{"_id":"631c543e428bb25cff52241f","slug":"sc-deprecates-tendency-of-making-allegations-against-judicial-officer-when-adverse-order-passed","type":"story","status":"publish","title_hn":"Supreme Court: अपने खिलाफ फैसला आए तो जज पर आरोप लगाना गलत, सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के मामले में की निंदा","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Supreme Court: अपने खिलाफ फैसला आए तो जज पर आरोप लगाना गलत, सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के मामले में की निंदा
Sat, 10 Sep 2022 02:39 PM IST
सुरेंद्र जोशी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Sat, 10 Sep 2022 02:39 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वादी के खिलाफ फैसला आने पर जजों पर आरोप लगाने का सिलसिला जारी रहा तो यह न्यायाधीशों का मनोबल गिराएगा। इसके साथ ही शीर्ष कोर्ट ने राजस्थान के धौलपुर के एक मामले को उत्तर प्रदेश के नोएडा की कोर्ट में स्थानांतरित करने से इनकार कर दिया।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : Social media
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने किसी मामले से संबंधित वादी के खिलाफ फैसला आने पर जज या न्यायिक अधिकारी के खिलाफ आरोप लगाने की प्रवृत्ति की निंदा की है। शीर्ष कोर्ट ने राजस्थान के धौलपुर के एक मामले में सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वादी के खिलाफ फैसला आने पर जजों पर आरोप लगाने का सिलसिला जारी रहा तो यह न्यायाधीशों का मनोबल गिराएगा। इसके साथ ही शीर्ष कोर्ट ने राजस्थान के धौलपुर के एक मामले को उत्तर प्रदेश के नोएडा की कोर्ट में स्थानांतरित करने से इनकार कर दिया।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एम आर शाह और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा कि जिन आधारों पर केस धौलपुर से नोएडा स्थानांतरित करने की मांग की गई है, उनमें से एक यह है कि याचिकाकर्ताओं का मानना है कि उनकी निष्पक्ष सुनवाई नहीं हो रही है और विरोधी पक्ष ‘बड़े लोग‘ होने के कारण केस को प्रभावित कर सकते हैं। जस्टिस शाह व कृष्ण मुरारी ने कहा कि हम इस तरह के रवैये और उस आधार की निंदा करते हैं जिस पर कार्यवाही स्थानांतरित करने की मांग की गई है।
विज्ञापन
पीठ ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ कोर्ट के कुछ आदेश दिए हैं, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि न्यायिक पक्ष विरोधी पक्ष से प्रभावित हो गया। यदि याचिकाकर्ता किसी न्यायिक आदेश से व्यथित है तो उचित तरीका है कि उसे उच्च अदालतों में चुनौती दी जाए।
दो सितंबर को पारित आदेश में शीर्ष कोर्ट ने कहा कि आजकल यह प्रवृत्ति बढ़ गई है कि अपने पक्ष में फैसला नहीं आने पर संबंधित पक्ष न्यायिक अधिकारियों पर आरोप लगाने लगता है। हम इस प्रवृत्ति की निंदा करते हैं। यदि यह सिलसिला जारी रहा तो इसका असर अंततः जजों के मनोबल पर पड़ेगा।
याचिका में एक और आधार उठाया गया था कि परीक्षण अदालत ने झूठी एफआईआर के आधार पर वारंट जारी किया, इसलिए याचिकाकर्ताओं के जीवन को लेकर आशंका है। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि अगर याचिकाकर्ता प्राथमिकी से व्यथित है तो उसे इसे रद्द कराने के लिए अदालत से संपर्क करना चाहिए। मामला स्थानांतरित करने का यह कोई आधार नहीं बनता है।