SC: तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में 8 अप्रैल को सुनाए गए 'सुप्रीम' फैसले के बाद अब क्या हुआ, आगे क्या?
तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा विधेयक पर फैसला लेने की समयसीमा तय किए जाने पर काफी कुछ कहा गया। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताई थी। अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए हैं।
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विस्तार
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में राज्य विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए राज्यपाल और राष्ट्रपति पर समयसीमा तय करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। राष्ट्रपति ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 (राज्यपाल की शक्तियों) और अनुच्छेद 201 (राष्ट्रपति की शक्तियों) में बिलों को मंजूरी देने या रोकने के लिए कोई समयसीमा या प्रक्रिया निर्धारित नहीं है।
राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की ओर से पूर्ण शक्ति के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाया। इसके तहत शीर्ष अदालत ने बिलों को फिर से तमिलनाडु के राज्यपाल के समक्ष पेश करने को कहा था, इसमें इन बिलों को पारित माने जाने का निर्देश था। उन्होंने मान्य मंजूरी की अवधारणा को सांविधानिक ढांचे के खिलाफ बताया और कहा कि यह राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करता है। राष्ट्रपति ने यह भी उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों में राष्ट्रपति की मंजूरी की न्यायिक समीक्षा पर विरोधाभासी राय दी गई है, जिसके लिए स्पष्टता की आवश्यकता है।
ये है मामला
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में 8 अप्रैल को फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल विधानसभा से पारित बिलों को अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकते। यदि राज्यपाल किसी बिल को राष्ट्रपति के पास विचार के लिए भेजते हैं, तो राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा था कि व्यक्तिगत असंतोष, राजनीतिक स्वार्थ या अन्य किसी असंगत या अप्रासंगिक विचार जैसे आधारों पर विधेयक को सुरक्षित रखना संविधान के तहत पूरी तरह अनुचित है।
अनुच्छेद 143 (1) में यह प्रावधान
संविधान का अनुच्छेद 143 (1) राष्ट्रपति की शीर्ष अदालत से परामर्श करने की शक्ति से संबंधित है। प्रावधान कहता है कि यदि किसी भी समय राष्ट्रपति को ऐसा प्रतीत हो कि कानून या तथ्य का कोई प्रश्न उत्पन्न हुआ है, या उत्पन्न होने की संभावना है, जो ऐसी प्रकृति और ऐसे सार्वजनिक महत्व का है कि उस पर सुप्रीम कोर्ट की राय प्राप्त करना समीचीन है, तो वह उस प्रश्न को विचार के लिए उस न्यायालय को भेज सकते हैं व न्यायालय, ऐसी सुनवाई के बाद, जैसा वह ठीक समझे, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय बता सकता है।