कथाकार शेखर जोशी : सार्थक चीजें लिखना चाहता था, तो कमजोर वर्ग और सामाजिक सरोकार को रचनाओं का विषय बनाया
बचपन में मां की मृत्यु के बाद जब मैं मामा के पास राजस्थान के केकड़ी कस्बे पहुंचा, तो वहां मुझे पुस्तकों के बीच सुमित्रानंदन पंत जी की एक पतली कविता पुस्तक मिली थी-‘उच्छवास’, जो उन्होंने अपने हस्ताक्षर के साथ किसी को भेंट की थी। उन कविताओं को पढ़कर मैं अभिभूत हो गया था।
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अमर उजाला के सर्वोच्च सम्मान ‘आकाशदीप’ से सम्मानित वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशी (10 सितंबर 1932 - 4 अक्तूबर 2022) अब हमारे बीच नहीं रहे। ‘नई कहानी’ की पहचान को अपने तरीके से प्रभावित करने वाले शेखर जोशी की रचनाओं का मूल स्वर सामाजिक सरोकार ही रहा। कुछ दिन पूर्व उनसे हिंदी कथा साहित्य और ग्रामीण जीवन को लेकर देव प्रकाश चौधरी की लंबी बातचीत हुई थी। संभवत: यह उनका अंतिम साक्षात्कार था। उस साक्षात्कार के खास अंश-
आपने लेखकीय संस्कार कैसे ग्रहण किया और देश और विदेश के किन साहित्यकारों को पढ़ा?
बचपन में मां की मृत्यु के बाद जब मैं मामा के पास राजस्थान के केकड़ी कस्बे पहुंचा, तो वहां मुझे पुस्तकों के बीच सुमित्रानंदन पंत जी की एक पतली कविता पुस्तक मिली थी-‘उच्छवास’, जो उन्होंने अपने हस्ताक्षर के साथ किसी को भेंट की थी। उन कविताओं को पढ़कर मैं अभिभूत हो गया था। मंझले मामा पंडित श्रीकृष्ण शर्मा संस्कृत के विद्वान थे। उन्होंने कई ग्रंथ लिखे और बनारस से ‘अच्युत’ नाम की पत्रिका का संपादन भी करते थे। अजमेर में मैंने अलमारी में उनके लिखे ‘ब्रह्मसूत्र’ की टीका के दो ग्रंथ देखे थे, तो उनका भी प्रभाव रहा।
बचपन में कुछ ऐसे प्रसंग भी हुए, जिन्होंने शब्दों का महत्व समझाया। मां के पास शिवदत्त सती जी की लिखी ‘गोपी गीत’ पुस्तिका थी, जिसका काव्य बहुत हृदय विदारक था। मैं वह भी पढ़ता था। फिर दूसरे विश्वयुद्ध में हमारे पहाड़ों से बेशुमार युवा फौज में गए और बहुत से शहीद हुए। पैदल अल्मोड़ा जाते हुए जगह-जगह युवा फौजियों को मोटरों का इंतजार करते हुए देखा, जिन्हें विदा करने उनके परिवार की महिलाएं आई होती थीं। बस के जाने के बाद उनकी जो रुलाई फूटती थी, वह बड़ी हृदय विदारक होती थी। वह मेरे मन में बनी रही और पहली कहानी ‘राजे खत्म हो गए’ मैंने उसी प्रभाव में लिखी थी।
मेरी अकादमिक पढ़ाई अधिक नहीं हुई, लेकिन मैंने स्वाध्याय से देसी-विदेशी साहित्य खूब पढ़ा। वर्ष 1955 में इलाहाबाद आने पर मैंने पाया कि व्हीलर बुक स्टाल के मालिक ने पुरानी किताबों का एक विक्रय केंद्र सिविल लाइंस में खोला था। हर महीने वहां नई किताबों का स्टॉक आता था। मैंने वहां से बहुत कम दामों पर किताबें खरीदकर पढ़ीं। जॉन स्टेनबैक के उपन्यासों की पूरी शृंखला पढ़ी। काफ्का का ‘द कैसल’ आठ आने में खरीदकर पढ़ा, और भी बहुत-सी किताबें। उन दिनों मास्को से जो साहित्य आता था, अनूदित साहित्य, बहुत सस्ते में मिल जाता था। उन पुस्तकों में चेखव, तुर्गनेव, मैक्सिम गोर्की, आस्त्रोवस्की, चंगीज आइत्मातोव के उपन्यास, माइकोवस्की, नाजिम हिकमत और निकोला वाप्सरोव की कविताएं शामिल थीं। मैं इन पुस्तकों को पढ़ता और साथियों के साथ चर्चा करता था। मैंने बहुत अच्छा साहित्य (देसी-विदेशी) पढ़ने और समझने का प्रयत्न किया।
आपके अनुभव की किताब में पिछली सदी के ढेर सारे वर्ष दर्ज हैं। इस बीच बहुत-सी सामाजिक-आर्थिक स्थितियां बदलीं, ऐसा आपने क्या देखा?
