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रहने के लिए सबसे खराब शहर है यूपी का रामपुर- स्कूल, अस्पताल, बिजली सबकी हालत है बदतर

Thu, 16 Aug 2018 09:23 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रामपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रामपुर Updated Thu, 16 Aug 2018 09:23 AM IST
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the worst city to live in rampur UP
rampur
रामपुर रहने के लिहाज से सबसे खराब शहरों में दर्ज हो गया है। वर्तमान में रामपुर सपा के दिग्गज नेता आजम खान का शहर कहा जाता है। लेकिन यहां पर कोई सिटी बस सर्विस नहीं है। स्थानीय अस्पतालों की हालत, स्कूल और बिजली सप्लाई की स्थिति भी बेहद खराब है। रामपुर के लोग खुद भी यही कहते हैं यह सिर्फ नाम का शहर है। देश भर में इस शहर का इतना नाम होने के बाद भी यहां सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं है। यही नहीं केंद्र ने भी इस बात पर अब मुहर लगा दी है। 
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एक अंग्रेजी अखबार में छपी खबर के मुताबिक 25 वर्षीय सेल्स एग्जिक्यूटिव लक्ष्या सक्सेना कहती हैं कि यह सही बात है कि इस शहर की स्थिति बेहद बदतर है। 25 साल की एक सेल्स एग्जिक्यूटिव लक्ष्या सक्सेना ने कहा कि हम लोग सही कह रहे हैं कि इससे बदतर कुछ और नहीं हो सकता है। 
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बता दें कि शहरी मामलों के मंत्रालय ने 2018 के शहरों की सूची जारी की है। जिसमें रामपुर को खराब शहरों की सूची में रखा गया है। रामपुर को 111वें नंबर पर रखा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक रामपुर के सवा तीन लाख लोग एक दिन में करीब 165 टन कूड़ा निकालते हैं। इसमें से कुछ को शहर के पास ही घाटमपुर गांव के पास फेंक दिया जाता है जबकि बाकी कूड़ा सड़कों या कहीं खाली जगह पर ही फेंक दिया जाता है। क्योंकि इसके लिए शहर में कोई मैनेजमेंट की सुविधा नहीं है। वहीं स्थानीय वकील सैयद अमीर ने कहा कि शहर में बिजली की हालत बेहद खराब है जबकि हमेशा कहा गया था कि कूड़े से बिजली पैदा होगी। चारों तरफ कूड़ा ही कूड़ा है लेकिन बिजली का कुछ अता पता नहीं है। 
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रामपुर मुख्य स्वच्छता अधिकारी टीपीएस वर्मा के मुताबिक इसके लिए स्टाफ जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि 1991 के सरकारी आदेश के अनुसार प्रत्येक 10 हजार जन संख्या पर 28 सफाईकर्मी होने चाहिए। हमारे पास 355 स्थायी नियुक्तियों के लिए सिर्फ 199 और 534 कॉन्ट्रैक्ट वाले कर्मचारियों की जगह पर महज 170 हैं। उन्होंने कहा कि हमें 43 में से 21 वॉर्डों की सफाई के लिए बाहर से लोगों की व्यवस्था करनी पड़ती है।  

सरकारी अस्पताल की हालत भी कुछ ऐसी ही है यहां 27 डॉक्टों की बजाय सिर्फ 13 ही डॉक्टर हैं। जो रोजाना करीब 4 हजार मरीजों को देखते हैं। वार्ड में भी एक बेड पर दो मरीजों को सोना पड़ता है। अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट, न्यूरोलॉजिस्ट, स्किन स्पेशलिस्ट डॉक्टर तक नहीं हैं। बीमारी बढ़ जाने का अन्य गंभीर बीमारी के लिए लोगों को बाहर का रुख करना पड़ता है। 

सरकारी छोड़िए किसी प्राइवेट अस्पताल में भी यहां एमआरआई मशीन नहीं है। यहां एक स्कूल में 147 बच्चों के लिए सिर्फ दो क्लासरूम हैं। हालात यह हैं कि स्कूल में बेंच तक नहीं है। बच्चों के पास किताबें तक नहीं हैं। शहर में ट्रांसपोर्ट की सुविधा भी अच्छी नहीं है। लोगों को कहीं आने जाने के लिए ऑटो और ई-रिक्शा का ही सहारा लेना पड़ता है। 


बिजली की स्थिति बेहद खराब है। लोगों का कहना है कि आम सुविधाओं के नाम पर इस शहर में कुछ भी नहीं है। हालांकि डीएम महेंद्र बहादुर सिंह ने कहा कि हम टॉप 50 शहरों में जगह बनाने की कोशिश करेंगे। 
 
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