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न्यायापालिका में हिंदी में कामकाज के लिए अभियान चलाएगा संघ
amarujala.com {Presented by: पवन नाहर}
Updated Sat, 04 Mar 2017 06:09 AM IST
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संघ ने कानून एवं विधि मंत्रालय की संसदीय समिति की रिपोर्ट का हवाला देकर न्यायालयों में हिंदी और राज्यों की भाषा को बढ़ावा देने की मांग की है। अब तक संघ का जोर शिक्षा क्षेत्र में संस्कृत को अनिवार्य बनाने और सरकारी कामकाज में हिंदी को बढ़ावा देने तक ही सीमित था। मगर अब उसने न्यायपालिका में भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के अभियान को भी तेज कर दिया है।
इस प्रयास को आंजम तक पहुंचाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय परिसर में भारतीय भाषा अभियान के नेतृत्व में चर्चा का आयोजन रखा गया था। जिसमें आह्वान किया गया कि न्यायालयों में भारतीय भाषा को बढ़ावा देने के लिए भगवा बुद्धिजीवी अब देश भर में महौल बनाएंगे। सरकार पर दबाव बनाने के लिए पीएम मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह से लेकर कानून मंत्री तक को जनता के हस्ताक्षर वाले ज्ञापन पहुंचाए जाएंगे।
न्यायालयों में मातृभाषा को बढ़ावा देने के अभियान की कमान संघ की संस्था शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के महामंत्री अतुल कोठारी के जिम्मे है। भारतीय भाषा अभियान के तहत कोठारी इन दिनों देश भर में माहौल बनाने में जुटे हैं। इस कवायद में सर्वोच्च न्यायालय परिसर में आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कोठारी ने कानून एवं कार्मिक मामलों की संसदीय समिति के सिफारिशों का स्वागत करते हुए कहा है कि आजादी के 70 साल बाद किसी ने हिम्मत जुटाने की कोशिश की है।
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इस प्रयास को आंजम तक पहुंचाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय परिसर में भारतीय भाषा अभियान के नेतृत्व में चर्चा का आयोजन रखा गया था। जिसमें आह्वान किया गया कि न्यायालयों में भारतीय भाषा को बढ़ावा देने के लिए भगवा बुद्धिजीवी अब देश भर में महौल बनाएंगे। सरकार पर दबाव बनाने के लिए पीएम मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह से लेकर कानून मंत्री तक को जनता के हस्ताक्षर वाले ज्ञापन पहुंचाए जाएंगे।
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न्यायालयों में मातृभाषा को बढ़ावा देने के अभियान की कमान संघ की संस्था शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के महामंत्री अतुल कोठारी के जिम्मे है। भारतीय भाषा अभियान के तहत कोठारी इन दिनों देश भर में माहौल बनाने में जुटे हैं। इस कवायद में सर्वोच्च न्यायालय परिसर में आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कोठारी ने कानून एवं कार्मिक मामलों की संसदीय समिति के सिफारिशों का स्वागत करते हुए कहा है कि आजादी के 70 साल बाद किसी ने हिम्मत जुटाने की कोशिश की है।
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इन राज्यों में क्यों नहीं मिलती अनुमति
इंडिया कहो या भारत, नाम में क्या रखा है: सुप्रीम कोर्ट्र
- फोटो : Reuters
उन्होंने कहा कि समिति ने अपनी रिपोर्ट में न्यायपालिका के कामकाज को अपनी भाषा में बढ़ावा देने की सिफारिश की है। बावजूद इसके यह काम इतना आसान नहीं है मगर संभव जरूर है। न्यायपालिका में मातृभाषा को बढ़ावा देने की सरकार से मांग करते हुए उन्होंने कहा कि संविधान की अनुच्छेद 348-2 में इस बात का स्पष्ट प्रावधान है कि राज्य शासन और राज्यपाल उस राज्य की राजभाषा अथवा मातृभाषा में कामकाज की मंजूरी प्रदान कर सकते हैं।
साथ ही उन्होंने राजस्थान, मध्यप्रदेश, यूपी और बिहार में न्यायपालिका का हवाला देते हुए कहा कि उत्तराखंड, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल को उसकी मातृभाषा में कामकाज की अनुमति नहीं दी जा रही है। केंद्र इसमें सीधा हस्तक्षेप कर सकता है। इन राज्यों ने वर्ष 2012 से इसकी मांग की हुई है। तो इन राज्यों को अनुमति क्यों नहीं।
साथ ही उन्होंने राजस्थान, मध्यप्रदेश, यूपी और बिहार में न्यायपालिका का हवाला देते हुए कहा कि उत्तराखंड, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल को उसकी मातृभाषा में कामकाज की अनुमति नहीं दी जा रही है। केंद्र इसमें सीधा हस्तक्षेप कर सकता है। इन राज्यों ने वर्ष 2012 से इसकी मांग की हुई है। तो इन राज्यों को अनुमति क्यों नहीं।
जनता को अपनी भाषा न मिलना अन्याय है
कोर्ट
- फोटो : Pintrest
उन्होंने कहा कि 2015 में देश के विधि मंत्री ने न्यायपालिका के कामकाज में राजभाषा को बढ़ावा देने की बात कही थी। लेकिन उसके बाद भी शासन-प्रशासन और न्यायालयों में उच्च पदों पर बैठे लोगों को इसके लिए राजी करने का कार्य कठिन है। इसके लिए दोहरा प्रयास करना होगा। जनता को जागरूक बनाने के साथ राजनेताओं के बीच भी इसकी व्यापक भूमिका बनानी पड़ेगी।
भारतीय भाषा अभियान में लगे समर्थकों से आह्वान करते हुए कोठारी ने कहा कि अगले 10 दिनों में इस मामले में देशभर में ज्ञापन हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा। कोठारी के अलावा मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायधिश आर सी मिश्र और पूर्व लोकायुक्त अशोक मंनचंदा ने भी न्यायालयों में भारतीय भाषा में कामकाज को बढ़ावा देने की बात कही।
कोठारी ने मांग की है कि संसद की तरह सर्वोच्च न्यायालय और देश के सभी 24 उच्च न्यायालयों में भी लाइव अनुवाद की व्यवस्था की जाए। इस पर महज 20 से 25 करोड़ रुपये ही खर्च होंगे। उन्होंने कहा कि देश की 125 करोड़ जनता को अपनी भाषा में न्याय न मिलना सबसे बड़ा अन्याय होगा। मां, मातृभाषा और मातृभूमि का कोई विकल्प नहीं है।
भारतीय भाषा अभियान में लगे समर्थकों से आह्वान करते हुए कोठारी ने कहा कि अगले 10 दिनों में इस मामले में देशभर में ज्ञापन हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा। कोठारी के अलावा मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायधिश आर सी मिश्र और पूर्व लोकायुक्त अशोक मंनचंदा ने भी न्यायालयों में भारतीय भाषा में कामकाज को बढ़ावा देने की बात कही।
कोठारी ने मांग की है कि संसद की तरह सर्वोच्च न्यायालय और देश के सभी 24 उच्च न्यायालयों में भी लाइव अनुवाद की व्यवस्था की जाए। इस पर महज 20 से 25 करोड़ रुपये ही खर्च होंगे। उन्होंने कहा कि देश की 125 करोड़ जनता को अपनी भाषा में न्याय न मिलना सबसे बड़ा अन्याय होगा। मां, मातृभाषा और मातृभूमि का कोई विकल्प नहीं है।