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अमेरिका के साथ हुए समझौते से बदलेगा क्षेत्रीय सैन्य संतुलन

Tue, 30 Aug 2016 10:41 PM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Tue, 30 Aug 2016 10:41 PM IST
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The defence ties with the US will change the regional military balance
भारत-अमेरिका के बीच डील
भारत ने अमेरिका के साथ बहु प्रतीक्षित लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (एलईएमओए)समझौता किया है। इस समझौते के बाद अमेरिका जहां भारतीय सैन्य संसाधनों का इस्तेमाल कर सकेगा, वहीं भारत को अमेरिका के संसाधन इस्तेमाल करने का अधिकार होगा। सामरिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इससे क्षेत्रीय सैन्य संतुलन में काफी बड़ा बदलाव होने के आसार हैं।
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दरअसल, इस समझौते के बाद भारत और अमेरिका दोनों एक दूसरे के सैन्य संसाधन का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे जहां भारतीय सैनिकों को अत्याधुनिक अमेरिकी सैन्य साजो-सामान के करीब जाने का अवसर मिलेगा, वहीं एशिया क्षेत्र में अमेरिका की आवाजाही काफी तेज हो जाएगी। अमेरिका के पोत भारतीय नौसैनिक बंदरगाहों पर आ सकेंगे। यहां ठहर सकेंगे और तेल ईधन समेत अन्य को प्रप्त कर सकेंगे।  इसी तरह से अमेरिकी वायुसेना के विमान भी भारतीय वायुसैनिक अड्डे का इस्तेमाल कर सकेंगे। तेल ईधन आदि ले सकेंगे। भारतीय सैन्य बलों को भी यही अमेरिकी सैन्य बेस में यह सहूलियत मिल जाएगी।
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और क्या होगा
समुद्री क्षेत्र हो या हवाई और जमीनी क्षेत्र आपस में मानवीय सहायता का आदान-प्रदान होगा।
संयुक्त सैन्य युद्धाभ्यास, रक्षा क्षेत्र में सहयोग आदि को बढ़ावा मिलेगा।

क्या नहीं होगा
भारत और अमेरिका दोनों एक दूसरे के देश में कोई सैन्य बेस नहीं बनाएंगे। न ही अमेरिका की सेना, नौसेना या वायुसेना भारत में स्थायी तौर पर रहेगी। इसी तरह से भारत भी ऐसा नहीं कर सकेगा।
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इस समझौते से किसे लाभ, भारत और अमेरिका

The defence ties with the US will change the regional military balance
अमेरिका इंडिया
आगे की क्या रणनीति
भारत और अमेरिका दोनों दो समझौतों को और अंतिम रूप दे रहे हैं। कम्युनिकेशन इंटरआपरेटिबिलिटी एंड सेक्योरिटी मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट(सीआईएसएमओए) और बेसिक एक्सचेंज एंड कोआपरेशन एग्रीमेंट फॉर जिओस्पेशल कोऑपरेशन(बीआसीए)। इन दोनों समझौतों के बाद भारत और अमेरिका के बीच में रक्षा, सूचनाओं की साझेदारी और सहयोग की दिशा में मजबूत रिश्तों को आधार मिल सकेगा।

भारत को होगा लाभ
भारत और अमेरिका आतंकवाद के विरुद्ध साझा अभियान के पक्षधर हैं। इसके तहत भारत को सीमापार के आतंकवाद समेत, समुद्री क्षेत्र की घुसपैठ समेत अन्य पहलुओं पर अमेरिका से सूचनाएं मिल सकेंगी। भारत क्षेत्रीय हितों को मजबूती के साथ आगे बढ़ा सकेगा। पाकिस्तान से प्रायोजित आतंकवाद समेत अन्य में सूचनाओं की साझेदारी और सहयोग कारगर हो सकेगा।

अमेरिका को लाभ
अमेरिका एशिया में लगातार पैठ बढ़ा रहा है। चीन की विस्तारवादी नीतियां, दक्षिण सागर में चीन की उपस्थिति वाशिंगटन को खटक रही है। ऐसे में उसे भारत का साथ मिलने के साथ-साथ अपने विमानों, पोतों आदि के लिए लॉजिस्टिक सपोर्ट मिल सकेगा।

क्यों भड़क रहे हैं चीन-पाकिस्तान

The defence ties with the US will change the regional military balance
अमेरिका और भारत के सैन्य सहयोग के क्षेत्र में करीब आने से जहां चीन की भौहें तन रही हैं, वहीं पाकिस्तान को भी यह रिश्ता अखर रहा है। चीन दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप का निर्माण कर रहा है। वह इसे सैन्य बेस के रूप में भी विकसित कर रहा है और अमेरिका इसके खिलाफ है। भारत का भी मानना है कि यह स्वतंत्र सामुद्रिक क्षेत्र है और इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार स्वतंत्र और भयरहित आवाजाही होनी चाहिए।

चीन ने पाकिस्तान के साथ ग्वादर में बंदरगाह को विकसित करना आरंभ किया है। यह पाकिस्तान के बलूचिस्तान में आता है। यहां से चीन गिलगिट, बालटिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर होते हुए अपनी सीमा  तक आर्थिक गलियारा विकसित कर रहा है। इस क्षेत्र का एक बड़े हिस्से पर भारत अपना दावा जताता है। इसलिए भारत को चीन का कदम नागवार गुजर रहा है।

हाल में भारत ने बलूचिस्तान में मानव अधिकारों के हनन के साथ गिलगिट, बालटिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर का मुद्दा उठाया है। अमेरिका ने भी बलूचिस्तान को लेकर भारत के कदम का समर्थन किया है। इससे चीन को पाकिस्तान में आर्थिक गलियारे के विकास पर संकट के बादल नजर आने लगे हैं।
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