होश संभालने के बाद देश में जो स्वतंत्रता आंदोलन का उभार हुआ था, उसका थोड़ा-बहुत संज्ञान पहाड़ी इलाके में हम लोगों को भी मिला। फिर दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका भी प्रभावित कर गई, क्योंकि बहुत से जवान फौज में गए थे, जो लौटे नहीं। पहाड़ की जो आर्थिक स्थिति थी, वह मनीऑर्डर संस्कृति से ही जीवन चलाती थी। फिर उत्तराखंड आंदोलन का बहुत बड़ा असर जनजीवन पर पड़ा, लेकिन प्रवास में होने के कारण मैं उतनी निकटता से उसे नहीं भांप पाया।
सांस्कृतिक क्षेत्र में कॉमरेड पीसी जोशी की वजह से वामपंथी विचारधारा का प्रसार पहाड़ में भी हुआ और लेखकों, कलाकारों, रंगमंच कर्मियों का मार्क्सवादी विचारों से साक्षात्कार हुआ और उससे प्रभावित रचनाएं तैरने लगीं। अब भी पहाड़ में विस्थापन हो रहा है। गांव उजड़ गए हैं। यह देखकर बुरा लगता है, क्योंकि हमने वह जमाना भी देखा है, जब गांव हरे-भरे थे। शिक्षा के प्रसार के कारण विस्थापन में बढ़ोत्तरी हुई है, जबकि होना यह चाहिए था कि कुछ इस तरह की औद्योगिक इकाइयां वहां स्थापित की जातीं, जिससे शिक्षित लोग अपने इलाके में रह पाते।
पिछली सदी में ऐसा क्या था जो नई सदी में नहीं आया?
पिछली सदी में सामूहिकता थी। इस दौर या इस सदी में ये जो बहुमंजिली इमारतें और परिवारों का विघटन है, उससे लोग केवल अपने परिवार तक सीमित रह गए हैं। ऊंची-ऊंची इमारतों में जो फ्लैट हैं, वे जैसे गुफाएं हैं, इसके अंदर ही सीमित रहता है आदमी। वह सामाजिकता जो एक खुले समाज में थी, वह देखने में अब कम आती है।
आधुनिक काल में पहाड़ों से विस्थापन बड़ी मात्रा में हुआ है। उत्तराखंड के हजारों गांव ‘भुतहा गांव’ की संज्ञा पा चुके हैं। उदारीकरण-भूमंडलीकरण के बाद न सिर्फ पहाड़ी गांवों की, बल्कि मैदानी भागों में बसे गांवों की छवियां भी बदल रही हैं। इस बदलाव को किस तरह देखते हैं?
यह मैं पहले कह चुका हूं कि विस्थापन की वजह से पहाड़ों के गांव उजड़ गए हैं। यह जो बदलाव आया है समाज में, यह व्यक्ति को आत्मकेंद्रित कर गया है। इससे सामाजिकता बहुत कम हो गई है और लोगों का प्रकृति से लगाव भी बहुत कम हो गया है। आदमी की जिंदगी एक रोबोट की तरह हो गई है।
जीवन और समाज में साहित्य की भूमिका अहम है। रचनात्मक भूमिका के बावजूद साहित्य, खासकर नई पीढ़ियों में अपनी जगह क्यों नहीं बना पा रहा?
हिंदी प्रदेश में जो स्थिति आज हो गई है, उसके लिए मुख्य रूप से प्रकाशक दोषी हैं। स्वतंत्र लेखन करने की हिम्मत बहुत कम लोग कर पाते हैं, क्योंकि जिस तरह से प्रकाशकों का लेखकों के साथ व्यवहार है, उसमें स्वतंत्र लेखन संभव नहीं। सरकारी खरीद में जो अनियमितता या भ्रष्टाचार है, उसके कारण किताबें खरीदी तो जाती हैं, लेकिन वे अलमारियों में बंद रहती हैं। दूसरे प्रांतों में अपेक्षाकृत स्थिति ऐसी नहीं है। पाठकों की संख्या बढ़ी है। दलित समाज में पढ़ने के प्रति बहुत रुचि जागृत हुई है, लेकिन पुस्तकों का प्रसार नहीं हो पाता। अब सरकार भी पहले की तरह उतनी उदार नहीं रह गई है। वैचारिक दृष्टि से बहुत पक्षपात होता है, इन सब वजहों से साहित्य की जो भूमिका होनी चाहिए थी, वह नहीं बन पा रही है।
ऐसा कुछ, जो आप लिखना चाहते थे और नहीं लिख पाए?
लेखन पर ज्यादा समय नहीं दे पाया। मेरे बहुत से अनुभव ऐसे हैं, जिनको लिपिबद्ध करना एक तरह से उस कुव्यवस्था को उजागर करना होता, जिसका कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है, लेकिन जो व्यापक रूप से सामाज में फैली हुई थी। मुझमें उतना साहस नहीं हुआ कि मैं उस कुव्यवस्था को अपनी रचनाओं में ले आऊं। मुख्य बात यही है कि मैं बहुत सार्थक किस्म की चीजें लिखना चाहता था और ऐसे लेखन में एक सेंसलिज्म उजागर होता है, मैंने इसलिए भी इसे उचित नहीं समझा।
रचना-कर्म
कोशी का घटवार, साथ के लोग, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, मेरा पहाड़, डागरी वाला, बच्चे का सपना, आदमी का डर और एक पेड़ की याद आदि।
सम्मान
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का महावीर प्रसाद दिवेदी पुरस्कार, साहित्य भूषण, पहल सम्मान, मैथलीशरण गुप्त सम्मान और श्रीलाल शुक्ल सम्मान आदि।