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Supreme Court: 'बिना सुनवाई के दो साल जेल में रखना सजा जैसा', अदालत ने हत्या की कोशिश के आरोपी को दी जमानत

Sun, 29 Mar 2026 04:10 PM IST
Himanshu Singh Chandel न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Himanshu Singh Chandel Updated Sun, 29 Mar 2026 04:10 PM IST
सार

Trial Delay: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बिना ट्रायल लंबे समय तक जेल में रखना सजा जैसा है। इसी आधार पर अदालत ने हत्या की कोशिश के मामले में करीब दो साल से जेल में बंद पंजाब के आरोपी प्रदीप कुमार उर्फ बानू को जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि 23 गवाहों में से एक भी पेश नहीं हुआ। 

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Supreme Court bail order incarceration without trial attempt to murder case India Punjab accused judiciary
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : PTI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी आरोपी को बिना मुकदमे की सुनवाई शुरू हुए लंबे समय तक जेल में रखना, सजा देने जैसा है। इसी अहम टिप्पणी के साथ अदालत ने पंजाब के एक आरोपी को जमानत दे दी, जो हत्या की कोशिश के मामले में करीब दो साल से जेल में बंद था। अदालत ने माना कि जब ट्रायल शुरू ही नहीं हुआ और जल्द खत्म होने के भी आसार नहीं हैं, तब आरोपी को लगातार जेल में रखना ठीक नहीं है।

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अदालत ने यह फैसला प्रदीप कुमार उर्फ बानू की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि फरवरी 2024 में उसके खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। उस पर हत्या की कोशिश समेत कई आरोप लगाए गए। लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक इस मामले में अभियोजन पक्ष 23 गवाहों में से एक भी गवाह को अदालत में पेश नहीं कर पाया है। ऐसे में साफ है कि मुकदमे को पूरा होने में अभी काफी समय लगेगा।
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क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने देरी से चल रहे ट्रायल पर?
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति पी. वी. वराले की पीठ ने 13 मार्च के अपने आदेश में कहा कि आरोपी की गिरफ्तारी के बाद लगभग दो साल बीत चुके हैं, लेकिन अब तक मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हुई है। अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति का ट्रायल ही शुरू नहीं हो रहा, तब उसे जेल में बंद रखना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ जाता है। पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि बिना ट्रायल कैद में रखना, सजा देने के बराबर है।
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हाईकोर्ट के पुराने आदेश पर क्या फैसला हुआ?
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के 11 जुलाई 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें प्रदीप कुमार की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। शीर्ष अदालत ने पूरे मामले को देखते हुए कहा कि अब आरोपी को और ज्यादा समय तक जेल में रखना जरूरी नहीं है। अदालत ने माना कि जब गवाहों की जांच शुरू नहीं हुई और मुकदमा जल्द खत्म होता नहीं दिख रहा, तब जमानत देना उचित है।

अदालत ने कौन सी शर्तें लगाईं?
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को जमानत तो दे दी, लेकिन इसके साथ कई सख्त शर्तें भी लगाईं। अदालत ने कहा कि आरोपी को ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के मुताबिक जमानत बॉन्ड भरना होगा। साथ ही ट्रायल कोर्ट जो दूसरी शर्तें तय करेगा, उनका भी पालन करना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी सीधे या परोक्ष रूप से किसी गवाह को धमका नहीं सकता, लालच नहीं दे सकता और न ही किसी को अदालत में सच बताने से रोक सकता है।


अगर आरोपी शर्तें तोड़े तो क्या होगा?
अदालत ने साफ कर दिया कि अगर जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन हुआ, तो ट्रायल कोर्ट उसकी जमानत रद्द कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को यह भी निर्देश दिया कि वह मुकदमे की हर सुनवाई में ईमानदारी से उपस्थित रहे, जब तक कि उसे अदालत से छूट न मिली हो। अगर वह बिना उचित कारण के सुनवाई से गायब रहता है, तो इसे भी जमानत की शर्तों का उल्लंघन माना जाएगा और ट्रायल कोर्ट उसके खिलाफ उचित आदेश पारित कर सकता है।

क्या जमानत का मतलब आरोपों से राहत है?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी साफ कर दिया कि जमानत देने का मतलब यह नहीं है कि आरोपी को मामले में क्लीन चिट मिल गई है। अदालत ने कहा कि इस आदेश में की गई टिप्पणियों को मामले के गुण-दोष पर अंतिम राय नहीं माना जाएगा। यानी मुकदमे की सुनवाई आगे भी चलेगी और अदालत सबूतों तथा गवाहों के आधार पर ही अंतिम फैसला करेगी। फिलहाल शीर्ष अदालत ने सिर्फ इतना माना है कि बिना सुनवाई शुरू हुए आरोपी को अनिश्चित समय तक जेल में रखना न्यायसंगत नहीं है।


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