नाले लगा रहे गंगा सफाई योजनाओं को पलीता
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गंगा को प्रदूषणमुक्त करने को लेकर चलाई जा रही योजनाओं का नतीजा कुछ खास निकलता नहीं दिख रहा है। हरिद्वार से कानपुर तक गंगा में गिरने वाले 300 से अधिक नालों को रोकने और सीवरेज ट्रीटमेंट सिस्टम को अपडेट करने संबंधी कई योजनाएं केवल कागजों पर ही हैं। नतीजतन हरिद्वार से ही गंगा में गंदे नाले मिलने शुरू होते हैं और वाराणसी तक आते-आते स्थितियां बदतर होती चली जाती हैं। काशी में पहले 23 नाले सीधे गंगा में गिरते थे उनकी संख्या अब बढ़कर 49 हो गई है जबकि कानपुर में 24 नाले इसमें जहर घोल रहे हैं।
कानपुर में गंगा से प्रदूषण दूर करने और घाटों को विकसित करने के लिए केंद्र ने 600 करोड़ रुपये की योजना तैयार की थी। शुरुआत घाटों के सौंदर्यीकरण से होना था लेकिन काम ठप पड़ा है। टेनरियों के कचरे को उपचारित करने के लिए भी यहां बड़ी क्षमता वाला ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की घोषणा हुई थी, जिस पर आगे बहुत कुछ नहीं हो पाया। टेनरियों को जेडएलडी (जीरो लिक्विड डिस्चार्ज) सिस्टम लगाना अनिवार्य किया गया था, जिसके लिए केंद्र सरकार ने 700 करोड़ रुपये स्वीकृत किए थे। इसका पालन नहीं करने वालों पर सख्त कार्रवाई की बात तक कही गई थी। बावजूद इसके न तो किसी पर कार्रवाई हुई न ही जेडएलडी लगाया गया। इस कारण टेनरियों से निकलने वाले कचरे से गंगा में हानिकारक तत्वों की मात्रा तीन गुने से अधिक पाई गई है।
नदी के साथ आने वाले कचरे ने गंगा में प्रदूषण की स्थिति और खराब कर दी है
यही नहीं मेरठ, बुलंदशहर, फर्रूखाबाद, अलीगढ़ होते हुए काली नदी के साथ आने वाले कचरे ने गंगा में प्रदूषण की स्थिति और खराब कर दी है। बाद में केंद्र सरकार ने कहा कि गंगा की सुरक्षा का बीड़ा अब उसके किनारे रहने वाले लोग ही उठाएंगे। प्रदेश से लेकर ग्रामीण स्तर तक गंगा समितियों का गठन किया जाएगा। समितियां गंगा के किनारे पौधे लगाएंगी और घाटों को सुंदर बनाएंगी। फिलहाल यह कमेटियां औपचारिक होकर रह गई हैं।
गंगा से कचरा निकालने के लिए कानपुर में केंद्र सरकार ने स्किमर मशीन लगाई थीं, जो कुछ दिनों के बाद ही वापस हो गईं। काशी में गंगा निर्मलीकरण के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, सीवेज पंपिंग स्टेशन, कूड़ा निस्तारण और नालों को बंद करने के नाम पर दो हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुके हैं लेकिन बेहतर नतीजा दिख नहीं रहा है। इलाहाबाद में सैकड़ों करोड़ की योजनाओं में से कुछ का काम पूरा हो चुका है कुछ का साल 2018 तक पूरा होना है। बावजूद शहर में राजापुर, मेहंदौरी, शिवकुटी, सलोरी से भारी मात्रा में गंदा पानी सीधे गंगा में जा रहा है।
सुधरने की बजाए और बदतर होती जा रही स्थितियां
सुधरने की बजाए और बदतर होती जा रही स्थितियां
नमामि गंगे योजना की शुरुआत सात जुलाई को हरिद्वार से हुई थी। योजना के तहत सभी गंदे नालों की निकासी को गंगा में जाने से रोकने के लिए नदी के किनारे एक नाला बनाने की घोषणा हुई थी, जिस पर अभी तक कुछ नहीं हो पाया है। यहां तक कि एनजीटी ने भी अपना कोर्ट कमिश्नर कई बार हरिद्वार भेजा और प्रदूषण रोकने को लेकर कई आदेश जारी किए। उच्च न्यायालय, नैनीताल ने भी गंगा में प्रदूषण रोकने के आदेश जारी किए लेकिन स्थितियां सुधरने की बजाए और बदतर ही होती जा रही हैं।
हरिद्वार से ही मैली होने लगती है गंगा
उत्तरी हरिद्वार में शांतिकुंज से आने वाला गंदा नाला व केलेवाली पुलिया का नाला, लोकनाथ नाले में मिलते हुए गंगा में गिरता है। गंदे नालों को समेटते हुए सूखी नदी भी गंगा में ही गिर रही है। भीगगोडा नई बस्ती से आने वाला गंदा नाला, रेलवे लाइन से आने वाला नाला, कस्सावान नाला और कांगड़ा घाट पर सीवरेज पंपिंग स्टेशन का प्रदूषित पानी भी गंगा में मिल रहा है। नाईसोता, बेलदेई नाला, कुशावर्तघाट के पास, रामघाट, विष्णुघाट से लेकर बिरला घाट तक के सभी गंदे नाले गंगा में गिर रहे हैं। इस तरह हरिद्वार से ही गंगा मैली होने लगती है।
प्रदूषण की वजह से किनारा पड़ गया काला
महामना मालवीय रिसर्च सेंटर फॉर क्लीन गंगा के निदेशक प्रो. यूके चौधरी के मुताबिक काशी में हनुमान घाट से मणिकर्णिका घाट के बीच का क्षेत्र केंद्रीय जोन माना गया है। गंगा में बहाव न होने की वजह से इन क्षेत्र में नालों से बहाया जाने वाला घरेलू और औद्योगिक कचरा तटों पर ही जमा हो रहा है। इससे किनारा काला पड़ गया है। इसका समाधान सिर्फ नालों को बंद करना ही है।