नई शिक्षा नीति : देर आए, दुरुस्त आए लेकिन नई किताब आने में तो लगेंगे पांच साल, बच्चे पढ़ेंगे कब?
- दुनिया के कई देशों में हर तीसरे साल बदल जाती हैं किताबें
- दस साल में नीति में आना चाहिए बदलाव
- यहां शिक्षा नीति को आने में लग गए चार से अधिक साल
- दो समितियों की सिफारिश और तीसरे शिक्षा मंत्री की पहल कैबिनेट की मुहर
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नई शिक्षा नीति-2020 तुम्हारा स्वागत है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक ने मंजूरी दे दी और संसद की मंजूरी मिल जाने के पूरे आसार हैं। लेकिन बड़ा सवाल है कि मूल रूप में अमल में कब आ पाएगी? एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक, शिक्षाविद, पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी द्वारा घोषित शिक्षा नीति समिति के सदस्य जेएस राजपूत हालांकि शिक्षा नीति को कैबिनेट की मंजूरी का स्वागत कर रहे हैं, लेकिन बड़ा सवाल है कि पाठ्यक्रम की रुपरेखा, पाठ्यक्रम, फिर नई किताबें कब तैयार होंगी और कब छात्र नई शिक्षा नीति के आधार पर नई तैयार किताबें पढ़ेंगे?
जानिए नई किताब आने में कितना लगेगा समय और कब पढ़ेंगे बच्चे
जब जेएस राजपूत एनसीईआरटी के निदेशक बने थे तो उन्होंने 14 नवंबर 1999 को नए पाठ्यक्रम की एक रूपरेखा की शुरूआत की थी। युद्धस्तर की तैयारी के बाद इसे बनकर तैयार होने में साल भर से अधिक का समय लग गया था। छह महीने से अधिक के समय में पाठ्यक्रम निर्धारण हो पाया था और बहुत जल्द काम करने के टारगेट के बावजूद किताबें 2003 में (दो-ढाई) साल में पूरी हो चुकी थीं। जेएस राजपूत भी मानते हैं कि यदि अगस्त के महीने से पाठ्यचर्या की एक रूपरेखा बनाने का काम शुरू हो तो यह डेढ़ से दो साल में तैयार हो सकेगा।
छह महीने का समय पाठ्यक्रम बनाने में लगेगा। इसके बाद किताबों के लेखन और तैयार होने में ढाई-से तीन साल का समय लग सकता है। छह महीने प्रकाशन में और इसके बाद आने वाले सत्र से किताबों को स्कूलों में पढ़ाने का काम शुरू हो सकेगा। इस तरह से यदि अगस्त 2020 को पैमाना मान लें 2026 के पहले नई शिक्षा नीति के आधार पर बच्चों को पाठ्यपुस्तकें पढ़ने को मिल सकेंगी।
क्या होना चाहिए?
भारत में भी शिक्षाविदों का मानना है कि हर पांच साल में बच्चों की किताबों की समीक्षा, उसमें समय के अनुसार बदलाव, नए ज्ञान का समावेश होना चाहिए। हर दस साल में शिक्षा नीति में बदलाव होना चाहिए। नए सिरे से पाठ्यचर्या की रूपरेखा, पाठ्यक्रम का निधारण होना चाहिए। खुद जेएस राजपूत मानते हैं कि दुनिया के देशों में दो-तीन साल के भीतर वहां की शिक्षा, शिक्षा के पैटर्न, पाठ्यपुस्तकों में बदलाव हो जाता है।
नए ज्ञान का समावेश और नए पैटर्न को अपनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। 2000 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अब्दुल वाहिद खां थे। खां ने एक साक्षात्कार में कहा था कि हर तीन-चार साल में नॉलेज का विस्फोट होगा। नई तकनीक आएगी, नए ज्ञान की जरूरत पड़ेगी। चाहे गाड़ी हो या फोन सबकुछ तीन चार साल में काफी कुछ बदल जाएंगे। इसलिए हमें शिक्षा के सुधार में बड़े और तेज प्रयास की आवश्यकता है।
चार साल लग गए शिक्षा नीति बनने में
वर्तमान शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार कराने का जिम्मा स्मृति ईरानी ने उठाया था। पूर्व कैबिनेट सचिव सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में कमेटी का गठन भी हो गया। इसमें जेएस राजपूत सरीखे अन्य भी रहे। समिति ने रिपोर्ट दी, लेकिन केंद्र सरकार ने व्यापक सुझाव लेने का मन बनाया। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर बने। जावड़ेकर ने इसे पूर्व इसरो वैज्ञानिक, राज्यसभा सांसद डॉ. कस्तूरी रंगन की अध्यक्षता में समित बनाकर उसे सौंप दिया। इस समिति की सिफारिशें भी काफी पहले से मंत्रालय के पास पड़ी रही। अब जाकर मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कैबिनेट में मसौदे को पेश करके मंजूरी दिलाई।
क्या हुआ है भारत में?
