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SC: मसौदा कानून 60 दिन पहले सार्वजनिक करने की मांग वाली अर्जी पर शीर्ष कोर्ट में होगी सुनवाई, जानें पूरा मामला

Tue, 25 Oct 2022 04:09 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Tue, 25 Oct 2022 04:09 PM IST
सार

अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा बीते वर्ष दाखिल इस जनहित याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित कानूनों को छोड़कर कोई भी मसौदा कानून, संसद या राज्य विधानसभा में पेश किए जाने से कम से कम 60 दिन पहले सरकारी वेबसाइटों पर प्रकाशित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही इसमें मांग की गई है कि मसौदे पर लोगों की प्रतिक्रिया लेने का भी निर्देश सरकार को दिया जाए।   
 

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SC to hear on October 31 plea seeking direction to publish draft legislations on govt websites
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली में नए कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन के बीच सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है. इसमें केंद्र और राज्य सरकारों को संसद या विधानसभा में बिल पेश करने से कम से कम 60 दिन पहले सरकारी वेबसाइटों और सार्वजनिक डोमेन पर कानून का मसौदा प्रकाशित करने और लोगों की प्रतिक्रिया लेने का निर्देश देने की अपील की गई है।

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केंद्र और राज्य सरकारों को संसद या विधानसभा में बिल पेश करने से कम से कम 60 दिन पहले सरकारी वेबसाइटों और सार्वजनिक डोमेन पर कानून का मसौदा प्रकाशित करने की अपील वाली जनहित याचिका पर 31 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड की गई 31 अक्टूबर की वाद सूची के अनुसार, ये जनहित याचिका मुख्य न्यायाधीश यू यू ललित और न्यायमूर्ति एस आर भट और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आने वाली है। गौरतलब है कि दिल्ली में नए कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन के बीच भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने यह जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी। 
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अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा बीते वर्ष दाखिल इस जनहित याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित कानूनों को छोड़कर कोई भी मसौदा कानून, संसद या राज्य विधानसभा में पेश किए जाने से कम से कम 60 दिन पहले सरकारी वेबसाइटों पर प्रकाशित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही इसमें मांग की गई है कि मसौदे पर लोगों की प्रतिक्रिया लेने का भी निर्देश सरकार को दिया जाए।   
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याचिका में कहा गया है, "आज की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में, उन्नत मीडिया और प्रौद्योगिकी के आगमन के साथ, केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के लिए यह उचित नहीं है कि वे अचानक किसी विधायी बहस के साथ रातों-रात कानून पारित करें और कोई व्यापक परामर्श न दें।" साथ ही इसमें यह भी कहा गया है कि जहां तक केंद्रीय कानूनों का संबंध है, प्रस्तावित विधानों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया जाना चाहिए और संसद में पेश होने से कम से कम 60 दिन पहले वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाना चाहिए ताकि नागरिकों को उनकी पूरी समझ हो।

याचिका में अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने यह भी कहा कि मौजूदा कानून बनाने की प्रक्रिया न केवल अलोकतांत्रिक है बल्कि असंवैधानिक भी है। संबंधित विभागों के सचिव विधेयक का मसौदा तैयार करते हैं और कैबिनेट व्यापक सार्वजनिक चर्चा और प्रतिक्रिया के बिना इसे मंजूरी देता है। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार सरकार नए कानून बनाती है, जबकि मौजूदा कानून में संशोधन ही काफी होगा।  


सुप्रीम कोर्ट में दाखिल इस याचिका में यह भी कहा गया है कि दो महीने तक कानून पर एक कठोर सार्वजनिक बहस से कार्यपालिका को हर पहलू के विश्लेषण करने का पूरा अवसर मिलेगा। इसके साथ ही जब संसद में कानून पर बहस होगी तो सांसद बेहतर सुझाव दे सकेंगे।

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