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रूस से तेल खरीद पर ट्रंप की राहत कितने दिन की?: भारत के लिए खतरा अभी भी बरकरार; जीटीआरआई ने क्यों किया आगाह?

Sat, 17 Oct 2026 11:36 AM IST
शिवम गर्ग पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: शिवम गर्ग Updated Sat, 17 Oct 2026 11:36 AM IST
सार

ट्रंप के फैसले से भारत को रूस से तेल खरीदने के मामले में अमेरिकी शुल्क की धमकी से फिलहाल राहत मिली है, लेकिन जीटीआरआई ने इसे अस्थायी बताया है। अमेरिका भविष्य में फिर दबाव बना सकता है। ऐसे में भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों की रक्षा कैसे करेगा? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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US President Donald Trump Sanctions Waiver Offers India Temporary Relief, GTRI Warns of Renewed US Pressure
तेल खरीद पर ट्रंप की राहत अस्थायी - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से रूस से तेल खरीदने के मामले में भारत को मिली राहत पर ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने सतर्क रहने की सलाह दी है। थिंक टैंक का कहना है कि अमेरिका के इस फैसले से भारत को फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन इससे भविष्य में अमेरिकी व्यापारिक दबाव खत्म होने की गारंटी नहीं मिलती। वाशिंगटन कभी भी अतिरिक्त शुल्क लगाने की धमकी फिर से दे सकता है।

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जीटीआरआई के मुताबिक, ट्रंप ने रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम के तहत प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्क से जुड़ी कार्रवाई में छूट दी है। इससे रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का खतरा फिलहाल टल गया है। हालांकि, यह राहत स्थायी नहीं है और अमेरिकी प्रशासन इसे कभी भी वापस ले सकता है।
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भारत को ऊर्जा सुरक्षा पर ध्यान देने की सलाह
जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि भारत को इस अस्थायी राहत के दौरान अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की तैयारी करनी चाहिए। उनके मुताबिक, भारत को तेल की खरीद व्यावसायिक शर्तों और कीमतों के आधार पर करनी चाहिए, न कि अमेरिकी दबाव में आकर अपने फैसले बदलने चाहिए।
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उन्होंने कहा कि अस्थायी टैरिफ राहत के बदले भारत को स्थायी व्यापारिक रियायतें नहीं देनी चाहिए। अमेरिका की ओर से शुल्क लगाने की धमकी और फिर उससे पीछे हटने की घटनाएं उसकी व्यापार नीति में अनिश्चितता को उजागर करती हैं।

भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी घटी
जीटीआरआई ने बताया कि भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी जुलाई में 51 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 44 प्रतिशत रह गई। इस दौरान भारत ने ऊंची कीमतों के बावजूद अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से अधिक तेल खरीदा।

थिंक टैंक के अनुसार, रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर अमेरिकी दबाव के बीच भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति के विकल्प बनाए रखना जरूरी है। यदि अमेरिका भविष्य में शुल्क लगाने की धमकी दोबारा देता है, तो भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों और व्यापारिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।

क्या है ट्रंप के कार्यकारी आदेश में?
जीटीआरआई के अनुसार, ट्रंप ने 16 अक्तूबर को राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए एसआरआईए के तहत कुछ प्रतिबंधों और शुल्क से छूट देने का आदेश जारी किया। इस आदेश में अमेरिकी कानून की धारा 115 का इस्तेमाल कर अतिरिक्त शुल्क को फिलहाल रोकने का प्रावधान किया गया है।

थिंक टैंक के मुताबिक, इस कानून में रूसी सामान पर 500 प्रतिशत तक शुल्क बढ़ाने और रूस से तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों के सामान पर 100 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रावधान है। यह कार्रवाई 18 अक्तूबर 2026 से नई खरीद के संदर्भ में लागू होने वाली थी। हालांकि, छूट की कोई निश्चित समाप्ति तिथि तय नहीं की गई है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि रूसी ऊर्जा की खरीद पर नजर रखेंगे। इसका मतलब है कि अमेरिका भविष्य में परिस्थितियों की समीक्षा कर सकता है और बातचीत में दबाव बनाने के लिए शुल्क की धमकी का इस्तेमाल कर सकता है।

आखिर अमेरिका ने टैरिफ लगाने से कदम पीछे क्यों खींचे?
अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, अमेरिका के इस फैसले के पीछे कई वजहें हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि 9 अक्तूबर को रूस के साथ हुए समझौते के तहत अमेरिका ने घरेलू कमी और ईंधन की ऊंची कीमतों से निपटने के लिए रूसी डीजल खरीदने का फैसला किया था। ऐसे में खुद रूसी ऊर्जा खरीदते हुए दूसरे देशों को ऐसा करने पर दंडित करना अमेरिका के लिए दोहरे मापदंड के आरोपों को जन्म दे सकता था।

इसके अलावा, अमेरिका ने चीन के साथ हुए समझौते के तहत 10 जनवरी तक टैरिफ नहीं बढ़ाने पर सहमति जताई थी। ऐसे में चीन को राहत मिलने और अमेरिका के खुद रूसी डीजल खरीदने की स्थिति में केवल भारत को निशाना बनाना द्विपक्षीय व्यापार वार्ता को प्रभावित कर सकता था।

चीन और भारत के मामले में क्या है अंतर?
जीटीआरआई का कहना है कि चीन को अमेरिकी शुल्क बढ़ोतरी से 10 जनवरी तक सुरक्षा मिली हुई है। श्रीवास्तव के मुताबिक, इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका अपने हितों के अनुसार प्रतिबंधों और शुल्कों को लागू करने के फैसले बदल सकता है।


उन्होंने कहा कि चीन अमेरिकी दबाव का जवाब देने की स्थिति में है, जबकि भारत को बार-बार ऐसे दबाव का सामना करने से बचने के लिए अपने हितों की रक्षा करनी होगी। उनके अनुसार, भारत को यह स्पष्ट करना चाहिए कि दबाव डालने की रणनीति की भी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

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