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पहले भी आतंकियों की पनाहगाह रहा है यूपी का ये शहर

Thu, 09 Mar 2017 11:13 AM IST
अभिषेक शर्मा/अलीगढ़
अभिषेक शर्मा/अलीगढ़ Updated Thu, 09 Mar 2017 11:13 AM IST
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UP: Aligarh name was linked many time with terrorist and terrorism
- फोटो : amar ujala

23 साल पहले अलीगढ़ से भागे आतंकी की अधूरी तलाश आज भी जारी है। आतंकी गतिविधियों में नाम प्रकाश में आने के बाद वह टाडा के तहत जेल भेजा गया और जमानत पर बाहर आने के बाद फर्जी पासपोर्ट बनवाकर फरार हो गया था। पुलिस को उसके खाड़ी के किसी देश में होने की सूचना मिली थी। नकली करेंसी व हथियार पकड़े जाने के बाद खुफिया एजेंसियां उसके खिलाफ सबूत इकठ्ठा करने की कोशिश में थी। मगर आज तक गिरफ्तारी में सफल नहीं हो सकी।

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करीब 23 साल पहले अलीगढ़ का नाम पहली बार सीधे तौर पर आतंकी गतिविधियों के लिए प्रकाश में आया था। यहां सिविल लाइंस इलाके के दुकानदार कश्मीर के सराय शाही श्रीनगर निवासी जावेद यूसुफ द्वारा मंगाई गई शालों के गठ्ठर में एके 56 रायफल मिली थी। 
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इस मामले में यूसुफ समेत सात लोगों के नाम प्रकाश में आए थे। इनमें ऊपरकोट के चौक बुंदू खां निवासी सुहेब अख्तर पुत्र मोहम्मद अख्तर भी शामिल था। सभी आरोपियों पर टाडा के तहत मुकदमा दर्ज हुआ। बाद में सुहेब अख्तर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। वर्ष 1994 तक वह गोरखपुर की जेल में रहा। बाद में वह जमानत पर जेल से बाहर आया और फर्जी पासपोर्ट बनवाकर विदेश भाग गया। उसकी तलाश में जुटी खुफिया एजेंसियों को उस समय उसके खाड़ी के किसी देश में होने की जानकारी मिली।
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दोदपुर के पते पर बना था फर्जी पासपोर्ट
टाडा में निरुद्घ हुए सुहेब अख्तर का फर्जी पते पर पासपोर्ट बनने और उसके फरार होने का मामला उस समय बहुत चर्चित रहा था। इसमें स्थानीय तंत्र की लापरवाही पर सभी की अंगुलियां उठी। जांच और तत्कालिक कार्रवाई हुई, इसके बाद प्रकरण पर वक्त की गर्द जम गई। खुफिया सूत्रों के मुताबिक गोरखपुर जेल में बंद रहने के दौरान सुहेब ने अपनी जमानत कराई और बाद में दोदपुर के फर्जी पते पर अपना पासपोर्ट बनवा लिया। मजे की बात है कि थाना सिविल लाइन पुलिस ने उसका सत्यापन भी किया था।

पुलिस रिकार्ड में दर्ज अपराध की दास्तान

UP: Aligarh name was linked many time with terrorist and terrorism
-तारीख 12 अप्रैल 1992
-धारा-3/5 टाडा आफिशियल सीक्रेट अधिनियम 1923, 120 बी-राष्ट्र हित के प्रति शत्रुदेश के लिए भारतीय सेना को क्षति पहुंचाने के लिए जासूसी करना घटना
के प्रथम आरोपी
-घटना के प्रथम आरोपी 
-जावेद यूसुफ पुत्र मो.यूसुफ सराय शाही श्रीनगर
-मो.शरीफ उर्फ शेख जावेद पुत्र अमरुद्दीन धौर्रा, हुड़िया खन्नूर पंजाब
नाम प्रकाश में आए
-बरकत अहसानी पुत्र नियामत निवासी अमीर निशां
-सुहेब अख्तर पुत्र मो.अख्तर निवासी चौक बुंदू खां, ऊपरकोट
-यासीन पुत्र नजीर सेंटर प्वाइंट अलीगढ़
-यासीन का नौकर रऊफ धौर्रा माफी
-सज्जाद आलम पुत्र आलमगीर रशीद मंजिल मुजफ्फरा पाकिस्तान
-गुलाम मोहम्मद बागरू, हिजबुल मुजाहिदीन का मारा गया कमांडर
-मंजीत सिंह गिल उर्फ इकबाल, खालिस्तान कमांडो फोर्स कपूरथला पंजाब
-दीपक उर्फ साकिब उर्फ देवेंद्र दयालपुर पंजाब

इन घटनाओं से भी जुड़ा आतंक का अलीगढ़ कनेक्शन

UP: Aligarh name was linked many time with terrorist and terrorism

- दो दशक पहले कश्मीर से आयी शॉल की गांठ में एके 47 पकड़ी गई थी। यहां पर बरूला मार्केट में रहने वाले बरकात रहमानी जो कि कश्मीर में व्यापार करते थे। वहां से अलीगढ़ बसने आते समय अपने साथ एक कश्मीरी को ले आए। उस कश्मीरी के लिए आ रही शाल की गांठ में वह एके 47 पकड़ी गई थी। 
- दो दशक पहले ही एसटीएफ नोएडा ने सूचना के आधार पर जमालपुर से दो भाई पकड़े थे। जिनके पास से पाकिस्तानी दस्तावेज, भारत का नक्शा, नक्शे में कई संवेदनशील जगह मार्क की हुई, फर्जी करंसी और अन्य आपत्तिजनक वस्तुएं पकड़ी गई थीं।
- अलीगढ़ में ही तीन दशक पहले स्टूडेंट आफ इस्लामिक मूवमेंट इन इंडिया (सिमी) की स्थापना हुई जिसने बाद में देश विरोधी ताकतों के साथ हाथ मिलाया। जिसका कार्यालय शमशाद मार्केट में आज भी सील पड़ा हुआ है।
- एक दशक पहले दिल्ली में कोई घटना हुई थी, इसमें एक आतंकी पकड़ा गया था उसके पास अलीगढ़ के एक होटल की स्लिप मिली थी। इससे अंदाजा लगाया कि वह उस होटल में रुका हुआ था।
- पांच साल पहले बंग्लादेश में नकली करंसी का बड़ा कारोबार सामने आया था। यहीं से बैठकर पुष्कर में विस्फोट की योजना भी बनायी गई थी।

यह भी जानें
-अलीगढ़ में 39 पाकिस्तानी नागरिक हैं, इनमें कई बहुत बुजुर्ग हैं इनको लंबे समय से भारतीय नागरिकता नहीं मिली है। इनमें से कुछ आवेदन मंत्रालय में लंबित पड़े हैं। सन 2016 में एक पाकिस्तानी को भारतीय नागरिकता दी गई।
-मीट फैक्ट्रियों में काम करने वाले हजारों बंगलादेशी, म्यांमार, वर्क परमिट पर काम कर रहे हैं इनका कोई वैरीफिकेशन नहीं है। हालांकि देहली गेट पुलिस बताती है कि रजिस्टर है, उसमें इन सभी को निर्देश है कि वह अपने नाम पते दर्ज करें।

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