पद्मश्री और भारत भारती सम्मान से सम्मानित उषा किरण खान बोलीं- साहित्य नहीं देता रोजी रोटी
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पद्मश्री से सम्मानित हिंदी और मैथिली साहित्य की सुप्रसिद्ध लेखिका डॉ उषा किरण खान को हाल ही में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के सर्वोच्च साहित्य सम्मान भारत-भारती से नवाजा गया है। डॉ खान ने हिंदी के साथ-साथ मैथिली में भी दर्जनों उपन्यास व कहानियां लिखी हैं। इसके अलावा वह बाल साहित्य और नाटक लेखन के लिए भी जानी जाती हैं। मैथिली में लेखन के लिए डॉ खान को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया है। उषा जी बिहार के दरभंगा जिले से ताल्लुक रखती हैं। प्रस्तुत हैं डॉ उषा किरण खान के साथ मुकेश झा की बातचीत के प्रमुख अंशः
प्रश्नः- सबसे पहले भारत-भारती सम्मान के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई। उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा साहित्यिक पुरस्कार मिला है, क्या कहेंगी?
उत्तरः धन्यवाद! बड़े हर्ष की बात है कि मेरी इतने दिनों की साधना का फल है ये भारत भारती सम्मान। क्योंकि ये हिंदी साहित्य में सबसे सर्वोच्च स्थान रखता है और इसका महत्व है। मैं प्रसन्न हूं।
प्रश्नः-महादेवी वर्मा के बाद आप दूसरी महिला हैं, जिन्हें उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा साहित्यिक पुरस्कार मिला है, यह सम्मान पाकर कैसा लगा?
उत्तरः महादेवी वर्मा के बाद मुझको ये सम्मान मिला है ये सच है। दरअसल, महादेवी वर्मा के बाद कई लेखकों को तो यह सम्मान मिला, लेकिन लेखिकाओं को नहीं। ऐसे में मैं महादेवी जी के बाद यह सम्मान पाने वाली पहली महिला हूं। मेरे मन में ऐसा नहीं है मैं महादेवी जी के बराबर हो गई, लेकिन मैं उस परंपरा को धारण कर रही हूं, यह सोचकर बहुत संतोष और हर्ष होता है।
प्रश्नः-कब से लिखती आ रही हैं और अभी तक का सफर कैसा रहा... किस उपन्यास से काफी प्रसिद्धि मिली और परिवार का किस तरह का सहयोग मिला, इसके बारे में कुछ बताइए?
उत्तरः पहली बात तो ये है कि मैं बचपन से लिख रही हूं, लेकिन लिखने और प्रकाशित होने में अंतर है। प्रकाशन मेरा हो रहा है 1977 से। तब से मेरी लिखी हुई चीजें लगातार प्रकाशित हो रही हैं। पहले तो कहानियां लिखीं, कहानियों से विख्यात हुई। कहानियों में 'दूब धान' मेरी कहानी है जिसे सब जानते हैं, वो बड़ी विख्यात हुई। उसके बाद मैंने उपन्यास लिखना शुरू किया, जबकि इससे पहले मैंने कम से कम 50 हिंदी और 25 मैथिली की कहानियां लिख चुकी थी। सारे उपन्यास लोगों ने हाथों-हाथ लिए। 'हसीना मंजिल' उपन्यास से मुझे काफी प्रसिद्धि मिली। यह उपन्यास पांच बार साहित्य पुरस्कार के फाइनल राउंड में आया। हालांकि, पुरस्कार नहीं मिला, लेकिन वो इतनी प्रसिद्धि प्राप्त कर गया कि इंडियन क्लासिक के तहत उस पर दूरदर्शन ने सीरियल बनाया। तो 'हसीना मंजिल' काफी विख्यात उपन्यास हुआ। उसके कई अनुवाद भी हिंदी व अंग्रेजी में हुए और हाल ही मैनें उर्दू में इसका लोकार्पण किया है।
प्रश्नः-इतिहास की छात्रा रहीं हैं आप, लेकिन साहित्य में इतनी दखल और पकड़ कैसे?
