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काम रसोइए का, पढ़ाई 9वीं पास और इनकी कमाई लाखों में

Sun, 26 Feb 2017 01:31 PM IST
बीबीसी
बीबीसी Updated Sun, 26 Feb 2017 01:31 PM IST
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 Ninth passed person having wages in lakhs

सफेद कुर्ता, धोती, जूती, सिर पर लाल साफा और हाथ में छोटा सा डंडा। पहली नजर में 78 साल के पूनमचंद अक्लिंग्दासोत पक्के चरवाहे लगते हैं। वो हैं भी चरवाहे। कई सालों से अपने पशुओं को रोजाना जंगल चराने ले के जाते हैं। लेकिन यही पूनमचंद भारत की कोकिला कही जाने वाली लता मंगेशकर और रिलायंस समूह के संस्थापक धीरू भाई अंबानी के यहाँ बरसों रह चुके हैं।

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वो मंगेशकर और अंबानी के रसोइये थे। वो मुस्कराकर बताते हैं, "मैंने लताजी के साथ पूरा भारत देखा।" उन्होंने 1997 में लताजी का घर छोड़कर अंबानी परिवार के लिए खाना पकाना शुरू किया। और फिर दस साल तक धीरूभाई, कोकिला बेन और उनके बच्चों के परिवारों के लिए मुंबई के घर में बाजरे और गेहूं की रोटियां बेलीं, खम्मन ढोकला और पोहे उबाले और दही समोसे और कचोरियाँ तलीं।
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वो याद करते हुए कहते हैं, "सेठ और कोकिला बहन को मेरा बनाया गुजराती खाना बहुत पसंद था।" मेनार के रहने वाले पूनमचंद प्राथमिक कक्षाओं के बाद कभी विद्यालय नहीं गए। वे किशोर अवस्था में ही मुंबई चले गए और 2007 में अंबानी के घर से सेवानिवृत हुए। उदयपुर-चित्तौड़गढ़ मार्ग पर स्थित इस दस हजार की आबादी वाले गाँव में कई सौ लोग पूनमचंद जैसे हैं।

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स्कूल बीच में छोड़ कर भी आज पा रहें हैं लाखों की सैलरी

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ये अरबपति व्यापारियों और हिंदी फिल्म कलाकारों के घरों में रसोइये हैं और लाखों कमाते हैं। लेकिन गाँव में अपनी छुट्टियों के दौरान पशुओं को चराते हुए या मोटर साइकिल पर चारा लाते हुए देखे जा सकते हैं। इनमें से ज्यादातर ने स्कूल बीच में छोड़ा और बचपन में ही खाना बनाने लग गए।

इन्हीं में से एक हैं यशवंत मेनारिया। 28 साल के यशवंत हिंदुजा भाइयों- श्रीचंद और गोपीचंद- के यहाँ लंदन में पिछले तीन साल से रसोइये हैं। उनकी महीने की आमदनी 1।20 लाख रूपये है। ऊपर से रहना, खाना और यात्रा करना मुफ्त।

यशवंत भी स्कूल ड्रॉपआउट हैं और उन्होंने 14 साल की उम्र में ही एक बहुराष्टीय भारतीय कंपनी की कैंटीन का ठेका ले लिया था। उनके लंदन में मेनार गाँव के तीन दूसरे साथियों - पुण्य शंकर मेनारिया, भेरू लाल मेनारिया और नारायण लाल मेनारिया और बेल्जियम की राजधानी एंटवर्प में रहने वाले कमलेश मेनारिया की कहानी भी उनसे मिलती जुलती है।
ये सब अपने बड़ों और सहकर्मियों को देखकर रसोइये बने।

एक ने भी संजीव कपूर की तरह पाक विद्या में कोई औपचारिक कोर्स नहीं किया हुआ है। उदहारण के लिए 32 साल के नारायण लाल मेनारिया हैं। उनकी महीने की सैलरी अभी 1।10 लाख रुपये से ऊपर है।


 

