरार के लिए एक-दूसरे को जिम्मेवार ठहरा सकते हैं।
2012 में चीन भूटान और बर्मा के साथ सीमा को लेकर एक साझे निष्कर्ष पर पहुंच चुका था. तब से उनके बीच कोई तकरार अब तक पैदा नहीं हुआ है। भारत का कहना है कि चीन ने इस बार सड़क बनाकर यथास्थिति का उल्लंघन किया है। भारत ने अपनी फ़ौज भूटान की ओर से मदद मांगने के बाद भेजे। चीन का दावा है कि भारतीय फ़ौज ने डोकलाम में भूटान की मदद करने के बहाने दखल दिया है और यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है।
चीनी थिंक टैंक के एक विशेषज्ञ लांग शिंगचुन कहना है, "पाकिस्तान के अनुरोध पर कोई तीसरा देश इसी तर्क का इस्तेमाल करते हुए कश्मीर में दखल दे सकता है जो तर्क भारत की फ़ौज ने डोकलाम में सड़क निर्माण रोकने के लिए किया है. अगर मान लिया जाए कि भूटान ने भारत से ऐसा करने को कहा भी तो यह सिर्फ़ भूटान के ज़मीन तक सीमित रहना चाहिए था ना कि उस सीमा तक जो विवादित क्षेत्र में आता है।"
चीन के मसलों पर करीब से नज़र रखने वाले एक विशेषज्ञ ने मुझ से कहा, "आम तौर पर चीन की तैयारी ऐसे ही बयानबाजी और चेतावनी के साथ होती है। इसलिए हमें चीन को हल्के में नहीं लेना चाहिए या इसे सिर्फ़ धमकी नहीं समझना चाहिए।" 1962 में चीन की सरकारी मीडिया शिन्हुआ ने पहले ही चेतावनी दी थी कि, "भारत को लड़ाई से अपने कदम पीछे खिंच लेने चाहिए।"
1950 में कोरिया के साथ लड़ाई के दौरान चीन ने अमरीका को चेतावनी दी थी कि अगर वो येलो नदी पार करते हैं तो चीन भी लड़ाई में कूद पड़ेगा। दक्षिण कोरिया और उत्तरी कोरिया के बीच छिड़ी इस लड़ाई में अमरीका दक्षिण कोरिया की तरफ से था। वहीं चीन उत्तरी कोरिया की ओर से। तत्कालीन सोवियत संघ ने भी भी उत्तर कोरिया का साथ दिया था। मौजूदा परिस्थिति में ऐसा बिल्कुल दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि चीन वाकई में युद्ध की ही तैयारी कर रहा। दोनों ही पक्ष इस तकरार के लिए एक-दूसरे को जिम्मेवार ठहरा सकते हैं।
2012 में चीन भूटान और बर्मा के साथ सीमा को लेकर एक साझे निष्कर्ष पर पहुंच चुका था. तब से उनके बीच कोई तकरार अब तक पैदा नहीं हुआ है। भारत का कहना है कि चीन ने इस बार सड़क बनाकर यथास्थिति का उल्लंघन किया है। भारत ने अपनी फ़ौज भूटान की ओर से मदद मांगने के बाद भेजे। चीन का दावा है कि भारतीय फ़ौज ने डोकलाम में भूटान की मदद करने के बहाने दखल दिया है और यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है।
चीनी थिंक टैंक के एक विशेषज्ञ लांग शिंगचुन कहना है, "पाकिस्तान के अनुरोध पर कोई तीसरा देश इसी तर्क का इस्तेमाल करते हुए कश्मीर में दखल दे सकता है जो तर्क भारत की फ़ौज ने डोकलाम में सड़क निर्माण रोकने के लिए किया है. अगर मान लिया जाए कि भूटान ने भारत से ऐसा करने को कहा भी तो यह सिर्फ़ भूटान के ज़मीन तक सीमित रहना चाहिए था ना कि उस सीमा तक जो विवादित क्षेत्र में आता है।"
india china flag
साफ है कि इस तकरार को ख़त्म करने के लिए तीनों पक्षों को एक समाधान पर आना होगा। हालांकि कई लोगों को मानना है कि इसमें काफी समय लग सकता है। भारत और चीन के बीच रिश्ते ऐसे भी कई सालों से तनावग्रस्त बने हुए हैं। दोनों ही देशों ने इस महीने की शुरुआत में जी20 की बैठक के दौरान इस मुद्दे को हल करने का मौका गंवा दिया है।
भारत का कहना है कि शी जिनपिंग के साथ मुलाकात जी-20 की बैठक के दौरान एजेंडे में नहीं था। दूसरी तरफ चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि बैठक के लिए सही माहौल नहीं था।
एक दूसरा मौका अभी हाल ही में फिर से दोनों देशों को मिलने वाला है। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल इस महीने के अंत तक ब्रिक्स की मीटिंग को लेकर बीजिंग जाने वाले हैं। एक पूर्व राजनयिक कहते हैं। "दोनों ही देशों ने इसे प्रतिष्ठा का विषय बना लिया है। लेकिन मुश्किल परिस्थितियों में चीजें को दुरुस्त रखना ही कूटनीति है।"
दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो श्रीनाथ राघवन का कहना है, "मैं नहीं सोचता कि कोई पक्ष लड़ाई चाहता है। किसी की भी इसमें दिलचस्पी नहीं है। लेकिन दोनों ही देशों की प्रतिष्ठा जरूर पर दांव लगी हुई है और इसकी वजह से यह तकरार लंबे वक्त तक सकता है।"
भारत का कहना है कि शी जिनपिंग के साथ मुलाकात जी-20 की बैठक के दौरान एजेंडे में नहीं था। दूसरी तरफ चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि बैठक के लिए सही माहौल नहीं था।
एक दूसरा मौका अभी हाल ही में फिर से दोनों देशों को मिलने वाला है। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल इस महीने के अंत तक ब्रिक्स की मीटिंग को लेकर बीजिंग जाने वाले हैं। एक पूर्व राजनयिक कहते हैं। "दोनों ही देशों ने इसे प्रतिष्ठा का विषय बना लिया है। लेकिन मुश्किल परिस्थितियों में चीजें को दुरुस्त रखना ही कूटनीति है।"
दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो श्रीनाथ राघवन का कहना है, "मैं नहीं सोचता कि कोई पक्ष लड़ाई चाहता है। किसी की भी इसमें दिलचस्पी नहीं है। लेकिन दोनों ही देशों की प्रतिष्ठा जरूर पर दांव लगी हुई है और इसकी वजह से यह तकरार लंबे वक्त तक सकता है।"