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क्या मोदी लगा पाएंगे दक्षिण में सेंध?
थिरुमलाइ मणिवन्नन/ संपादक, बीबीसी तमिल सेवा
Updated Mon, 16 May 2016 03:39 PM IST
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पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव के बीच जो सवाल कई लोगों के मन में बार बार उठ रहे हैं वो यह कि क्या भाजपा देश के दक्षिणी राज्यों- खासकर तमिलनाडु और केरल में कोई नया विकल्प बना पाएगी।
भाजपा ने दो साल पहले हुए लोकसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारी बहुमत हासिल की थी। लेकिन इस दौरान भले ही उत्तर भारत में भाजपा की जीत की लहर दिखी लेकिन यह दक्षिण के राज्यों में आते-आते सिमट गई।
और ऐसा तब हुआ जब कर्नाटक में भाजपा ने उल्लेखनीय जीत हासिल करते हुए 2008 के चुनाव में पहली बार अपनी सरकार बनाई थी। लेकिन कर्नाटक में भाजपा का शासन काफ़ी विवादित रहा और वह 2013 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस से हार गई।
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जानकारों के मुताबिक़ दक्षिणी राज्यों में अपने पांव पसारने के लिए भाजपा ने महीनों लंबी रणनीति पर काम किया है। लेकिन इसके बावजूद दक्षिण के दो बेहद महत्वपूर्ण राज्यों तमिलनाडु और केरल के मौजूदा चुनाव में भाजपा के लिए कोई ख़ास उम्मीद नजर नहीं आ रही। कारणों का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
पहली बात तो ये कि भाजपा तमिलनाडु में किसी बड़े दल के साथ गठबंधन नहीं कर सकी। वह क्षेत्रीय स्तर पर असर रखने वाले कुछ छोटे दलों के साथ चुनाव लड़ रही है।
दूसरी ओर एआईएडीएमके प्रमुख जयललिता ने भी, जिन्हें कई लोग भाजपा का स्वाभाविक सहयोगी मानते रहे हैं, भाजपा के प्रति उदासीन रवैया दिखाया। भाजपा ने चुनाव जीतने के लिए उन्हें लुभाने की कोशश की थी।
नतीजा ये हुआ कि भाजपा 165 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। बाक़ी सीटों को भाजपा ने अपने छोटे गठबंधन दलों के लिए छोड़ दिया है।मतदान आज संपन्न हो रहे हैं। इसके साथ ही जीत-हार का आकलन शुरू हो गया है।
भाजपा की जीत के बारे में जो कयास लगाए जा रहे हैं, जिन्हें सबसे सकारात्मक कहा जा सकता है, वो ये कि तमिलनाडु में उन्हें 10 सीटें भी नहीं मिलेंगी। इसके जीतने की सबसे अधिक संभावना कन्याकुमारी, कोयंबटूर की कुछ सीट और संभवतः तनजावुर जिले की सीट पर जताई जा रही है।
तमिलनाडु में भाजपा को कम सीटों के मिलने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं इसका अंदाजा लगाना बहुत आसान है। यह एक ऐसा राज्य है जहां की राजनीति में पिछले 50 सालों से द्रविड़ विचारधारा का बोलबाला रहा है।
भाजपा को यहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी आरएसएस से निकली, हिंदू, उच्च वर्ग, उत्तर भारत समर्थक और अल्पसंख्यक विरोधी पार्टी के रूप में देखा जाता है।
पिछले दो दशक से भाजपा तमिलनाडु में अपनी सियासी इमारत की नींव रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन अभी तक उसके हाथ लोकसभा की कुछ सीटें ही आईं हैं। इधर कम्युनिस्ट प्रभाव वाले केरल में भी भाजपा का हाल कुछ अलग नहीं दिखाई दे रहा। हालांकि भाजपा को यहां तमिलनाडु की तुलना में बेहतर नतीजों की उम्मीद है।