बड़े-बड़े व्यापारी एवं मशहूर कलाकार हमारी कंपनी में आते हैं रसोइये ढूंढ़ने

 Ninth passed person having wages in lakhs
​नारायण ने नवीं कक्षा में पढ़ना इसीलिए छोड़ दिया क्योंकि उनके बड़े भाई तब तक हॉन्ग कॉन्ग में एक हीरा व्यापारी के यहाँ रसोइये के तौर पर अच्छा खासा कमा रहे थे। वो बताते हैं, "मैंने भाई हुकमी लाल की तरह देश से बाहर रहने की ठान ली थी। ऐसे में आगे पढने के कोई मायने नहीं थे।"

आज नारायण लाल मारवाड़ी, गुजराती, पंजाबी, चायनीज, मैक्सिकन, इतालवी और कॉन्टिनेंटल खाना बना सकते हैं। यूँ तो मेनार में रसोइये बनने का चलन आधी सदी से भी पुराना है। मेनार के भैरुलाल रुप्जोत की पत्नी इसका सबूत हैं। मरहूम भैरुलाल ने अक्लिंग्दासोत एवं अन्य दूसरों से पहले धीरुभाई अंबानी के घर में काम किया था।

उनकी पत्नी को अभी तक अंबानी घराने से 4500 रुपये महीने की पेंशन मिलती है। लेकिन पिछले तीन दशकों में रसोइये बनने की इस प्रथा ने और भी जोर पकड़ा है और मेनार के आसपास के गाँवों को भी अपनी पकड़ में ले लिया है।

इसका एक बड़ा कारण बने मेनार निवासी प्रभुलाल जोशी जिन्होंने 1987 से एक गुजराती व्यापारी जितेन्द्र शाह के साथ मिलकर हिना टुअर्स एंड ट्रेवल्स कंपनी चलाई है। कंपनी में उत्तरी भारत और नेपाल के प्रमुख सुनील मेनारिया के अनुसार उनकी कंपनी में 200 कर्मचारी मेनार और उसके आसपास के गाँव के हैं।

​इनमें से अधिकतर रसोइये और टूर गाइडस हैं। सुनील कहते हैं, "बड़े-बड़े व्यापारी एवं मशहूर कलाकार हमारी कंपनी में रसोइये ढूंढ़ने आते हैं।" पिछले कुछ दशकों में दूसरा अंतर ये आया है की जहाँ पहले मेनारिया रसोइये मुंबई की मायानगरी और व्यापारिक घरानों में काम करके खुश थे अब हर कोई देश से बाहर जाने का लक्ष्य रखता है।

 

मानना है की इस गाँव के लोगों ने मुगलों के साथ लड़ाई में महाराणा प्रताप का साथ दिया था

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बेल्जियम के हीरा व्यापारी गिरधर भाई के यहाँ काम करने वाले कमलेश मेनारिया कहते हैं, "हर कोई रसोइया अब विदेश में रहना चाहता है।" मेनार और उसके आसपास के गाँवों के रसोइये आज दुनिया के हर कोने में फैले हैं। चाहे अबू धाबी, मस्कट, क़तर, नैरोबी, एंटवर्प, हॉन्ग कॉन्ग, अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन या फिर जापान हो, ये सब जगह मिल जाते हैं।

सबसे ज्यादा मेनारिया रसोइये दुबई में हैं। पिछले साल नवंबर में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्टाफ टोक्यो में एक गुजराती रसोइए की तलाश कर रहा था तो उनको उसी होटल में मेनार अंचल के भंवरलाल मांगीलाल मेनारिया मिल गए।

भंवरलाल ने न केवल मोदी की पसंद का कढ़ी खिचड़ी, ठेपला, उपमा, पोहा, मूंग खाकडा, सीरा और पोहा बनाया बल्कि उनके साथ में सेल्फी भी ली। मेनार अंचल के बहुत सारे लोग खासकर ब्राह्मण जो ज्यादातर रसोइये हैं अपने नाम के पीछे मनेरिया लगाना पसंद करते हैं। ये किसी भी हालात में माँसाहारी नहीं पकाते और अभी भी संयुक्त परिवारों में रहते हैं।

मेनार गाँव के लोग मानते हैं कि इनके बड़ों ने मुगलों के साथ लड़ाई में महाराणा प्रताप का साथ दिया था। हर साल मार्च में ये लोग उस लड़ाई की बरसी मनाते हैं।
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