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पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त शेषन का जुमला था, मैं नाश्ते में राजनेताओं को खाता हूं

Mon, 11 Nov 2019 01:09 AM IST
संजीव कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Mon, 11 Nov 2019 01:09 AM IST
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stories of former chief election commissioner TN Seshan
t n seshan

मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन के बारे में उस वक्त कहा जाता था कि देश के नेता केवल दो चीजों से डरते हैं, पहला भगवान और दूसरा शेषन। ऐसा जलवा था उनका चुनाव आयुक्त के तौर पर। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि आई ईट पॉलिटीशियंस फॉर ब्रेकफास्ट यानी मैं नाश्ते में राजनीतिज्ञों को खाता हूं।

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लेकिन शेषन का मानवीय पक्ष भी था। वो कर्नाटक संगीत के शौकीन थे। उनको इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स जमा करने का शौक था। शेषन की जीवनी लिखने वाले गोविंदन कुट्टी बताते हैं कि वे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स इस्तेमाल करने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ देखने के लिए खरीदते थे। उनके पास चार टेलिविजन सेट्स थे और उनकी हर दूसरी मेज या अलमारी पर एक स्टीरियो रिकॉर्डर रखा रहता था। उनका फाउंटेन पेन का संग्रह तो नायाब था।
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एक और दिलचस्प बात भी उनके बारे में कहा जाता कि जो भी बच्चा उनके घर आता था, उसे वे अक्सर एक पेन भेंट में देते थे, जब कि वो खुद बेहद साधारण बॉलपेन से लिखते थे। वो एक बहुत मामूली घड़ी पहनते थे, वो भी सिर्फ व्यस्क होने के प्रतीक के तौर पर, जब कि उनकी अलमारी में दुनिया की एक से एक मंहगी घड़ियाँ पड़ी रहती थीं। चीजे जमा करना उनका शौक था, उनका इस्तेमाल करना नहीं।

हर बड़े शख्स से पंगा

शेषन ने अपने कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से लेकर हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल गुलशेर अहमद और बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव में से  किसी को नहीं बख्शा। उन्होंने बिहार में पहली बार चार चरणों में चुनाव करवाया और चारों बार चुनाव की तारीखें बदली गईं। ये बिहार के इतिहास का सबसे लंबा चुनाव था।

शेषन के किस्से - शेख अब्दुल्लाह

जिलाधिकारी के रूप में भी टीएन शेषन को निर्भीकता और स्पष्टवादिता के लिए जाना जाता था। कश्मीर के प्रधानमंत्री रह चुके शेख अब्दुल्लाह को कश्मीर षड्यंत्र मामले में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1958 में पकड़ा। उन्हें कुछ समय जेल में और फिर नजरबंद रखा गया। तमिलनाडु में डिंडिगुल जिले की कोडई झील के निकट एक होटल में नजरबंद रखने के दौरान शेख की जिम्मेदारी मदुरै के जिलाधिकारी टीएन शेषन को दी गई।

शेषन को शेख द्वारा भेजे जा रहे हर पत्र पढ़ने के आदेश थे। शेख इससे झुंझलाए और नाराज थे। उन्हाेंने शेषन से बचने के लिए चाल चली और एक जरूरी पत्र लिखा। शेषन उनसे मिलने गए तो शेख ने वह पत्र उनके सामने ही भेजने के लिए दिया। शेषन ने पत्र देखा तो उस पर पता लिखा था ‘डॉ. एस राधाकृष्णन, भारत के राष्ट्रपति।’

शेख ने बनावटी मुस्कान के साथ पूछा, ‘क्या आप अब इस पत्र को भी खोलेंगे?’ शेषन पर इसका कोई असर नहीं हुआ। उन्हाेंने कहा, ‘पत्र पर लिखे पते का मेरे लिए कोई मतलब नहीं है, मैं इसे आपके सामने ही खोलूंगा।’ शेख इससे बेहद खफा हो गए और घोषणा कर दी कि वे अपने साथ किए जा रहे खराब व्यवहार के खिलाफ आमरण अनशन करेंगे।

इस पर शेषन ने शेख से कहा, ‘सर, यह मेरा कर्तव्य है कि आपकी हर जरूरत का ख्याल रखूं। मैं यह देखूंगा कि कोई गलती से आपके सामने पानी का एक गिलास लेकर भी न आ जाए।’

साथी आयुक्त को आयोग में बैठने की नहीं दी जगह

टीएन शेषन ने आयोग के तत्कालीन सदस्य कृष्णमूर्ति को पद संभालने के बाद बैठने की जगह नहीं दी। उन्होंने राष्ट्रपति से शिकायत की कि उन्हें बैठने की जगह नहीं दी जा रही है। शेषन के जीवनीकार गोविंदन कुट्टी के मुताबिक, कृष्णमूर्ति ने शेषन की साथ वाली कुर्सी पर यह कहते हुए बैठने से इनकार कर दिया था कि वह कुर्सी चपरासियों के बैठने वाली थी। 

उन्होंने शेषन से कहा कि यदि उन्हें बात करनी है तो उनके पास आकर बैठें। उसी वक्त एक बैठक होनी थी और तीसरे आयुक्त एमएस गिल भी कमरे में दाखिल हुए। बताया जाता है कि पूरी बैठक के दौरान शेषन कृष्णमूर्ति पर फब्तियां कसते रहे।

जब उप चुनाव आयुक्त को सौंपा चार्ज

शेषन एक बार अमेरिका गए तो सहयोगी चुनाव आयुक्तों के बजाय उप आयुक्त डीएस बग्गा को कार्यभार सौंप गए। गिल कहते हैं वह शेषन से बात कर लेते थे, क्योंकि शेषन उनकी इज्जत करते थे। गिल भी उनसे अपने सीनियर की तरह ही व्यवहार करते थे, हालांकि उन्होंने कहा कि बग्गा को कार्यभार सौंपना कतई उचित नहीं था।

चुनावी खर्च पर लगाम लगाने का भी श्रेय

चुनावों में उम्मीदवारों के खर्च पर लगाम लगाने की बात हो या फिर सरकार से किराये पर लिए गए हेलिकॉप्टर के जरिए मंत्रियों के चुनाव प्रचार करने की नीति पर रोक। ये चीजें किसी नियम के तरह स्थिर नजर आती हैं तो इसका श्रेय शेषन को जाता है।

दीवारों पर नारे लिखना और पोस्टर चिपकाना, लाउडस्पीकरों से कानफोड़ृू शोर करना, चुनाव प्रचार के नाम पर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने वाले भाषण देना सबकुछ उनके निशाने पर रहा और सरकार को ऐसे सवालों पर नए सिरे से सोचने पर मजबूर होना पड़ा।

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