'रोका' सामाजिक बुराई है, इस रिवाज की निंदा की जानी चाहिए: हाई कोर्ट
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पति दिल्ली में एमटीएनएल में कार्यरत है जबकि पत्नी एम्स में नर्स के पद पर कार्यरत है दोनों की शादी साल 2006 में हुई थी। 2007 में उन्हें एक बेटा भी हुआ। लेकिन शादी के तकरीबन डेढ़ साल बाद लड़के ने अदालत में तलाक की याचिका दायर कर दी।
पति ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी बेहद क्रूर है और वह कभी बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती थी। निचली अदालत सुनवाई के बाद क्रूरता के आधार पर पति के पक्ष में तलाक का आदेश दिया था। अदालत के इस निर्णय को पत्नी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पति के आरोप को गलत पाया और निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया।
महिला के पति ने आरोप लगाया था कि महिला कभी बच्चा नहीं चाहती थी, और उससे लड़कर मायके चली गई थी। पति ने यह भी आरोप लगाया कि साल 2006 में उनका रोका हुआ था, और महिला ने उस दौरान खराब(लो ग्रेड) उपहार मिलने की बात कही। वहीं महिला का आरोप था कि ससुराल पक्ष के लोगों वधु पक्ष की ओर से रोका में मिले उपहारों में हमेशा कमियां निकालते थे और उसके मायके की आलोचना करते थे।
लेकिन अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि लड़का शराब पीने का आदी है, कोर्ट ने यह भी पाया कि पति ने बच्चे को लेकर जो आरोप लगाए वो सभी निराधार हैं। इसके साथ ही वह आरोप भी निराधार साबित हुआ कि लड़की लड़के से अलग घर की मांग कर रही थी।
क्या है 'रोका'
बता दें कि 'रोका' शादी से पहले लड़के के घर पर होने वाला समारोह है जिसमें वधु पक्ष की ओर से शादी तय होने पर वर पक्ष को पैसे और उपहार दिए जाते हैं। वर पक्ष की ओर से इस समारोह का बड़ी धूम-धाम से आयोजन किया जाता है।
इसमें सामाजिक रूप से यह घोषणा की जाती है कि उनके बच्चों के लिए जीवनसाथी की तलाश पूरी हो गई है। इस समारोह के दौरान शादी में वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष को दिए जाने वाले पैसे की भी सामाजिक रूप से घोषणा की जाती है।