उत्तरः इतिहास का शाब्दिक अर्थ क्या है इति-हास यानी वो कहानी जो खत्म हो गई। इतिहास भी तो कहानी ही है। इतिहास पढ़ने वाला कथाकार होगा इसमें आश्चर्य का विषय नहीं है। हां, तब है क्या जो इतिहास के बाद मैं आज के समाज की बात मैं करने लग गई हूं। ये एक बात है जरूर तो मेरी रुचि उसमें है। इतिहास कोई साधारण भाषा में नहीं लिख सकता है। इतिहास हमेशा अच्छी भाषा में ही लिखा जाता है। इसलिए इतिहास वाले के लिए विरोधाभासी विषय बिल्कुल नहीं है कि कथाकार हम हैं।
प्रश्नः-कौन से ऐसे समकालीन और वरिष्ठ लेखक रहे हैं, जिनसे आपको प्रेरणा मिली और आप काफी प्रभावित हुईं?
उत्तरः एक ही नहीं रहे हैं। कई कवि और लेखक रहे हैं। बिहार कवियों और लेखकों की धरती पहले है। क्योंकि हमारे यहां तो दिनकर और बाबा नागर्जुन जैसे कवि हो चुके हैं। इसके अलावा भारतीय परिदृश्य में, हिंदी के परिदृश्य में अज्ञेय जैसे कवि और लेखक हुए हैं। ये सारे मेरे प्रेरणास्रोत थे। बेनीपुरी (रामवृक्ष बेनीपुरी) जी थे। दरअसल, अगर मेरी शैली को देखें आप तो मैं बेनीपुरी जी का ही अधिक अनुसरण करती हुई पाई जाऊंगी। क्योंकि बेनीपुरी जी जैसे शैलीकार, राजा राधिका रमण सिंह जैसे शैलीकार दूसरे प्रदेशों में नहीं है, जैसा कि हमारे यहां है और उसके बाद फणीश्वरनाथ रेणु हो गए तो ये सारे लोग मेरे आदर्श रहे हैं। किसी एक का नाम मैं क्या लूं। अब प्रेमचंद तो सबसे बड़े आदर्श और जड़ हैं। यही बात है।
प्रश्नः-वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' बाबा नागार्जुन से आप कितना प्रभावित हैं और कहा जाता है कि वह आपके प्रेरणास्रोत भी रहे हैं।
उत्तरः असल में बाबा नागार्जुन मेरे पिता तुल्य रहे हैं। वह मेरे पिता के मित्र थे। शुरू से ही उनका हमारे यहां से ऐसा संबंध था, जैसा कि दो भाइयों का होता है। एक तरह से दोनों अनाथ तरह के थे। क्योंकि मेरे पिता के भी माता-पिता नहीं थे और उनकी भी मां नहीं थी और जेल में ये लोग मिले थे तो मुझे लगता है कि उन दोनों में संवेदना का संबंध रहा होगा। मैं जब बहुत छोटी थी तब ही मेरे पिता का निधन हो गया। तो बाबा नागार्जुन मेरे पिता की भूमिका में एक तरह से थे। बाबा की शैली, कथ्य, कविता और कहानी से तो सभी प्रभावित हैं तो मैं क्यों नहीं होऊंगी और मैं थी। प्रेरणास्रोत जो कई हैं उनमें से एक वो भी हैं।
प्रश्नः-महादेवी वर्मा सम्मान, दिनकर राष्ट्रीय पुरस्कार, कुसुमांजली पुरस्कार, विद्यानिवास मिश्र पुरस्कार, प्रबोध साहित्य सम्मान, मैथिली में साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री और अब भारत-भारती सम्मान और अब अगला पड़ाव क्या है... कैसा लगता है ये सम्मान पाकर?
