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प. बंगाल चुनाव: ग्रामीण इलाकों से मिलती है सत्ता की चाबी
रीता तिवारी/अमर उजाला, कोलकाता
Updated Wed, 27 Apr 2016 06:15 AM IST
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पश्चिम बंगाल में ग्रामीण इलाके हमेशा से ही सत्ता की चाबी बने रहे हैं। वाम मोर्चा सरकार अगर 34 वर्षों तक सत्ता में बनी रही, तो उसके पीछे ग्रामीण वोटरों की अहम भूमिका थी। इस बार भी अपवाद नहीं है। चार चरणों में तमाम ग्रामीण इलाकों में मतदान हो चुका है।
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यानी अगली सरकार की किस्मत बैलट बॉक्स में बंद हो चुकी है। बाकी दो चरणों में राजधानी कोलकाता समेत उत्तर बंगाल में चुनाव होने हैं। ग्रामीण इलाकों में लोगों को शारदा चिटफंड घोटाले और तृणमूल कांग्रेस नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और कोलकाता में हुए फ्लाईओवर हादसे से कोई मतलब नहीं रहा।
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उनके लिए ममता बनर्जी सरकार की ओर से शुरू की गई सबूजी साथी, खाद्यसाथी और कन्याश्री व युवाश्री जैसी योजनाएं ही समर्थन का पैमाना हैं। शायद ममता बनर्जी भी ग्रामीण वोटरों की इस नब्ज को अच्छी तरह पहचान चुकी हैं। यही वजह है कि उन्होंने चुनाव अभियान के दौरान ग्रामीण इलाकों पर खास ध्यान दिया है और तमाम योजनाओं और उपलब्धियों का प्रचार किया है।
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ग्रामीण इलाकों को ध्यान में रखते हुए ही ममता ने अपने कार्यकाल के आखिरी दो वर्षों के दौरान तमाम ऐसी योजनाएं शुरू कीं, जो वोटरों पर पकड़ मजबूत बना सके। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि जिस शारदा चिटफंड घोटाले का ग्रामीण इलाकों में असर हो सकता था, उसे विपक्ष ठीक से भुना नहीं सका।
चिटफंड कंपनियों की चपेट में आने वाले ज्यादातर परिवार ग्रामीण इलाकों के हैं, लेकिन विपक्ष चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा नहीं बना सका। जबकि ममता ने अपने रणनीतिक कौशल का परिचय देते हुए इन कंपनियों को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी पूर्व वाम मोर्चा सरकार पर डाल दी।
पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में तृणमूल कांग्रेस के वोटों का हिस्सा 43 फीसदी है, जबकि शहरी इलाकों में यह 54 फीसदी है। ममता को इस बार भी ग्रामीणों का समर्थन मिलने की उम्मीद है।