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UNHCR: 'सोचिए, अगर आपको अपना सब कुछ छोड़कर भागना पड़े तो कैसा लगेगा?' शरणार्थियों का छलका दर्द

Sat, 22 Jun 2024 02:01 PM IST
अभिषेक दीक्षित यूएन हिंदी समाचार
यूएन हिंदी समाचार Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Sat, 22 Jun 2024 02:01 PM IST
सार

यूएन रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर के साथ बातचीत में युवा शरणार्थी माया ने युवजन के सामने मौजूद चुनौतियों के बारे में बताया कि हम भारत सरकार के आभारी हैं कि उन्होंने हमें यहां आने की अनुमति दी। 

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UNHCR Imagine how would you feel if you had to leave everything behind and run away? Refugees pain spills out
UN - फोटो : UN

विस्तार

भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित UNHCR के शरणार्थी पंजीकरण सुविधा केंद्र में युवा शरणार्थियों से बातचीत के दौरान 21 वर्षीय माया ने रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर शॉम्बी शार्प से पूछा कि सोचिए, अगर आपको अपना घर, परिवार, अपना सब-कुछ छोड़कर एक नए देश जाना पड़े तो कैसा लगेगा? हर वर्ष हिंसक टकराव व दमन के कारण लाखों लोग अपने घर छोड़कर भागने के लिए मजबूर होते हैं। आश्रय लेने वाले लोगों के लिए पंजीकरण व दस्तावेज बनवाने के लिए UNHCR ही एकमात्र सहारा होता है।

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भारत व मालदीव के लिए यूएन एजेंसी के मिशन प्रमुख, अरेनी सियानी ने बताया कि भारत में शरण लेने वाली श्रीलंका की एक महिला ने नागरिक के तौर पर कानूनी दर्जा मिलने के बाद पहली बार इन चुनावों में मतदान किया। उन्होंने विस्थापित लोगों को आश्रय देने की भारत की लम्बे समय से चली आ रही परम्परा पर रौशनी डाली। 2023 तक भारत में यूएनएचसीआर द्वारा 46,569 लोगों का पंजीकरण किया जा चुका है।
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यूएन एजेंसी के कर्मचारी, आश्रय की तलाश कर रहे लोगों का पंजीकरण करते हैं और एक शरणार्थी के रूप में उनकी पुष्टि करने वाला दस्तावेज जारी करने से पहले आवेदक की स्थिति का आकलन करने के लिए उनका इंटरव्यू लेते हैं। मार्च में भारत में यूएनएचसीआर ने बायोमेट्रिक डेटाबेस द्वारा संचालित एक नया शरण इच्छुक (asylum-seeker) और शरणार्थी कार्ड जारी किया, जिसे एक एप (Verify Plus) का उपयोग करके स्कैन एवं प्रमाणित किया जा सकता है।
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अनेक चुनौतियां
यूएन रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर के साथ बातचीत में युवा शरणार्थी माया ने युवजन के सामने मौजूद चुनौतियों के बारे में बताया कि हम भारत सरकार के आभारी हैं कि उन्होंने हमें यहां आने की अनुमति दी। पावर-प्वाइंट प्रस्तुति के जरिए सभी युवा शरणार्थियों ने अपनी चिंताएं सामने रखीं, जिसमें अपने देश में व्याप्त असुरक्षित स्थितियों से भागने का सदमा तथा मेजबान देश में सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ने से लेकर, रोजमर्रा के जीवन में सांस्कृतिक अंतरों से जद्दोजहद करना शामिल था। 

म्यांमार से आई शरणार्थी बीई ने कहा कि सरकारी दस्तावेजों के अभाव में हम फोन के लिए सिम कार्ड भी नहीं ले पाते। बैंक अकाउंट नहीं खोल पाते तो हम काम करके तनख्वाह कैसे लें? उन्होंने कहा कि हमें लगता है कि शरणार्थियों के रूप में हम अपने मेजबान देश के लिए बोझ हैं। म्यांमार से आए एक अन्य युवा थुरा ने बताया कि हम सुनते रहते हैं कि लोगों को उठाकर वापस म्यांमार भेजा जा रहा है। मुझे हमेशा डर लगा रहता है कि मेरे साथ भी ऐसा ही होगा। मुझे भी इसी तरह हिरासत में ले लिया जाएगा। घर किराए पर लेना भी मुश्किल हो जाता है। पुलिस प्रमाणन की जरूरत पड़ती है और बिना दस्तावेजों के यह सम्भव नहीं हो पाता, तब वो हमें रहने के लिए घर देने से इनकार कर देते हैं। 