उत्तरः- पुरस्कार के लिए अगला पड़ाव क्या है, इसके बारे में मैं तो कुछ नहीं कह सकती। मेरा काम सिर्फ लिखना है। पुरस्कार देने वालों के ऊपर है कि वो हमें क्या देते हैं। अगर उनकी दृष्टि में मैं अभी भी पुरस्कार लेने योग्य हूं तो अभी बहुत सारे पुरस्कार बाकी है, जो मिलना चाहिए। हो सकता है कि मिल जाए, लेकिन मैं लेखक हूं तो मैं सिर्फ लिखूंगी। पुरस्कार के बारे में वो जानेंगे जो देंगे।
प्रश्नः-उपन्यास 'भामती' के लिए आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया है, क्या कुछ खास है इस उपन्यास में?
उत्तरः- सबसे पहली बात तो ये हैं कि वो दसवीं शताब्दी की कहानी है, एक विशेष नारी की। वो ऐसी स्त्री है, जिसके पति गहन अध्ययन कर दर्शनशास्त्र के एक सूत्र को सुलझा रहे थे। उसको लिखने में उन्हें बहुत समय लगा, लेकिन उनकी पत्नी बिना किसी स्वार्थ के अपने पति की सेवा करती रही। जब उन्होंने लिख के समाप्त किया तब उनको पता चला कि उनकी पत्नी भी हैं। आज की दृष्टि से बड़ा बुरा लगता है सोचकर कि पत्नी का तो उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। मगर जो उन्होंने दर्शन का टीका लिखा, उसका नाम उन्होंने भामती टीका रख दिया। अपनी पत्नी को पूरा श्रेय दिया और बाद में उन्होंने अपना नाम लिखा, भामतीपतिवाचस्पति। ऐसा कोई नहीं करता है। तो ये एक समय में पति-पत्नी के बीच संवेदना और सौहार्द का उदाहरण है। इसलिए मैंने यह उपन्यास लिखा और दसवीं शताब्दी की जो सामाजिक, शैक्षणिक, धार्मिक और एक तरह से थोड़ी बहुत राजनीतिक भी स्थिति थी। उसको इस उपन्यास में रेखांकित किया गया है। शायद इसलिए भामती लोगों को आकर्षित करती है। मुझे पुरस्कार भी मिला और लोग उसे पढ़ते और खरीदते भी हैं।
प्रश्नः-आखिरी सवाल ये कि युवाओं को क्या कहना चाहेंगे और उनका साहित्य के प्रति रुझान कैसे बढ़ेगा?
उत्तरः- साहित्य के प्रति रुझान हमेशा से कम लोगों को होता है। अनेक तरीका है लोगों को संस्कृति समझाने का। साहित्य संस्कृति का ही एक विशेष रूप है। तो साहित्य में बहुत ज्यादा रुझान नहीं होता है कभी भी। जहां तक है कि रोजी रोटी साहित्य नहीं देता है और रोजी रोटी पहली शर्त होती है किसी को भी। आपने बाबा नागार्जुन की चर्चा की। उन्होंने कोई नौकरी नहीं की। वो पूर्णतया साहित्य करते रहे। अज्ञेय जी पूर्णतया साहित्य करते रहे। मगर हमने ऐसा नहीं किया। हमने नौकरी भी और रोजी रोटी का भी इंतजाम किया। आज आपको खोजने से नहीं मिलेगा कोई ऐसा व्यक्ति जो बिना रोजी रोटी के इंतजाम के साहित्य कर रहा हो। साहित्य रोजी रोटी नहीं देता है। इसलिए आपको लगेगा कि साहित्य कम लोग पढ़ रहे हैं। तो जिसकी रुचि होगी वही साहित्य पढ़ेगा। उसके लिए आप कुछ नहीं कर सकते हैं और निराश भी होने की जरूरत नहीं है। साहित्य लोग पढ़ भी रहे हैं। आप कैसे सोचते हैं मास में लोग साहित्य पढ़ेंगे? ऐसा नहीं हो सकता है। हम निराश नहीं हैं।