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क्या 'आधार' लोगों का अधिकार छीन रहा है?

Tue, 26 Jul 2016 03:38 PM IST
रीतिका खेड़ा/अर्थशास्त्री, बीबीसी हिन्दी के लिए
रीतिका खेड़ा/अर्थशास्त्री, बीबीसी हिन्दी के लिए Updated Tue, 26 Jul 2016 03:38 PM IST
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'आधार' लोगों का अधिकार छीन रहा है? - फोटो : BBC
आधार को एक ऐसी जादुई-छड़ी के रूप में पेश किया गया था, जो सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के सुधार में मददगार होगा। वाकई, यह जादुई-छड़ी का काम कर रहा है। बस फ़र्क़ इतना ही है कि यह उन योजनाओं के लिए हानिकारक साबित हो रहा है। राज्यों से आ रही ख़बरों से पता चलता है की आधार के तकनीक और बिजली, बायोमेट्रिक्स, इंटरनेट और सर्वर कनेक्टिविटी में परेशानी से लोगों को अपना अधिकार भी नहीं मिल पा रहा है। गुजरात में, जहाँ पॉइंट ऑफ सेल (पीओएस) मशीन लगाई गई है, इंटरनेट कनेक्टिविटी में दिक्कत आने से लोगों को राशन नहीं मिल पाता।
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राजस्थान की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) बुरी तरह से बर्बाद होने के कगार पर है। यहाँ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अधीन परिवारों का चयन पूरा नहीं हुआ था, फिर भी पीडीएस दुकानों पर 'आधार' पर काम करने वाली पीओएस मशीन लगा दी गई। अब हर महीने राशन लेते समय जब मशीन लोगों के अंगूठे के निशान को पहचानेगी तब उन्हें राशन बिक्री की जाएगी। माना जा रहा है कि मशीन में अंगूठा लगाने से राशन की चोरी ख़त्म हो जाएगी, लेकिन ख़बरों के अनुसार ज़्यादातर लोगों का बायोमेट्रिक्स फेल हो रहा है। वृद्धवस्था पेंशन योजना, जनधन-आधार-मोबाइल (जेएएम) के पहले कदम पर यानि बैंक से ही लोग परेशान हैं।
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पहले हर महीने 500 की पेंशन गाँव में ही डाकिए से मिलती थी। आज उसके लिए बुज़ुर्गों को बैंक जाना पड़ रहा है। कई इलाक़ों में तो आने जाने के साधन भी नहीं होते हैं। बैंक में भीड़ और कागज़ी प्रक्रिया से जूझना भी अलग समस्या है। गुजरात और राजस्थान में तो यह सिस्टम कुछ ही महीने पहले लागू हुआ है, इसलिए शायद इसमें सुधार की उम्मीद है। लेकिन आंध्र प्रदेश में 2013 से ही पीडीएस, पेंशन और मनरेगा में ही इसे लागू किया गया था। वहाँ के राज्य सरकार की रिपोर्ट ही बताती है कि पिछले दो साल में क़रीब 20 फ़ीसदी मौके पर बायोमेट्रिक्स फेल रहा है। यानी पाँच में से एक व्यक्ति के उंगली के निशानों की पुष्टि नहीं हो पा रही है।
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66 लाख बोगस कार्ड डिजिटाइज़ेशन की प्रक्रिया से काटे गए - फोटो : BBC
जब ऐसा होता है, तो लोगों को कहा जाता है बाद में आओ, या कुछ लोगों के लिए मोबाइल पर पासवर्ड भेजने की सुविधा रखी गई है। कुछ को कहा जा रहा है की उन्हें आधार में फिर से नामांकन करवाना होगा, और जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होगी, उन्हें न राशन मिल सकता है, न पेंशन और न मनरेगा और न ही मज़दूरी। इस तरह की नाकामियों को पिछली रिपोर्ट में जगह नहीं दी गई है। सवाल यह उठता है कि राज्य इस तरह की बिना भरोसे की तकनीक को बिना जाँच किए, इतनी हड़बड़ी में क्यों लागू कर रहे हैं? पीडीएस में केंद्रीय खाद्य मंत्रालय ने पिछले मई में राज्यों को दो विकल्प दिए थे, राशन की जगह नकद दो या आधार पीओएस मशीन लगाओ। एक और वजह यह भी हो सकती है कि आधार-पीओेएस मशीन से ‘बोगस’ कार्ड पहचाने जा सकते हैं।

प्रेस इन्फ़ॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) की 26 अप्रैल की एक विज्ञप्ति में कहा गया कि 66 लाख बोगस कार्ड डिजिटाइज़ेशन की प्रक्रिया से काटे गए हैं। जबकि दो हफ़्ते बाद 10 मई को ही प्रधानमंत्री की समीक्षा बैठक के बाद की विज्ञप्ति में काटे गये कार्डों की संख्या 1।6 करोड़ तक पहुँच गई और दावा किया गया की यह आधार की वजह से था, डिजिटाइज़ेशन से नही। हो सकता है कि खाद्य मंत्रालय ने दो हफ्तों में अपने आँकड़े अपडेट किए हों। लेकिन इससे अधिक संभावना है कि 1।6 करोड़ का आँकड़ा पिछले 3 साल में कटे कार्डों का है। यह इसलिए कि 8 दिसंबर 2015 की प्रेस विज्ञप्ति में पिछले 3 सालों में कटे ‘बोगस/अपात्र' कार्डों की संख्या 1।2 करोड़ आई थी। दूसरी बात, प्रेस विज्ञप्ति में ‘बोगस/अपात्र’ का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन दोनों बार हेडलाइन में ‘अपात्र’ शब्द को हटा दिया गया। यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि ‘बोगस’ कार्ड काटने में आधार की भूमिका है, लेकिन खाद्य सुरक्षा क़ानून के अंतर्गत 'अपात्र' परिवारों की पहचान में आधार की कोई भूमिका नहीं।

