स्विस बैंक के खाते खंगालने में जुटी सरकार, नए करार से आई तेजी
विदेशों में जमा कालेधन का पता लगाने के प्रयासों में तेजी लाते हुए भारत ने हाल के महीनों में स्विटजरलैंड से तकरीबन 20 प्रशासनिक सहायता अनुरोध किए हैं ताकि कर चोरी कर स्विस बैंकों में धन जमा करने वाले भारतीयों का ब्योरा मिल सके।
भारत ने जिन व्यक्तियों और कंपनियों के बारे में जानकारी देने का अनुरोध किया है, उनमें कम से कम तीन सूचीबद्ध कंपनियां, एक बड़ी रियल एस्टेट कंपनी के सीईओ और दिल्ली के पूर्व नौकरशाह की पत्नी, दुबई स्थित भारतीय मूल के निवेशक बैंकर, एक हाई प्रोफाइल भगोड़ा और उसकी पत्नी, अरब स्थित एक होल्डिंग कंपनी और विदेशों में बस चुके कई गुजराती कारोबारी शामिल हैं।
इनमें से कई व्यक्तियों पर संदेह है कि उन्होंने पनामा और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड जैसी जगहों पर विदेशी कंपनियों के जरिये स्विस बैंक में खाते खुलवा लिए हैं।
जानें क्या हैं ‘प्रशासनिक सहायता’ अनुरोध?
इन ‘प्रशासनिक सहायता’ अनुरोध में किसी देश को अपने नागरिकों द्वारा कर चोरी के सबूत देने पड़ते हैं जिसका आकलन करने के बाद स्विस प्रशासन अपने कानून के अनुसार फेडरल गजट जारी करता है। इसके तहत संदिग्धों को अपने खाते की जानकारी गोपनीय रखने की अपील का आखिरी मौका मिलता है।
पिछले हफ्ते भारत और स्विटजरलैंड ने सितंबर 2018 के बाद स्विस बैंकों के खातों की जानकारी का स्वत: आदान-प्रदान करने का एक समझौता किया था। दोनों देशों के बीच कर समझौते के तहत पहले भी भारत के अनुरोध पर कई भारतीयों के खातों की जानकारी दी जा चुकी है।
दोनों देशों के बीच नए समझौते से इस प्रक्रिया में और तेजी आई है और स्विटजरलैंड ने कई मामलों में भारत के साथ सूचनाओं का साझा भी किया है। इसके तहत आयकर विभाग तथा प्रवर्तन निदेशालय ने अपने-अपने स्तर पर कार्रवाई भी तेज कर दी है।