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पीएम मोदी ने कांग्रेस को याद दिलाई शाहबानो केस की गलती, जानें यह चर्चित मामला

Tue, 25 Jun 2019 10:55 PM IST
Nilesh Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nilesh Kumar Updated Tue, 25 Jun 2019 10:55 PM IST
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PM Modi Attacks Congress over Shah bano case, know all about this case
लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : PTI

लोकसभा में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अभिभाषण पर हुई चर्चा के बाद मंगलवार को पीएम मोदी ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए विपक्ष को निशाने पर लिया। उन्होंने आपातकाल से लेकर भ्रष्टाचार और तीन तलाक तक कांग्रेस को घेरा। पीएम मोदी ने कहा कि महिला सशक्तीकरण के लिए कांग्रेस को कई बड़े मौके मिले, लेकिन हर बार वो चूक गए। 1950 के दशक में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर बहस के दौरान वे पहला मौका चूके। इसके 35 साल बाद शाहबानो केस के दौरान एक और मौका गंवाया। अब तीन तलाक बिल के रूप में इनके पास एक और मौका है। 

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पीएम मोदी ने शाहबानो केस के समय कांग्रेस के एक नेता के इंटरव्यू का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस नेता ने तब कहा था- मुसलमानों के उत्थान की जिम्मेदारी कांग्रेस की नहीं है। मुसलमान अगर गटर में रहना चाहते हैं, तो उन्हें गटर में ही रहने दो। पीएम मोदी के इतना कहते ही कांग्रेस ने सदन में थोड़ी देर तक हंगामा भी किया। 

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पीएम मोदी ने तीन तलाक बिल पर कांग्रेस से समर्थन की उम्मीद करते हुए कहा कि कांग्रेस के पास अपनी गलती सुधारने का मौका है। संसद में एक बार फिर बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण की याद ताजा कर दी। तीन तलाक के मुद्दे ने 1980 के दशक के शाह बानो प्रकरण पर चर्चा शुरू हो गई है। 

उस समय भी देश की सबसे बड़ी अदालत ने तलाकशुदा शाहबानो के पक्ष में फैसला दिया था, लेकिन कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बुरी तरह डरा दिया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को इस्लाम में दखल मानकर केंद्र ने नया कानून बनाया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू होने से ही रोक दिया गया था और शाहबानो इंसाफ से वंचित रह गई थी। 

पति ने तीन तलाक कहते हुए पांच बच्चों की मां शाह बानो को छोड़ दिया था

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सांकेतिक तस्वीर

दरअसल, 62 वर्षीय मुस्लिम महिला शाहबानो पांच बच्चों की मां थीं। उनके शौहर ने 1978 में ही तीन तलाक कहते हुए उनको घर से निकाल दिया था। मुस्लिम पारिवारिक कानून के अनुसार शौहर बीवी की मर्जी के खिलाफ ऐसा करने को स्वतंत्र था। बच्चों और अपनी जीविका का कोई साधन न होने से पति से गुजारा लेने के लिए शाह बानो अदालत पहुंचीं। उस लाचार महिला को सुप्रीम कोर्ट पहुंचने में ही सात साल लग गए।

कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत फैसला दिया जो हर किसी पर लागू होता है, फिर चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म का हो। कोर्ट ने निर्देश दिया कि शाह बानो को निर्वाह-व्यय के समान जीविका दी जाए। तब भी रूढ़िवादी लोगों को कोर्ट का फैसला मजहब में दखल लगा। कांग्रेस ने अपने इस कदम को धर्मनिरपेक्षता की मिसाल के रूप में पेश किया। तब सरकार के पास 415 लोकसभा सांसदों का बंपर बहुमत था, लिहाजा, मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार सरंक्षण) कानून 1986 में आसानी से पास हो गया।

अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला

देश की सर्वोच्च अदालत ने मुस्लिम समाज से जुड़े तीन तलाक को अवैध करार दिया और केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वजह जल्द ही इस मुद्दे पर कानून बनाए। इसी के साथ इस फैसले ने इस केस को लड़ने वाली तमाम महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान ला दी।

सुप्रीम कोर्ट की पांच विद्वान न्यायाधीशों (जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई चारो समुदाय के जज थे) की संवैधानिक पीठ ने ट्रिपल तलाक की सदियों पुरानी परंपरा से मुस्लिम महिलाओं को निजात दिला दी थी। ट्रिपल तलाक और हलाला की विभीषिका से दो चार होने वाली मुस्लिम महिलाओं ने फैसले का स्वागत किया था। इन महिलाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शुक्रिया अदा किया था।

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