देखना है क्या किसान अंदोलन पर 30 दिसंबर को केंद्र सरकार गिरा पाएगी 'झूठ की दीवार'
- कृषि मंत्री ने कहा किसानों के बीच सुनियोजित तरीके से फैलाई गई झूठ की दीवार
- छह दौर की वार्ताएं होने के बाद भी अभी तक खाली हैं केंद्र सरकार के हाथ
- किसान संगठनों का कहना है कि जिद तो सरकार ने पाली है, हमें बस हक चाहिए
विस्तार
बुधवार, 30 दिसंबर को दोपहर दो बजे किसान संगठनों के नेता और उनके प्रतिनिधि केंद्र सरकार से सातवें दौर की वार्ता करेंगे। केंद्र सरकार के बातचीत के प्रस्ताव पर किसानों की सहमति के बाद सोमवार को केंद्रीय कृषि सचिव संजय अग्रवाल ने पत्र लिखकर किसान नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया है। बातचीत एमएसपी, तीनों कानून के प्रावधान, वायु की गुणवत्ता, किसानों के लिए बिजली बिल समेत तमाम मुद्दों पर होगी। देखना होगा कि क्या केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, सहयोगी पीयूष गोयल के साथ सातवें दौर की वार्ता में किसान आंदोलन के पीछे तैयार की गई 'झूठ की दीवार' को गिरा पाते हैं।
किसान नेता हरमीत सिंह कादियान का कहना है कि छह दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अभी कोई समाधान नहीं निकला है। केंद्र सरकार किसानों की मांग पर संवेदनशीलता से बात करने की बजाय टालमटोल की रणनीति पर चल रही है। किसान आंदोलन को बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है। कादियान का कहना है कि फिलहाल सातवें दौर की बातचीत का बुलावा आया है। किसान नाउम्मीद नहीं हुए हैं। कृषि सचिव के पत्र को लेकर फिलवक्त किसान नेता बैठकें कर रहे हैं। देर रात तक आगे की रणनीति तय होने का अनुमान है।
कृषि मंत्री का भरोसा: जल्द गिरेगी झूठ की दीवार
कृषि मंत्री ने सोमवार को एक बार फिर केंद्र सरकार के तीनों कानूनों का साथ दिया। उन्होंने कहा कि कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के बीच बहुत सुनियोजित तरीके से झूठ की दीवार को फैलाया गया है। तोमर ने आगे कहा कि यह झूठ अधिक दिनों तक नहीं चलेगा। जल्द किसानों को सच्चाई का अहसास होगा। तोमर को विश्वास है कि जल्द ही इस गतिरोध को दूर करने के लिए कोई न कोई समाधान निकलेगा। उधर, कादियान का कहना है कि वह राजनीतिक बातों का कोई जवाब नहीं देना चाहते। केंद्र सरकार के मंत्री और भाजपा के नेता तो शुरू से ही किसान आंदोलन को बदनाम करने में लगे हैं। जबकि यह केवल किसानों का आंदोलन है और किसान हितों की ही मांग हो रही है।
सरकार और किसानों के बीच चूहे-बिल्ली का खेल
किसान मामलों के जानकार चौधरी पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं कि किसान आंदोलन और उनकी मांग को लेकर लेकर न तो केंद्र सरकार ही बहुत संवेदनशील है और न ही किसानों के साथ खुलेमन से वाता प्रक्रिया ही पूरी हो पा रही है। सरकार और किसान दोनों ही खुलेमन से बातचीत के लिए तैयार होने का दावा जरूर कर रहे हैं, लेकिन यह हकीकत है कि छह दौर की वार्ता बिना नतीजे की रही है। किसान नेता वीएम सिंह का कहना है कि सरकार और नेताओं को किसान आंदोलन को बदनाम करने से पहले बताना चाहिए कि तीनों कानून पांच जून 2020 को संसद में पारित हुए हैं। मक्का और धान की फसलें तो बाद में आई है। धान की एमएसपी 1868 रुपये है और बिका 1100-1200 रुपये प्रति कुंतल पर है। मक्का तो 600-700 रुपये प्रति कुंतल के भाव से बिका है। केंद्र सरकार यही बता दे कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? कृषि मंत्री कहते हैं कि किसान एमएसपी पर खरीद की गारंटी मांग रहे हैं, यह गारंटी देने पर केंद्र सरकार पर 12 लाख करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। जबकि हकीकत यह है कि एमएसपी पर आगे की खरीद तो निजी कंपनियां या आढ़ती, बाजार के खरीददार करेंगे। फिर सरकार को परेशानी क्यों हैं?