 

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पीएमओ से सफलता दिखाने का आदेश - फोटो : BBC

तीसरी बात, विज्ञप्ति में ज़्यादातर राज्य, परिवारों की संख्या बताते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल ने व्यक्तियों की संख्या बताई है। काटे गये 1।6 करोड़ कार्डों में से 62 लाख बंगाल के हैं यानी काटे गए परिवारों की संख्या ग़लत तरीके से बढ़ा दी गई है। आख़िरी बात, 2013 में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लागू होने के बाद, राज्यों ने नए सिरे से राशन कार्ड सूची बनाने की प्रक्रिया शुरू की, जिसमें पुराने डुप्लिकेट, बोगस कार्ड काटे जा रहे हैं। हो सकता है कि कार्डों की संख्या में जो बदलाव है, वो इस सूची बनाने की प्रक्रिया की वजह से हो ना कि आधार या डिजिटाइज़ेशन की वजह से।

लेकिन सरकार 'जेएएम' के 'ए' (आधार) को सफल दिखाने के लिए इतनी उत्सुक है कि कोई सवाल ही नहीं पूछ रहा है। मंत्रालय में जिन्हें सच पता है, वो कुछ नहीं बोल रहे, क्योंकि पीएमओ से सफलता दिखाने का आदेश है। डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांस्फर और आधार पर चर्चा का एक गंभीर पहलू है इस पर किया जा रहा ‘प्रोपेगेंडा’। यूपीए-2 में राजस्थान में कांग्रेस की सरकार ने केरोसिन में डीबीटी को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया था। इसमें जब केरोसिन की बिक्री में 80% की गिरावट आई तो सरकार ने दावा किया की डीबीटी से केरोसिन की कालाबाज़ारी ख़त्म हो गई है। फिर पता चला कि गिरावट के दो कारण थे लोगों के खाते नहीं खुले थे इसलिए उन्हें सब्सिडी नहीं मिली और उन्होंने केरोसिन ख़रीदना छोड़ दिया।

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'आधार' लोगों का अधिकार छीन रहा है? - फोटो : bbc
इसी तरह इस सरकार में भी प्रचार-प्रसार के भरोसे काम किया जा रहा है। तीन साल से चल रहे, एलपीजी में डीबीटी, आधार, गिव इट अप, से बचत का कोई भरोसेमंद अनुमान नहीं है। जुलाई 2015 में मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम और सिद्धार्थ जॉर्ज ने लिखा कि इसकी वजह से दो अरब डॉलर की बचत हुई। जब तीन अख़बारों ने सवाल उठाए तो उन्हें स्पष्टीकरण देना पड़ा कि वे ‘वास्तविक’ बचत की बात नहीं कर रहे थे, केवल ‘संभावित’ बचत का अंदाज़ा दे रहे थे। साथ ही यह भी माना कि बचत में आधार-डीबीटी के अलावा बाज़ारी भाव की भी भूमिका है। इस स्पष्टीकरण के बावज़ूद, सरकारी विज्ञप्तियां और नीति आयोग भी, ‘संभावित’ बचत को हमेशा ‘वास्तविक’ बचत की तरह प्रस्तुत करते है। विश्व बैंक भी पीछे नहीं रहा, जब वर्ल्ड डेवेलपमेंट रिपोर्ट 2016 लाँच हुई तो चीफ़ एकॉनमिस्ट ने कहा कि आधार से हर साल 1 अरब डॉलर की बचत हो रही है।

यही नहीं, उस रिपोर्ट में कहा गया कि आधार को और योजनाओं में लाने से 11 अरब डॉलर की बचत होने की संभावना है। जब मैंने इस अनुमान की परख ले लिए पेपर को खोजा तो पाया कि उसमें केवल इतना ही लिखा है कि भारत सरकार का नकद हस्तांतरण योजनयों पर बजट 11 अरब डॉलर है। विश्व बैंक ने ‘बचत’ की नई परिभाषा दी है, जिसमें सारे बजट ही ख़त्म कर देने को ‘बचत’ कहा गया है। अब सीएजी की रिपोर्ट आई है, जिसमें उन्होंने कहा है कि एलपीजी-डीबीटी की वजह से केवल 2000 करोड़ रुपये बचे हैं न कि 12,000 करोड़ रुपये और बचत कीमतों की गिरावट से हुई है। जबकि सरकार ने इस रिपोर्ट को नकार दिया है। आधार और सामाजिक सुरक्षा को छोड़ दें, तो भी इससे हम सब का सरोकार है। सरकारें प्रोपगेंडा का इस्तेमाल हमेशा से करती आ रही हैं, इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है। लेकिन सूचना के सब स्रोत अगर सरकारी प्रोपगेंडा ही फैलाने लगे, तो इससे सभी को नुक़सान है। सरकार को, लोगों को और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को।
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