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अगर बच्चे वोटर होते तो न होता ये अन्याय! पढ़ें बजट में बच्चों को क्या मिला
Fri, 05 Jul 2019 11:54 PM IST
Avdhesh Kumar
अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Fri, 05 Jul 2019 11:54 PM IST
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वित्त वर्ष 2018-19
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देश की आबादी का लगभग 38 फीसद हिस्सा बच्चों (जन्म से अठारह वर्ष की आयु से कम) का माना जाता है। लेकिन जब बजट में हिस्सेदारी की बात आती है तो इस वर्ग के हिस्से में सबसे कम धनराशि का निर्धारण किया जाता है। वित्त वर्ष 2019-20 के बजटीय आवंटन में बच्चों की हिस्सेदारी पिछले वर्ष के 3.31 फीसद से भी कम होकर 3.29 फीसद रह गई है। यह अलग बात है कि इसी बीच देश का रक्षा बजट 13.4 फीसदी हो चुका है।
यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि बच्चों के लिए यूपीए सरकार में अपेक्षाकृत ज्यादा बजट मिलता था, लेकिन वर्तमान सरकार के आने के बाद बच्चों की प्राथमिकता लगातार पीछे छूट रही है। सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना का हमेशा ढिंढोरा पीटती रही है। लेकिन जब बजट आवंटन की बात आई तो इस मद में पूरे देश के लिए महज 280 करोड़ रूपये का आवंटन किया गया है।
देश की पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट में बच्चों को 91,644.29 करोड़ रूपये का आवंटन किया गया है। यह बजट की कुल राशि 27,86,349 करोड़ रूपये का 3.29 फीसदी हिस्सा है। (पिछले वित्त वर्ष 2018-19 में यह राशि 81,235.63 करोड़ रूपये थी।) बच्चों के लिए आवंटित इस बजट में बच्चों की शिक्षा के लिए 61,909.93 करोड़ रूपये (या बच्चों के लिए आवंटित कुल बजट का 67.6 फीसदी) का बजट निर्धारित किया गया है।
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स्वास्थ्य सबसे पीछे
बच्चों का स्वास्थ्य पूरी व्यवस्था में सबसे पीछे छूट गया है। बच्चों के स्वास्थ्य के लिए 3218.33 करोड़ रूपये देना तय हुआ है। यह राशि बच्चों के लिए निर्धारित कुल बजट का महज 3.5 फीसद है। बच्चों के स्वास्थ्य पर पिछले वर्ष भी इस बार से अधिक 3328.71 करोड़ रूपये खर्च किया गया था।
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यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि बच्चों के लिए यूपीए सरकार में अपेक्षाकृत ज्यादा बजट मिलता था, लेकिन वर्तमान सरकार के आने के बाद बच्चों की प्राथमिकता लगातार पीछे छूट रही है। सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना का हमेशा ढिंढोरा पीटती रही है। लेकिन जब बजट आवंटन की बात आई तो इस मद में पूरे देश के लिए महज 280 करोड़ रूपये का आवंटन किया गया है।
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देश की पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट में बच्चों को 91,644.29 करोड़ रूपये का आवंटन किया गया है। यह बजट की कुल राशि 27,86,349 करोड़ रूपये का 3.29 फीसदी हिस्सा है। (पिछले वित्त वर्ष 2018-19 में यह राशि 81,235.63 करोड़ रूपये थी।) बच्चों के लिए आवंटित इस बजट में बच्चों की शिक्षा के लिए 61,909.93 करोड़ रूपये (या बच्चों के लिए आवंटित कुल बजट का 67.6 फीसदी) का बजट निर्धारित किया गया है।
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स्वास्थ्य सबसे पीछे
बच्चों का स्वास्थ्य पूरी व्यवस्था में सबसे पीछे छूट गया है। बच्चों के स्वास्थ्य के लिए 3218.33 करोड़ रूपये देना तय हुआ है। यह राशि बच्चों के लिए निर्धारित कुल बजट का महज 3.5 फीसद है। बच्चों के स्वास्थ्य पर पिछले वर्ष भी इस बार से अधिक 3328.71 करोड़ रूपये खर्च किया गया था।
लगातार कम हुआ बजट
वर्ष 2012-13 में बच्चों के लिए कुल बजट का 5.04 फीसदी हिस्सा आवंटित किया गया था। इसके बाद से यह राशि लगातार कम होती गई है। वर्ष 2013-14 में 4.65 फीसदी, वर्ष 2014-15 में 4.20 फीसदी, वर्ष 2015-16 में 3.23 फीसदी, वर्ष 2016-17 में 3.35 फीसदी, वर्ष 2017-18 में 3.30 फीसदी और 2018-19 में यह 3.31 फीसदी था. मौजूदा वर्ष में सरकार ने इसके लिए 3.29 फीसदी बजट निर्धारित किया है।
विशेषज्ञ ने बताया उपाय
विकास संवाद इन्फोपैक से जुड़े विशेषज्ञ सचिन जैन का कहना है कि बच्चों के प्रति हमारी सरकारों का दृष्टिकोण यह रहता है कि उनके हितों की चिंता महिलाओं के साथ हो जाती है। इसीलिए बच्चों का विषय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के साथ एक समग्र रूप में देखा जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि बच्चों के अनेक ऐसे विषय हैं जो महिलाओं के साथ नहीं देखे जा सकते।
सचिन जैन के मुताबिक, भारत जैसे देश में सभी काम सरकार के भरोसे पर रहकर नहीं किये जा सकते। लेकिन सरकार को इसके लिए पीपीपी मॉडल को प्रोत्साहित करना चाहिए। अगर औद्योगिक घराने अपनी सहभागिता के लिए आगे आते हैं तो इसके लिए उन्हें कर राहत जैसी योजनायें भी बनाई जा सकती हैं।
बच्चों की शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञ विवेक सिंह के मुताबिक सरकार देश के भविष्य को बेहतर करने के लिए काम कर रही है। लेकिन किसी भी देश का भविष्य उसके सशक्त, सक्षम और सबल बच्चों से तय होता है, इसलिए सरकार को इसे भविष्य का निवेश समझ कर बच्चों के विकास में भारी निवेश करना चाहिए।
विशेषज्ञ ने बताया उपाय
विकास संवाद इन्फोपैक से जुड़े विशेषज्ञ सचिन जैन का कहना है कि बच्चों के प्रति हमारी सरकारों का दृष्टिकोण यह रहता है कि उनके हितों की चिंता महिलाओं के साथ हो जाती है। इसीलिए बच्चों का विषय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के साथ एक समग्र रूप में देखा जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि बच्चों के अनेक ऐसे विषय हैं जो महिलाओं के साथ नहीं देखे जा सकते।
सचिन जैन के मुताबिक, भारत जैसे देश में सभी काम सरकार के भरोसे पर रहकर नहीं किये जा सकते। लेकिन सरकार को इसके लिए पीपीपी मॉडल को प्रोत्साहित करना चाहिए। अगर औद्योगिक घराने अपनी सहभागिता के लिए आगे आते हैं तो इसके लिए उन्हें कर राहत जैसी योजनायें भी बनाई जा सकती हैं।
बच्चों की शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञ विवेक सिंह के मुताबिक सरकार देश के भविष्य को बेहतर करने के लिए काम कर रही है। लेकिन किसी भी देश का भविष्य उसके सशक्त, सक्षम और सबल बच्चों से तय होता है, इसलिए सरकार को इसे भविष्य का निवेश समझ कर बच्चों के विकास में भारी निवेश करना चाहिए।