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मानसून सत्र से पहले विपक्ष के कड़े तेवर, सत्ता पक्ष ने की धार कुंद करने की तैयारी
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
Updated Tue, 17 Jul 2018 01:49 AM IST
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मानसून सत्र में सत्ता के पक्ष के पास एक के बाद एक कड़ी चुनौतियां हैं। सत्ता पक्ष की चुनौतियों को देखकर विपक्ष ने अभी से कड़े तेवर दिखाना शुरू कर दिया है। वहीं सत्ता पक्ष नें भी विपक्ष की धार कुंद करने की तैयारी कर ली है।
कांग्रेस ने सोमवार को सड़क पर उतरकर सरकार से महिला आरक्षण विधेयक को मंजूरी दिलाने के लिए प्रदर्शन किया, वहीं केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कांग्रेस की इस मांग को टाल गए। इन सबके बीच में बुधवार को शुरू हो रहे मानसून सत्र में जहां सरकार की जिम्मेदारी छह आध्यादेश को संसद की मंजूरी दिलाने की है, वहीं लोकसभा में 65 और राज्य सभा में 40 पुराने लंबित बिल को पारित कराने के अलावा नये बिलों को मंजूरी दिलाना भी है।
संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार के अनुसार सरकार मानसून सत्र में विपक्ष से सहयोग की अपील करेगी। सरकार सदन सुचारु रूप से चलाने के पक्ष में है। केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का भी कहना है कि सरकार की हमेशा मंशा संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही चलाने की रही है। वहीं कांग्रेस के नेता आरपीएन सिंह का कहना है कि सत्ता पक्ष संसद की कार्यवाही को चलाना ही नहीं चाहता।
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राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद हमेशा कहते रहे हैं कि संसद की कार्यवाही चलाने की पहली जिम्मेदारी सरकार (सत्ता पक्ष) की है। फिलहाल संसद की कार्यवाही को निर्वाध पूर्व चलाने और विपक्ष से सहयोग लेने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में 17 जुलाई को सर्व दलीय बैठक बुलाई गई है। इसके सामानांतर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भी पत्र लिखकर राजनीतिक दलों से सदन को बाधारहित चलाने में सहयोग मांगा है।
क्या है सत्ता पक्ष की चुनौती
राज्यसभा में उपसभापति का चुनाव। सत्ता पक्ष मनमाफिक उपसभापति चाहता है, लेकिन उसके पास पर्याप्त संख्याबल नहीं है। यदि विपक्षी दल एकजुट रहे तो सत्ता पक्ष के लिए मुश्किल हो सकती है। इसके लिए सत्ता पक्ष हर दांव अजमा सकता है। इसमें स्थिति विपरीत होने की आशंका देखकर चुनाव को टालने के विकल्प पर भी जा सकता है।
तीन तलाक से जुड़ा द मुस्लिम वुमन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट ऑन मैरिज) बिल-2017 को सरकार पारित कराना चाहती है। यह लोक सभा में मंजूरी पा चुका है और राज्यसभा में अटका है। विपक्ष इस बिल के प्रवधानों के पक्ष में नहीं है। इसी तरह से राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए 123 वें संविधान संशोधन की आवश्यकता पड़ेगी। इसमें भी सत्ता पक्ष को विपक्षी दलों का सहयोग जरूरी होगा।
विपक्ष के लिए
संसद का कोई भी सत्र विपक्ष के लिए सरकार के खिलाफ अपनी आवाज को धार देने का एक अवसर होता है। लोकतंत्र में संसद में सरकार के कामकाज पर सवाल पूछना विपक्ष का बड़ा हथियार होता है। विपक्ष सत्ता पक्ष को कठघरे में खड़ा करता है और विरोध दर्ज कराकर सरकार के नीतियों की आलोचना करता है।
इस साल के अंत में मिजोरम, राजस्थान, छत्तीसगढ़, म.प्र. विधानसभा के चुनाव होने हैं। इसे केन्द्र मे रखकर विपक्ष के पास संसद का मानसून सत्र अच्छा अवसर है। इसलिए विपक्ष अपनी एकजुटता को दिखाने के साथ सरकार पर भरपूर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है। विपक्ष राज्यसभा में उपसभा पति का अपना उम्मीदवार चाहता है। पिछड़ा वर्ग को संवैधानिक दर्जा देने, तीन तलाक के मुद्दा समेत कई बिन्दुओं पर केन्द्र सरकार की राय से अलग विचार रखता है। इन बिन्दुओं पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में जोरदार तकरार देखने को मिल सकती है।