केरल में मुख्य मुकाबला कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ और वामपंथी गुट एलडीएफ के बीच है। भाजपा उनका खेल बिगाड़ना चाहती है। इसके लिए उसने यहां मुख्य सहयोगी पार्टी एसएनडीपी और भारत धर्म जन सेना (बीडीजेएस) के साथ गठबंधन किया है।
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भाजपा ने दो साल पहले हुए लोकसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारी बहुमत हासिल की थी। लेकिन इस दौरान भले ही उत्तर भारत में भाजपा की जीत की लहर दिखी लेकिन यह दक्षिण के राज्यों में आते-आते सिमट गई।
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और ऐसा तब हुआ जब कर्नाटक में भाजपा ने उल्लेखनीय जीत हासिल करते हुए 2008 के चुनाव में पहली बार अपनी सरकार बनाई थी। लेकिन कर्नाटक में भाजपा का शासन काफ़ी विवादित रहा और वह 2013 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस से हार गई।
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जानकारों के मुताबिक़ दक्षिणी राज्यों में अपने पांव पसारने के लिए भाजपा ने महीनों लंबी रणनीति पर काम किया है। लेकिन इसके बावजूद दक्षिण के दो बेहद महत्वपूर्ण राज्यों तमिलनाडु और केरल के मौजूदा चुनाव में भाजपा के लिए कोई ख़ास उम्मीद नजर नहीं आ रही। कारणों का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
पहली बात तो ये कि भाजपा तमिलनाडु में किसी बड़े दल के साथ गठबंधन नहीं कर सकी। वह क्षेत्रीय स्तर पर असर रखने वाले कुछ छोटे दलों के साथ चुनाव लड़ रही है।
दूसरी ओर एआईएडीएमके प्रमुख जयललिता ने भी, जिन्हें कई लोग भाजपा का स्वाभाविक सहयोगी मानते रहे हैं, भाजपा के प्रति उदासीन रवैया दिखाया। भाजपा ने चुनाव जीतने के लिए उन्हें लुभाने की कोशश की थी।
नतीजा ये हुआ कि भाजपा 165 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। बाक़ी सीटों को भाजपा ने अपने छोटे गठबंधन दलों के लिए छोड़ दिया है।मतदान आज संपन्न हो रहे हैं। इसके साथ ही जीत-हार का आकलन शुरू हो गया है।
भाजपा की जीत के बारे में जो कयास लगाए जा रहे हैं, जिन्हें सबसे सकारात्मक कहा जा सकता है, वो ये कि तमिलनाडु में उन्हें 10 सीटें भी नहीं मिलेंगी। इसके जीतने की सबसे अधिक संभावना कन्याकुमारी, कोयंबटूर की कुछ सीट और संभवतः तनजावुर जिले की सीट पर जताई जा रही है।
तमिलनाडु में भाजपा को कम सीटों के मिलने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं इसका अंदाजा लगाना बहुत आसान है। यह एक ऐसा राज्य है जहां की राजनीति में पिछले 50 सालों से द्रविड़ विचारधारा का बोलबाला रहा है।
भाजपा को यहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी आरएसएस से निकली, हिंदू, उच्च वर्ग, उत्तर भारत समर्थक और अल्पसंख्यक विरोधी पार्टी के रूप में देखा जाता है।
पिछले दो दशक से भाजपा तमिलनाडु में अपनी सियासी इमारत की नींव रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन अभी तक उसके हाथ लोकसभा की कुछ सीटें ही आईं हैं। इधर कम्युनिस्ट प्रभाव वाले केरल में भी भाजपा का हाल कुछ अलग नहीं दिखाई दे रहा। हालांकि भाजपा को यहां तमिलनाडु की तुलना में बेहतर नतीजों की उम्मीद है।
केरल में मुख्य मुकाबला कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ और वामपंथी गुट एलडीएफ के बीच है। भाजपा उनका खेल बिगाड़ना चाहती है। इसके लिए उसने यहां मुख्य सहयोगी पार्टी एसएनडीपी और भारत धर्म जन सेना (बीडीजेएस) के साथ गठबंधन किया है।