डॉ. मुरली मनोहर जोशी मानव संसाधन विकास मंत्री थे। शिक्षाविद जोशी ने अपनी देखरेख में नए पाठ्यक्रम की एक रुपरेखा, नया पाठ्यक्रम, नई किताबों का लेखन कराया। 2003 तक देश के छात्र नई पाठ्यपुस्तक पढ़ने के लिए पा सके। शिक्षा के भगवाकरण का आरोप लगा। 2004 में केंद्र सरकार बदल गई। मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने शिक्षा विद प्रो. यशपाल के मार्ग दर्शन में नई पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम, किताब लेखन का काम शुरू कराया। अर्जुन सिंह का मुख्य उद्देश्य शिक्षा के भगवाकरण का था।
इसलिए उन्होंने अपने लेखकों द्वारा निर्धारित भगवाकरण के अंश किताबों से हटवाए, 1999 तक चल रही पुरानी किताबों के बड़े अंश को शामिल किया और नई किताबें छात्रों को मिल गई। कहा जा सकता है कि शिक्षा में सुधार का अधूरा काम काम हुआ। जेएस राजपूत भी कहते हैं कि यहां तो मकसद शिक्षा में राजनीतिकरण को घटाना-बढ़ाना था। इसलिए कुछ खास नहीं हो सका। वहीं किताबें अभी भी छात्र पढ़ रहे हैं। सभी बदलाव में शिक्षा में बस्ते का बोझ कम करना अहम रहा, लेकिन नए ज्ञान की बात बहुत कम आ सकी। कह सकते हैं कि शिक्षा में पिछले दो दशक में कोई बड़ा सुधार नहीं हो सका।
शिक्षा में आसमान के तारे जाने कब जमीन पर उतरेंगे?
जेएस राजपूत भी मानते हैं कि उचित अनुपात में कक्षा में छात्र और नियमित शिक्षकों की मौजूदगी सरकार की जिम्मेदारी है। साल 2000 से केंद्र सरकार देश की कक्षाओं में 40 छात्रों के पीछे एक नियमित शिक्षक का पैमाना मानकर चल रही है। 2005 में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने भी इस पर जोर दिया था। इसके बाद कपिल सिब्बल, स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर और अब रमेश पोखरियाल निशंक हैं।
दो दशक बाद भी केंद्रीय विद्यालयों में छात्र और शिक्षक का एक शिक्षक के अनुपात में 50 से अधिक छात्र हैं। राज्यों के प्राथमिक विद्यालयों, माध्यमिक स्तर के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में यह अनुपात और मुंह चिढ़ाता है। नियमित शिक्षकों के पद खाली हैं। खुद जेएस राजपूत का कहना है कि आठ लाख शिक्षकों के पद खाली हैं। देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी स्वीकृतों पदों पर भारी रिक्तियां हैं।
अब यह नहीं चलेगा
नई शिक्षा नीति के अमल में आने के बाद सभी विश्वविद्यालय शिक्षा की सामग्री, उसके मानक के लिए एक सूत्र में बंध जाएंगे। यह अच्छा प्रयास है। जबकि पहले नागालैंड में एक ऐसा भी विश्वविद्यालय चर्चा में आ चुका है जो तीन साल के भीतर 500 लोगों को पीएचडी की डिग्री दे चुका है। राजस्थान की झुनझुनू में स्थित सिंघानिया यूनिवर्सिटी समेत तमाम पर डिग्री बिकने जैसे गंभीर सवाल उठ चुके हैं।
लेकिन अब यह दौर लदेंगे, क्योंकि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक राष्ट्रीय नियामक अथॉरिटी बनने का रास्ता साफ हो रहा है। भारतीय उच्चतर शिक्षा परिषद (एचईसीआई) दमदार भूमिका में आएगा। राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामक परिषद (एनएचईआरसी) के गठन से कई विसंतियां दूर होने की संभावना है। इस तरह से कई और संस्थाएं पुरानी संस्थाओं का परिष्कृत रूप होंगी।
फिर भी शिक्षा नीति ने एक सपना दिखाया है
- मनुष्य को संसाधन का स्रोत मानने की बजाय मानव संसाधन विकास मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय घोषित करना बड़ी पहल है। रवि शर्मा और जेएस राजपूत भी इसकी सराहना कर रहे हैं।
- नई शिक्षा नीति में पुराने विचारों, नीतियों का भी समावेश है। शिक्षा नीति ने एक सपना दिखाया है। तीन भाषाओं (हिंदी, अंग्रेजी और एक क्षेत्रीय भाषा) को वरीयता दी है।
- यूपीए सरकार ने सैम पित्रोदा के मार्गदर्शन में ज्ञान आयोग बनाया था। इसके जरिए सैम का उद्देश्य उच्च शिक्षा में छात्रों को किसी भी विषय में अपने रुचि के अनुरूप पढ़ाई करने का अवसर देना था। नई शिक्षा नीति ने इस तरह के दर्शन को अपना है।
- शिक्षक का सम्मान सबसे बड़ा पहलू है। शिक्षा नीति ने इस पर ध्यान दिया है।
- विद्यालयी शिक्षा में खेल को अब तक दोयम दर्जे का स्थान मिला था। बोर्ड परीक्षा के बोझ को कम करने, प्रयोगवादी नवीन शिक्षा को बढ़ावा देने, खेल को शिक्षा में सम्मान देने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विजन यहां साफ दिखाई पड़ रहा है।
- हर बच्चे को 10 दिन की इंटर्नशिप (हुनर की ललक पैदा करने के लिए) यह एक अच्छा प्रयास है। यह बात राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी कहते थे।
- शिक्षा नीति स्वतंत्र हुई है और समय की चुनौतियों को स्वीकार करने वाली दिखाई दे रही है।