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सुकमा हमले से गृह मंत्रालय सन्न, नक्सल नीति की होगी समीक्षा

Wed, 26 Apr 2017 10:48 AM IST
गुंजन कुमार/ अमर उजाला, नई दिल्ली
गुंजन कुमार/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 26 Apr 2017 10:48 AM IST
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Sukma attack: Government will review Naxal policy

सुकमा नक्सली हमले से गृह मंत्रालय भौचक है। मंत्रालय समेत पूरे नक्सल निरोधक तंत्र को इतने बड़े पैमाने पर नक्सलियों के फिर से संगठित होने की भनक नहीं थी। पिछले दो साल में नक्सल प्रभावित रेड कॉरिडोर में सुरक्षा बलों की मजबूत पकड़, उम्रदराज हो रहा माओवादी नेतृत्व और भारी संख्या में नक्सलियों के आत्मसमर्पण से सरकार के हौसले बुलंद थे। गृहमंत्रालय के नक्सल संबंधी नीतिकार मानने लगे थे कि जंगल में नक्सल समस्या पर लगभग काबू पा लिया गया है।

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लंबे समय बाद इतने बड़े हमले से केंद्र ने नक्सल विरोधी रणनीति को नए सिरे से कसने की तैयारी शुरू कर दी है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने एलान किया है कि नक्सल पॉलिसी की फिर से समीक्षा की जाएगी। इसके लिए 8 मई को नक्सल प्रभावित राज्यों के प्रतिनिधियों की बैठक होगी। 
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गृह मंत्रालय के शीर्ष सूत्रों ने ‘अमर उजाला’ को बताया कि केंद्र की सरेंडर पॉलिसी के तहत पिछले दो साल में छत्तीसगढ़, ओडिशा , आंध्र प्रदेश और झारखंड में करीब 1200 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। समर्पण करने वालों में ज्यादातर हथियार चलाने में निपुण नक्सली हैं, जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर सरेंडर पॉलिसी केतहत मिलने वाली रकम पाकर मुख्य धारा में शामिल भी हो चुकेहैं। विभिन्न योजनाओं के तहत सरेंडर करने वाले को दो से तीन लाख और हथियार के साथ सरेंडर करने वाले को चार से पांच लाख रुपये का प्रावधान है।
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सूत्रों ने बताया कि माओवादियों का शीर्ष नेतृत्व उम्रदराज हो चुका है। शीर्ष नेता गणपति सत्तर से ऊपर  का हो गया है और पांव के रोग से परेशान है। इसके अलावा सेंट्रल कमेटी और उसके नीचे केसंगठनात्मक ढांचे के नेता भी या तो मारे जा चुकेहैं या उम्र की मार झेल रहे हैं।

सूत्रों ने बताया कि रेड कॉरिडोर के सामरिक लिहाज से संवेदनशील ठिकानों पर सीआरपीएफ,बीएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी की टुकड़ियों को योजनाबद्ध तरीकेसे तैनात किया गया। ताकि नक्सलियों की आवाजाही में अवरोध पैदा किया जा सके।

इसका परिणाम यह हुआ है ओडिशा के कोरापुट और छत्तीसगढ़ केकई नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों का वर्चस्व बन गया। यही वजह है कि विभिन्न राज्यों के 44 नक्सल प्रभावित जिलों में 5412 किलोमीटर लंबे सड़क निर्माण का काम बिना किसी बड़े अड़चन के चल रहा है। वहां अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती दरअसल सड़क निर्माण में लगे लोगों की सुरक्षा केलिए है। इसके अलावा बचे हुए नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन और खुफिया विभाग सेसंबंधित गतिविधियां भी चल रही हैं। 

सूत्रों ने बताया कि पिछले करीब एक साल से नक्सलियों के लगातार कमजोर होने केइनपुट मिल रहे थे। हालांकि सूत्रों ने माना कि सुकमा का इलाका अभी भी संवेदनशील बना हुआ था। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर नक्सलियों के संगठित होने की खबर खुफिया तंत्र को नहीं थी। 

राजनाथ नाराज, आखिर सीआरपीएफ ही क्यों बनता है निशाना

Sukma attack: Government will review Naxal policy

सुकमा हमले से गृहमंत्री राजनाथ सिंह बेहद नाराज और क्षुब्ध हैं। उनका सवाल है कि नक्सलियों के हमले में अन्य अर्द्धसैनिक बल के सीआरपीएफ ही ज्यादा निशाना क्यों बन रहा है। वह भी इतनी बड़ी संख्या में इसके जवान शहीद होते हैं।

गृहमंत्री का मानना है कि सीआरपीएफ की मूल रणनीति में कोई कमी है। राजनाथ ने नक्सल मामले में केंद्र केसलाहकार विजय कुमार और सीआरपीएफ के कार्यवाहक महानिदेशक सुदीप लखटकिया को छत्तीसगढ़ में ही रुकने को कहा है। यह दोनों अधिकारी कमियों की समीक्षा करेंगे और साथ ही नक्सलियों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के लिए जमीनी रणनीति तैयार करेंगे।

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