वहीं अफगानिस्तान से आई एक युवा शरणार्थी नूरा ने कहा कि मैं अपने देश वापिस जाने से बेहतर मरना पसंद करूंगी। वो अब महिलाओं व लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं रहा। अफगानिस्तान से ही आए शरणार्थी फिल ने बताया कि हममें से ज्यादातर लोग अवसाद में हैं। हम पहले ही सदमें में हैं और हमें यह तक पता नहीं है कि हम यहां कितने समय तक रह सकते हैं। एक शरणार्थी ने कहा कि कौशल शिक्षा व औपचारिक रोज़गार के लिए सीमित अवसरों के कारण, भविष्य की अनिश्चितता को लेकर उनके मन में डर बना रहता है।

विकलांग शरणार्थियों की चुनौतियां
विकलांग शरणार्थी युवजन ने भी बातचीत के दौरान अपनी परेशानियां रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर के सामने रखीं। विकलांग शरणार्थियों को जरूरत पड़ने पर चिकित्सा सुविधा हासिल करना मुश्किल हो जाता है। स्थिति बहुत तनावपूर्ण है और कोई सुरक्षात्मक उपाय मौजूद नहीं हैं। उन्हें विकलांगता सर्टिफिकेट भी हासिल नहीं हो पाता, तो वो मेडिकल सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाते।  

यूएनएचसीआर के मिशन प्रमुख अरेनी सियानी ने कहा कि उनका कार्यालय आश्रय चाहने वाले विकलांगजन से सम्बन्धित आंकड़ें जुटाने के प्रयास कर रहा है, ताकि उनकी समस्याओं के समाधान खोजे जा सकें। उन्होंने कहा कि किसी को भी पीछे न छोड़ने की हमारी प्रतिबद्धता के तहत हम किसी भी शरणार्थी को पीछे न छोड़ने की दिशा में कोशिशें जारी रखेंगे।

सहनसक्षमता व एकजुटता से हौसला
युवा शरणार्थियों ने बताया कि उन्होंने शहर भर में अपने जैसे शरणार्थियों के बीच भाईचारे का भाव बढ़ाने व आपस में एक-दूसरे की मदद के लिए, एक हजार क्लब स्थापित किए हैं। जब उनसे इसकी वजह पूछी गई तो उन्होंने कहा कि साझा अनुभवों से सहनसक्षमता बढ़ाने के लिए, जिससे हम अपने हालात से ही परिभाषित न होकर रह जाएं। 

शरणार्थियों के इस समूह ने, शॉम्बी शर्प के साथ अपने सपने और सर्वजन के कल्याण के लिए काम करने की अपनी आकांक्षाएं साझा कीं। साथ ही, सतत विकास के लक्ष्य हासिल करने के लिए, शरणार्थियों का लगातार समावेश करते रहने की वकालत की। शरणार्थियों को उनके संघर्ष, सपनों व उम्मीदों के बारे में दिल खोलकर बात करने की सराहना करते हुए, यूएन रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर ने इस वादे के साथ उनसे विदा ली कि वो उनकी आवाज व चिंताओं को उचित मंचों पर उठाते रहेंगे। 


उन्होंने कहा कि युवजन की आवाज़ तब तक पूरी तरह बुलंद नहीं हो सकती, जब तक शरणार्थियों की आवाजें उसमें शामिल न की जाएं। युवा शरणार्थियों की रचनात्मक व आर्थिक क्षमता को उजागर करने से, सर्वजन, खासतौर पर मेजबान समुदायों की समृद्धि एवं विकास होता है। 
(पहचान छिपाने के लिए नाम बदल दिए गए हैं)
 

(नोट: यह लेख संयुक्त राष्ट्र हिंदी समाचार सेवा से लिया गया है।)
 

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