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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, उकसावे की कार्रवाई में हत्या को गैर-इरादतन हत्या माना
Tue, 02 Aug 2022 10:50 PM IST
Amit Mandal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Amit Mandal
Updated Tue, 02 Aug 2022 10:50 PM IST
सार
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष के अनुसार मृतक शराब का आदी था और अपीलकर्ता को लगातार प्रताड़ित करता था, गाली देता था और धमकाता था।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
अपने भाई की हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक व्यक्ति की सजा को संशोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि उकसाने की कार्रवाई अचानक और गंभीर थी जिससे उसने आत्म-नियंत्रण खो दिया। उकसाने के अपवाद को लागू करते हुए शीर्ष अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 हत्या के तहत व्यक्ति की सजा को धारा 304 के भाग 1 में बदल दिया, जो गैर इरादतन हत्या के लिए सजा से संबंधित है। शीर्ष अदालत ने यह देखते हुए कि अपीलकर्ता सितंबर 2011 से 10 साल से अधिक समय से जेल में है, सजा को उस अवधि में संशोधित किया जो वह पहले ही काट चुका है।
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मृतक शराब का आदी था और अपीलकर्ता को लगातार प्रताड़ित करता था
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष के अनुसार मृतक शराब का आदी था और अपीलकर्ता को लगातार प्रताड़ित करता था, गाली देता था और धमकाता था। पीठ ने कहा कि उकसाने की गंभीरता आरोपी के प्रति पीड़ित के पूरे अपमानजनक व्यवहार को बदल देती है। शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के निवासी दोषी द्वारा दायर एक अपील पर फैसला सुनाया। अदालत ने यह नोट किया कि 26 सितंबर, 2011 को अपीलकर्ता खुद पुलिस थाने गया था और उसने अपना अपराध कबूल कर लिया था।
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पीठ ने कहा कि मामला आईपीसी की धारा 300 के अपवाद 1 के तहत आएगा। यह धारा 300 हत्या से संबंधित है और इस प्रावधान के अपवाद 1 में कहा गया है कि गैर इरादतन हत्या, हत्या नहीं है यदि अपराधी, गंभीर और अचानक उकसावे से आत्म-नियंत्रण खोकर किसी व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनता है जिसने उसे उकसाया हो। पीठ ने कहा कि उकसावे की गंभीरता का आकलन दुर्व्यवहार के इतिहास को ध्यान में रखकर किया जा सकता है और इसे कृत्यों, शब्दों या इशारों के रूप में अंतिम उत्तेजक कृत्य की गंभीरता तक सीमित करने की आवश्यकता नहीं है।
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इसमें अपीलकर्ता के छोटे भाई और मृतक के बयान का भी जिक्र है। शीर्ष अदालत ने नोट किया कि छोटे भाई ने बयान दिया था कि मृतक अक्सर शराब पीता था, परिवार के साथ बहुत कम बातचीत करता था और अपीलकर्ता के साथ बहस और झगड़ा करता था।