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सर्जिकल स्ट्राइकः मेजर ने बताई उस रात की कहानी, कानों के पास से निकल रही थीं गोलियां
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 11 Sep 2017 08:03 AM IST
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भारतीय सेना ने बीते वर्ष 28-29 सितंबर में बार्डर पार कर पाकिस्तान में आतंकियों के लॉन्च पैड को तबाह कर सर्जिकल स्ट्राइक की थी। सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देना और फिर सुरक्षित वापस लौटना सेना के जवानों के लिए आसान नहीं था।
सर्जिकल स्ट्राइक टीम की अगुवाई कर रहे सेना के एक मेजर ने एक साल बाद प्रकाशित किताब 'इंडियाज मोस्ट फीयरलेस: ट्रू स्टोरीज ऑफ मॉडर्न मिलिटरी हीरोज' में दुश्मनों के ठिकानों को तबाह करने की पूरी कहानी को बयां किया है।
दरअसल सर्जिकल स्ट्राइक के एक साल पूरा होने पर यह किताब प्रकाशित हुई है जिसमे सेना के मेजर ने अपने अनुभव साझा कर सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देने की पूरी रोमांचक और खतरनाक कहानी की आपबीती बताई है।
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सर्जिकल सट्राइक टीम की अगुवाई करने वाले मेजर के मुताबिक हमला बहुत ठीक तरीके से और तेजी के साथ किया गया था, लेकिन अपने लक्ष्य को अंजाम देने के बाद वापस लौटना सबसे मुश्किल था। दुश्मन सैनिकों की गोलियां कानों के पास से निकल रही थीं।
'इंडियाज मोस्ट फीयरलेस: ट्रू स्टोरीज ऑफ मॉडर्न मिलिटरी हीरोज' शीर्षक वाली किताब में अधिकारी को मेजर माइक टैंगो बताया गया है। सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक के लिए उड़ी हमले में नुकसान झेलने वाले दो यूनिटों के सैनिकों के इस्तेमाल का निर्णय किया। सेना ने 'घटक टुकड़ी' का गठन किया और उसमें उन दो यूनिटों के सैनिकों को शामिल किया गया, जिन्होंने अपने जवानों को गंवाया था।
किताब में कहा गया है, रणनीतिक रूप से यह चालाकी से उठाया गया कदम था। अग्रिम भूमि की जानकारी उनसे बेहतर शायद ही किसी को थी, लेकिन कुछ और भी कारण थे।
उसमें साथ ही कहा गया है, उनको मिशन में शामिल करने का मकसद उड़ी हमलों के दोषियों के खात्मे की शुरुआत भी था। मेजर टैंगो को मिशन की अगुआई के लिए चुना गया था।
किताब में कहा गया है, टीम लीडर के रूप में मेजर टैंगो ने सहायक भूमिका के लिए खुद से सभी अधिकारियों और कर्मियों का चयन किया। उन्हें इस बात की अच्छी तरीके से जानकारी थी कि 19 लोगों की जान बहुत हद तक उनके हाथों में थी।
इन सबके बावजूद अधिकारियों और कर्मियों की सकुशल वापसी को लेकर मेजर टैंगो थोड़े चिंतित थे। किताब में उनको यह याद करते हुए कोट किया गया है, वहां मुझे लगता था कि मैं जवानों को खो सकता हूं।
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सर्जिकल स्ट्राइक टीम की अगुवाई कर रहे सेना के एक मेजर ने एक साल बाद प्रकाशित किताब 'इंडियाज मोस्ट फीयरलेस: ट्रू स्टोरीज ऑफ मॉडर्न मिलिटरी हीरोज' में दुश्मनों के ठिकानों को तबाह करने की पूरी कहानी को बयां किया है।
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दरअसल सर्जिकल स्ट्राइक के एक साल पूरा होने पर यह किताब प्रकाशित हुई है जिसमे सेना के मेजर ने अपने अनुभव साझा कर सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देने की पूरी रोमांचक और खतरनाक कहानी की आपबीती बताई है।
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सर्जिकल सट्राइक टीम की अगुवाई करने वाले मेजर के मुताबिक हमला बहुत ठीक तरीके से और तेजी के साथ किया गया था, लेकिन अपने लक्ष्य को अंजाम देने के बाद वापस लौटना सबसे मुश्किल था। दुश्मन सैनिकों की गोलियां कानों के पास से निकल रही थीं।
'इंडियाज मोस्ट फीयरलेस: ट्रू स्टोरीज ऑफ मॉडर्न मिलिटरी हीरोज' शीर्षक वाली किताब में अधिकारी को मेजर माइक टैंगो बताया गया है। सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक के लिए उड़ी हमले में नुकसान झेलने वाले दो यूनिटों के सैनिकों के इस्तेमाल का निर्णय किया। सेना ने 'घटक टुकड़ी' का गठन किया और उसमें उन दो यूनिटों के सैनिकों को शामिल किया गया, जिन्होंने अपने जवानों को गंवाया था।
किताब में कहा गया है, रणनीतिक रूप से यह चालाकी से उठाया गया कदम था। अग्रिम भूमि की जानकारी उनसे बेहतर शायद ही किसी को थी, लेकिन कुछ और भी कारण थे।
उसमें साथ ही कहा गया है, उनको मिशन में शामिल करने का मकसद उड़ी हमलों के दोषियों के खात्मे की शुरुआत भी था। मेजर टैंगो को मिशन की अगुआई के लिए चुना गया था।
किताब में कहा गया है, टीम लीडर के रूप में मेजर टैंगो ने सहायक भूमिका के लिए खुद से सभी अधिकारियों और कर्मियों का चयन किया। उन्हें इस बात की अच्छी तरीके से जानकारी थी कि 19 लोगों की जान बहुत हद तक उनके हाथों में थी।
इन सबके बावजूद अधिकारियों और कर्मियों की सकुशल वापसी को लेकर मेजर टैंगो थोड़े चिंतित थे। किताब में उनको यह याद करते हुए कोट किया गया है, वहां मुझे लगता था कि मैं जवानों को खो सकता हूं।