50 से ज्यादा नेताओं को निकालने के बाद भी क्यों कायम है जलवा?
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बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती को शायद स्वामी प्रसाद मौर्य के इरादों की भनक नहीं लग पाई। वरना वो उन्हें पार्टी छोड़ने का मौका नहीं देतीं। वो मौर्य को भी उन पचास से ज्यादा बसपा नेताओं की तरह ही बाहर का रास्ता दिखा देतीं, जिन्होंने किसी भी मुद्दे पर उनसे मतभेद जाहिर किए।
कांशीराम के समय के अधिकतर बसपा नेता आज या तो बसपा से बाहर किए जा चुके हैं। कुछ हैं जो बाहर जाकर वापस आए हैं। लेकिन उनकी पार्टी में अभी भी दोयम दर्जे की हैसियत है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे कांशीराम के इक्का-दुक्का साथी अगर अभी भी बसपा में बने हुए हैं, तो उसकी वजह उनका सिर्फ आज्ञाकारी कार्यकर्ता बने रहना है।
अधिकतर को पार्टी से निकाले जाने की वजह यही थी कि वे ख़ुद को नेता समझने लगे थे। कौन भूल सकता है उस दुबले-पतले दाढ़ी वाले फायरब्रांड नौजवान को जिसने 1991 चुनाव में वाराणसी संसदीय क्षेत्र की मतगणना के दौरान दूरदर्शन पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व पुलिस महानिदेशक श्रीश चंद्र दीक्षित को करारा जवाब देकर चुप करा दिया था।
1993 में वो सपा-बसपा की गठबंधन सरकार में मंत्री बने। लेकिन 1996 में उन्हें मायावती का प्रकोप झेलना पड़ा। कुछ समय सपा में बिताकर वह 2009 में वापस बसपा में शामिल हुए। लेकिन मायावती का विश्वास जीत पाने में नाकाम रहे। पिछले साल वो बीजेपी में शामिल हो गए। लेकिन इन सबके बीच 1996 से पहले वाला दीनानाथ भास्कर कहीं गुम होकर रह गया।
स्वामी के जाने से नहीं पड़ेगा फर्क
अब शायद किसी को डाक्टर मसूद अहमद की याद होगी? वे मुलायम सिंह के मंत्रिमंडल में शिक्षामंत्री थे। 1994 जून में तत्कालीन बसपा महासचिव मायावती से उनके मतभेद हो गए। न चाहते हुए भी मुलायम को उन्हें न सिर्फ अपने मंत्रिमंडल से हटाना पड़ा बल्कि मायावती के दबाव में आधी रात को सरकारी बंगले से मसूद अहमद का सामान निकाल कर फिंकवाना पड़ा।
बाद में उन्होंने अपनी पार्टी बनाई लेकिन आज तक एक भी सीट नहीं जीत पाए। कांशीराम के करीबी माने जाने वाले सुधीर गोयल को आज तक पता नहीं है कि उन्हें बसपा से क्यों निकाला गया। शायद वे मायावती का विश्वास नहीं जीत पाए थे। इसी तरह का हाल बरखूराम वर्मा का भी हुआ जो लंबे समय तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष रहे।
एक दिन अचानक 'पार्टी विरोधी गतिविधियों' में लिप्त होने के आरोप में पार्टी से निकाल दिए गए। काफी समय बाद उनकी बसपा में वापसी तो हुई लेकिन पिछले साल उनकी मृत्यु हो गई। यही हाल जंगबहादुर पटेल और सोनेलाल पटेल का हुआ। सोनेलाल ने अपनी पार्टी 'अपना दल' बनाया लेकिन राज्य की राजनीति को कभी बहुत प्रभावित नहीं कर पाए। हाँ, उनकी बेटी अनुप्रिया जरुर बीजेपी के साथ गठबंधन कर 2014 में लोकसभा की दो सीटें जीतने में सफल रहीं।
लेकिन ऐसा नहीं है कि स्वामी प्रसाद मौर्य के जाने से बसपा को झटका लगेगा। जब इतने ढेर सारे पटेल और वर्मा नेताओं को निकालने के बाद भी वो 2007 में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने में सफल रहीं, उन्हें एक मौर्य के जाने से क्यों चिंता होगी।
'बहनजी की डिक्शनरी में माफी शब्द नहीं'
अपने मुख्यमंत्रित्व काल में मायावती ने 26 प्रभावशाली नेताओं को निकाल बाहर किया। इनमें 13 मंत्री और दूसरे मंत्री स्तर के दर्जा प्राप्त लोग, सांसद और विधायक थे। बसपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं कि बहनजी की डिक्शनरी में माफी शब्द नहीं है।
पार्टी या सरकार की छवि को धक्का पहुंचाने वालों को वह बर्दाश्त नहीं करतीं। हालांकि निकालने से पहले चेतावनी जरूर दे देती हैं। उन्होंने अपनी ही पार्टी के सांसद उमाकांत यादव को मुलाकात के लिए मुख्यमंत्री आवास बुलाया और एक पुराने आपराधिक मामले में वहीं से गिरफ्तार करा दिया।
चाहें उनके चहेते सांसद धनंजय सिंह हों या विधायक योगेंद्र सागर, वो किसी को नहीं बख्शतीं। प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला देने वाले एनआरएचएम घोटाले के चलते जिसमें दो-दो मुख्य चिकित्साधिकारियों की हत्या कर दी गई थी, मायावती ने अपने सबसे नजदीकी मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को भी एक झटके में मंत्रिमंडल से निकाल बाहर किया था।
'बसपा में किसी की सोच बर्दाश्त नहीं'
कुशवाहा के साथ ही स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्र से भी इस्तीफा ले लिया गया था। हाल ही में सीतापुर जिले के पूर्व मंत्री अब्दुल मन्नान, उनके भाई अब्दुल हन्नान, राज्य सभा सदस्य रहें नरेंद्र कश्यप हों या एमएलए रामपाल यादव, मायावती की पसंदीदा लोगों की सूची से बाहर होते ही सबके सब पार्टी से बाहर कर दिए गए।
कांशीराम के साथी रहे दद्दू प्रसाद, राज बहादुर, राम समुझ, हीरा ठाकुर और जुगल किशोर जैसे नेता भी मायावती के प्रकोप से नहीं बच पाए। यहां तक कि स्टेट गेस्ट हाउस हमले के समय मायावती का साथ देने वाले कैप्टन सिकंदर रिजवी के नखरे भी बहनजी ने बर्दाश्त नहीं किए। आज यह कांशीराम की नहीं, मायावती की बसपा है।
इसे सतीश मिश्र, नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी, रामवीर उपाध्याय, सुखदेव राजभर, जयवीर सिंह, रामअचल राजभर, इंद्रजीत सरोज और लालजी वर्मा जैसे लोग चला रहे हैं। या कहें तो मायावती के निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित कर रहे हैं। यहां किसी को भी अपनी सोच, अपना टैलेंट दिखाने की कोशिश करने की जरूरत नहीं है। करना है तो किसी दूसरे दल में जाकर दिखाएं।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)