इबोला पर जीत पाने वाले डॉक्टर को क्यों है कोरोना का डर, पढ़िए कोरोना योद्धा की कहानी
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चीन के वुहान शहर से फैला कोरोना वायरस दुनिया में 14,53,804 लोगों को अपनी चपेट में ले चुका है। कोरोना ने अपना कहर इस कदर बरपाया है कि दुनिया में 90,000 के करीब लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। चीन के बाद कोरोना ने अमेरिका, इटली, स्पेन और फ्रांस जैसे देशों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है।
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कोरोना से लड़ने में सबसे बड़ा हाथ डॉक्टरों का है, जो अपनी जान को खतरे में डालकर भी कोरोना से संक्रमित मरीजों की सेवा कर रहे हैं। दिन के 12-14 घंटे ये डॉक्टर अस्पताल में मरीजों का ध्यान रखते हैं। अमेरिका के ऐसे ही एक डॉक्टर क्रैग स्पेन्सर ने कोरोना से खुद की लड़ाई की कहानी साझा की है। डॉ स्पेन्सर ने बताया कि साल 2014 में उन्होंने कैसे इबोला को मात दी लेकिन कोरोना वायरस जैसी बीमारी उन्हें वास्तव में डराती है।
डॉ स्पेन्सर कोलांबिया यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के ग्लोबल हेल्थ के अध्यक्ष हैं और इनकी उम्र मात्र 38 साल है। इबोला जैसे फ्लू पर जीत पाने के बाद भी डॉ स्पेन्सर को कोरोना वायरस का संक्रमण डराता है। उन्होंने बताया कि जब वह आपातकालीन कक्ष में जाते हैं तो वहां एक तेज चमकीली रोशनी दिखती है जो हर किसी के चश्मे पर जल रही होती है। उस कमरे में आप कई सारे मॉनिटर की आवाजें सुनते हैं, अलग अलग मरीजों के खांसने, छींकने की आवाजें आती है जो बहुत डरावनी होती हैं।
कोरोना से संक्रमित मरीजों के लिए अलग से इमरजेंसी कमरे बनाए गए हैं, वहां कई ऐसे मरीज हैं जो पहले से बहुत बीमार हैं और उनके मुंह में नली लगाई गई है। कई बुजुर्ग मरीज भी रहते हैं जो वेंटिलेटर के सहारे जिंदा रहते हैं। अमेरिका के डॉक्टर्स ने इमरजेंसी रूम या फिर इंटेंसिव केयर में ऐसी स्थिति के बारे में कभी नहीं सोचा था जैसा कोरोना महामारी फैलने के बाद हो गया है।
डॉ स्पेन्सर बताते हैं कि अस्पताल से घर जाना अपने आप में बड़ा काम है। अस्पताल में शिफ्ट खत्म होने के बाद डॉक्टर स्पेन्सर अपने हाथों को धोकर सैनिटाइज करते हैं। मेरे साथ मेरा जो भी सामान चाहे वो पर्स, बैग या मेरा आला हो घर आने से पहले उन्हें अच्छे धोया जाता है। अस्पताल में पहने जूते और कोट घर के बाहर एक डब्बे में रखे जाते हैं और कमीज और पेंट दरवाजे के आगे ही रख दी जाती है। घर जाने के बाद भी मुझे अपने बच्चों से अलग रहना पड़ता है और उनकी बेटी पूरे दिन उन्हें नहीं देख पाती है, ये काफी दुखदायी है।
डॉ स्पेन्सर कहते हैं कि इबोला निश्चित तौर पर भयंकर था, इबोला से कुल संक्रमित लोगों में से आधे लोगों की जान गई थी। हमारी टीम जानती थी कि इबोला से सबकी जान को खतरा हो सकता है। शायद इसलिए कई डॉक्टर्स ने कोरोना से लड़ने की जिम्मेदारी नहीं ली। 24 मार्च को डॉ स्पेन्सर ने इमरजेंसी रूम में होने वाली गतिविधियों को ट्वीट के जरिए बताने का फैसला किया। डॉक्टर को लगा कि आम जनता तक ये सच्चाई पहुंचनी चाहिए कि कोरोना से लड़ना इतना आसान नहीं है इसलिए कोरोना को गंभीरता से लिया जाए।
Thank you everyone for your incredible messages of support and encouragement.♥️
— Craig Spencer MD MPH (@Craig_A_Spencer) March 24, 2020
Many of you asked what it was like in the ER right now. I want to share a bit with you. Please RT:
A Day in the Life of an ER Doc - A Brief Dispatch from the #COVID19 Frontline:
उन्होंने बताया कि वह और उनके साथ के डॉक्टर ये जानते थे कि उन्हें कोरोना हो सकता है का संक्रमण हो सकता था, हालांकि उनमें से कुछ डॉक्टर्स में कोरोना के लक्षण पाए गए। डॉ स्पेन्सर ने सभी से एक सवाल किया कि आखिर कब तक डॉक्टर्स को अपने परिवार, दोस्तों, बच्चों से दूर रहना पड़ेगा? कोरोना से पूरी दुनिया प्रभावित है और सभी डॉक्टर्स इसे बड़ा दुख बता रहे हैं।