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कांग्रेस ने सोमवार को सड़क पर उतरकर सरकार से महिला आरक्षण विधेयक को मंजूरी दिलाने के लिए प्रदर्शन किया, वहीं केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कांग्रेस की इस मांग को टाल गए। इन सबके बीच में बुधवार को शुरू हो रहे मानसून सत्र में जहां सरकार की जिम्मेदारी छह आध्यादेश को संसद की मंजूरी दिलाने की है, वहीं लोकसभा में 65 और राज्य सभा में 40 पुराने लंबित बिल को पारित कराने के अलावा नये बिलों को मंजूरी दिलाना भी है।
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संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार के अनुसार सरकार मानसून सत्र में विपक्ष से सहयोग की अपील करेगी। सरकार सदन सुचारु रूप से चलाने के पक्ष में है। केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का भी कहना है कि सरकार की हमेशा मंशा संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही चलाने की रही है। वहीं कांग्रेस के नेता आरपीएन सिंह का कहना है कि सत्ता पक्ष संसद की कार्यवाही को चलाना ही नहीं चाहता।
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राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद हमेशा कहते रहे हैं कि संसद की कार्यवाही चलाने की पहली जिम्मेदारी सरकार (सत्ता पक्ष) की है। फिलहाल संसद की कार्यवाही को निर्वाध पूर्व चलाने और विपक्ष से सहयोग लेने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में 17 जुलाई को सर्व दलीय बैठक बुलाई गई है। इसके सामानांतर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भी पत्र लिखकर राजनीतिक दलों से सदन को बाधारहित चलाने में सहयोग मांगा है।
क्या है सत्ता पक्ष की चुनौती
राज्यसभा में उपसभापति का चुनाव। सत्ता पक्ष मनमाफिक उपसभापति चाहता है, लेकिन उसके पास पर्याप्त संख्याबल नहीं है। यदि विपक्षी दल एकजुट रहे तो सत्ता पक्ष के लिए मुश्किल हो सकती है। इसके लिए सत्ता पक्ष हर दांव अजमा सकता है। इसमें स्थिति विपरीत होने की आशंका देखकर चुनाव को टालने के विकल्प पर भी जा सकता है।
तीन तलाक से जुड़ा द मुस्लिम वुमन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट ऑन मैरिज) बिल-2017 को सरकार पारित कराना चाहती है। यह लोक सभा में मंजूरी पा चुका है और राज्यसभा में अटका है। विपक्ष इस बिल के प्रवधानों के पक्ष में नहीं है। इसी तरह से राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए 123 वें संविधान संशोधन की आवश्यकता पड़ेगी। इसमें भी सत्ता पक्ष को विपक्षी दलों का सहयोग जरूरी होगा।
विपक्ष के लिए
संसद का कोई भी सत्र विपक्ष के लिए सरकार के खिलाफ अपनी आवाज को धार देने का एक अवसर होता है। लोकतंत्र में संसद में सरकार के कामकाज पर सवाल पूछना विपक्ष का बड़ा हथियार होता है। विपक्ष सत्ता पक्ष को कठघरे में खड़ा करता है और विरोध दर्ज कराकर सरकार के नीतियों की आलोचना करता है।
इस साल के अंत में मिजोरम, राजस्थान, छत्तीसगढ़, म.प्र. विधानसभा के चुनाव होने हैं। इसे केन्द्र मे रखकर विपक्ष के पास संसद का मानसून सत्र अच्छा अवसर है। इसलिए विपक्ष अपनी एकजुटता को दिखाने के साथ सरकार पर भरपूर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है। विपक्ष राज्यसभा में उपसभा पति का अपना उम्मीदवार चाहता है। पिछड़ा वर्ग को संवैधानिक दर्जा देने, तीन तलाक के मुद्दा समेत कई बिन्दुओं पर केन्द्र सरकार की राय से अलग विचार रखता है। इन बिन्दुओं पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में जोरदार तकरार देखने को मिल सकती है।