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सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर में पाबंदियों पर सवाल उठाने वालों से पूछा, क्या दंगा भड़कने का इंतजार करते?

Fri, 08 Nov 2019 02:32 AM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Fri, 08 Nov 2019 02:32 AM IST
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Supreme Court asked those who questioned restrictions in kashmir Should have waited for riot
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

अनुच्छेद-370 को खत्म करने के बाद जम्मू एवं कश्मीर में पाबंदी के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्या अथॉरिटी को तब तक इंतजार करना चाहिए था जब तक कि वहां दंगा नहीं भड़क जाता?

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जस्टिस एनवी रमन्ना की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने वृहस्पतिवार को इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल से कहा कि इस तरह के मसले पर क्यों नहीं यह अंदेशा होना चाहिए कि पूरा इलाका या जगह अशांत हो सकता है? वास्तव में पीठ ने यह टिप्पणी तब कि जब सिब्बल ने कहा कि अथॉरिटी द्वारा कश्मीर में संचार व परिवहन सेवा में पाबंदी उचित नहीं है।
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सिब्बल ने पीठ से कहा कि शांति भंग होने की आशंका को लेकर बिना किसी तथ्य व प्रमाण के अथॉरिटी इस तरह की पाबंदी नहीं लगा सकती। उन्होंने कहा कि, 'आखिर सरकार यह कैसे मानकर चल सकती है कि पूरी आबादी खिलाफ हो सकती है और वहां कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने कहा घाटी में दस जिले हैं, क्या 70 लाख लोगों को पंगु बनाना जरूरी था? हम यहां जम्मू एवं कश्मीर के लोगों केअधिकार की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि भारत के लोगों के अधिकारों की बात कर रहे हैं।’
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उन्होंने कहा कि अथॉरिटी को कानून-व्यस्थता बिगडने की आशंका हो सकती है, लेकिन अथॉरिटी के पास इस अंदेशे का आधार तो होना चाहिए। इस पर पीठ ने कहा, 'क्या अथॉरिटी को तब तक इंतजार करना चाहिए था जब तक वहां दंगा न भड़क जाए।’ जवाब में सिब्बल ने कहा, आखिर वे कैसे अनुमान लगा सकते हैं कि वहां दंगा हो सकता है। यह दर्शाता है कि उनके दिमाग में ऐसा अंदेशा था न कि कोई प्रमाण या तथ्य था। सिब्बल ने यह भी कहा कि राज्य के बाद बहुत शक्ति होती है।


अगर ऐसी कोई स्थिति उत्पन्न होती तो अथॉरिटी वहां धारा-144 लगा सकती थी। राज्य का दायित्व न सिर्फ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है बल्कि जरूरतमंदों की रक्षा करना भी है। उन्होंने कहा कि जम्मू एवं कश्मीर में क्या हो रहा है, भारत की जनता को यह जानने का हक है। उन्होंने कहा कि यह अधिकारों का बेजा इस्तेमाल है। यह सरासर धारा-144 का दुरूपयोग है। अगली सुनवाई 14 नवंबर को होगी।

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