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गांधीजी की हत्या मामले में अदालत मित्र नियुक्त, अगली सुनवाई 30 अक्तूबर को होगी

Sat, 07 Oct 2017 06:29 AM IST
एजेंसी, नई दिल्ली
एजेंसी, नई दिल्ली Updated Sat, 07 Oct 2017 06:29 AM IST
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Supreme Court Appoints Amicus Curiae To Assess New Probe for Mahatma Gandhi Murder
- फोटो : twitter

सुप्रीम कोर्ट ने महात्मा गांधी की हत्या की दोबारा जांच की मांग करने वाली एक जनहित याचिका पर शुक्रवार को कई तीखे सवाल पूछे और संक्षिप्त सुनवाई के बाद इस मामले में कोर्ट की मदद करने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अमरेंद्र शरण को अदालत मित्र नियुक्त कर दिया।

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याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि गांधी पर गोली चलाने वाला कोई तीसरा व्यक्ति भी था, जिसके बारे में जानने के लिए केस की दोबारा सुनवाई जरूरी है। अगली सुनवाई 30 अक्तूबर को होगी। जस्टिस एसए बोबडे और एल नागेश्वर राव ने शुरुआत में ही कहा कि कानूनन इस मामले में कुछ करने को नहीं रह गया है क्योंकि केस का फैसला बहुत पहले हो चुका है। हालांकि खंडपीठ ने बाद में शरण से कहा कि इस मामले का आकलन करते समय उसकी इस टिप्पणी का उन पर कोई असर नहीं होना चाहिए।
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सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका मुंबई के डॉ. पंकज फडनीस ने दायर की है जो एक शोधकर्ता होने के साथ अभिनव भारत के ट्रस्टी भी हैं। उन्होंने अपनी याचिका में इस केस को दोबारा खोले जाने के समर्थन में कई तर्क दिए हैं। उनका दावा है कि यह इतिहास की सबसे बड़ी लीपापोती है। हिंदू राष्ट्रवाद के समर्थक नाथूराम विनायक गोडसे ने गांधी की 30 जनवरी, 1948 को नई दिल्ली में बहुत नजदीक से गोली मारकर हत्या कर दी थी। 
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सुनवाई शुरू होते ही फडनीस ने गांधी की हत्या के केस की दोबारा जांच की दलील को मजबूती देने के लिए उससे जुड़े कुछ और दस्तावेज दाखिल करने के लिए समय दिए जाने की मांग की। इस पर खंडपीठ ने कहा कि अब इस मामले में क्या किया जा सकता है। याची ने कहा कि याचिका दायर करने के बाद उनके पास कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज आए हैं जिन्हें दाखिल करना जरूरी है। खंडपीठ ने कहा कि आपको जितना समय चाहिए ले लीजिए, लेकिन यह तो बताइए कि हम इस केस को दोबारा क्यों खोलें।

खंडपीठ ने बहस जारी रखते हुए याची से पूछा कि क्या वह किसी मामले में कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की समयसीमा के कानून से अवगत हैं, तो फडनीस ने कहा कि वह इस कानून के बारे में जानते हैं। इस केस में दोषी ठहराए गए लोगों ने फैसले के खिलाफ 1948 में ईस्ट पंजाब हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया था। इसके बाद मामला प्रिवी काउंसिल में गया जिसने उसे यह कहकर लौटा दिया कि स्वतंत्र भारत का सुप्रीम कोर्ट 1950 में अस्तित्व में आ जाएगा। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने कभी इस मामले की सुनवाई नहीं की।
गांधी को किसी और की भी गोली लगी थी

जब फडनीस ने कहा कि हो सकता है कि महात्मा गांधी पर किसी अन्य व्यक्ति ने गोली दागी थी, तो खंडपीठ ने कहा कि हम कानून के अनुसार चलना चाहते हैं न कि राजनीतिक आवेग के अनुसार। आप कह रहे हैं कि किसी और ने गांधी पर गोली चलाई हो सकती है, तो क्या वह व्यक्ति अभियोग का सामना करने के लिए जिंदा है। फडनीस ने कहा कि गांधी की हत्या के पीछे एक संगठित समूह का हाथ हो सकता है, तो कोर्ट ने कहा कि हम संगठन को दोषी नहीं ठहरा सकते हैं। इस फडनीस ने कहा कि वे नहीं जानते कि वह व्यक्ति जिंदा है या नहीं लेकिन कुछ सच्चाई का पता लगाने के लिए केस को दोबारा खोला जाना जरूरी है।

मुंबई हाईकोर्ट कर चुका है खारिज

फडनीस की इस जनहित याचिका को मुंबई हाईकोर्ट खारिज कर चुका है, जिसे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। हाईकोर्ट का कहना था कि इस केस से संबंधित सभी तथ्य निचली अदालत में रिकॉर्ड हो चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट तक उनकी जांच हो चुकी है। यही नहीं, कपूर आयोग ने 1969 में अपनी रिपोर्ट में इन तथ्यों की पुष्टि की है और यह याचिका इसके 46 साल बाद दायर की गई है। 

अपनी याचिका में फडनीस ने ‘तीन बुलेट सिद्धांत’ पर सवाल खड़े किए हैं, जिसके आधार पर विभिन्न न्यायालयों ने आरोपियों को दोषी ठहराया था। इस हत्या में नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को 15 नवंबर, 1949 को फांसी पर लटका दिया गया था और विनायक दामोदर सावरकर को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था। फडनीस का दावा है कि 1966 में गठित जेएल कपूर आयोग गांधी की हत्या के पीछे की पूरी साजिश का पर्दाफाश नहीं कर पाए थे।

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