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खुराफात: कोला और फलों के रस से झूठे कोरोना पॉजिटिव हो रहे बच्चे

Sun, 04 Jul 2021 06:18 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली
अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Sun, 04 Jul 2021 06:18 AM IST
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सार
  • ब्रिटेन समेत कुछ देशों में ढूंढा स्कूल न जाने का बहाना
  • रसों की अम्लीयता के कारण लेटरल एलएफटी किट में जांच हुई पॉजिटिव
  • प्रोफेसर ने पड़ताल कर ढूंढी खामी तो पकड़ में आई बच्चों की चालाकी
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New excuses for not going to school Children getting false corona positive from cola and fruit juice
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

स्कूल से बचने के लिए दुनियाभर के बच्चे नित नए बहाने बनाते रहे हैं। लेकिन, इन दिनों कुछ देशों में उन्होंने कोरोना की झूठी पॉजिटिव रिपोर्ट हासिल करने का तरीका ढूंढ निकाला है। इसके तहत वे लेटरल फ्लो टेस्ट (एलएफटी) किटों में सॉफ्ट ड्रिंक और फलों के रस का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनकी अम्लीयता के कारण रिपोर्ट पॉजिटिव आ रही है। जब एक प्रोफेसर को इस का पता लगा, तो वह प्रयोग कर बच्चों की इस चालाकी को पकड़ने में सफल रहे।



रस की बूंदों के फौरन बाद पॉजिटिव आया सैंपल
बच्चों की इस खुराफात का ब्रिटेन की एक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मार्क लॉर्च ने खुलासा किया है। सबसे पहले उन्होंने सॉफ्ट ड्रिंक और फलों के रस की बूंदों को लेटरल फ्लो टेस्ट किटों पर डाला, ताकि पता लगाया जा सके कि परिणाम किस तरह प्रभावित होता है। हैरानी की बात थी कि कुछ ही मिनटों में किटों की रिजल्ट विंडो में पॉजिटिव संकेत के तौर पर दो-दो लाल ‘टी’ लाइनें उभर गईं। यानी तकनीकी रूप से सैंपल में कोरोना की मौजूदगी की पुष्टि हो गई।


किट को खोलकर देखा
फिर मार्क ने जाना कि आखिर यह कैसे हुआ। इसके लिए उन्होंने किट को खोला, तो उन्हें इसमें कागज जैसे पदार्थ नाइट्रोसैलूलोज की पट्टी और एक छोटा लाल रंग का पेड मिला। इस पेड में कोरोना वायरस को बांधने के लिए एंटीबॉडी होती हैं। ये गोल्ड नैनोपार्टिकलों से जुड़ी होती हैं। जब भी एलएफटी टेस्ट किया जाता है, तो सैंपल को तरल बफर सॉल्यूशन के साथ मिलाया जाता है। ताकि स्ट्रिप पर गिरने से पहले सैंपल के पीएच का सही स्तर बना रहे।




अम्लीयता पर हुआ शक
मार्क ने सोचा कि बच्चों द्वारा झूठी कोरोना रिपोर्ट के इस्तेमाल किए जा रहे फलों के रस और सॉफ्ट ड्रिंक्स में कोई न कोई ऐसी चीज है, जो एंटीबॉडी की क्रियाविधि को प्रभावित कर रही है, जिससे वह पॉजिटिव परिमाण दिखाती है। गौर करने पर पता लगा कि इन रसों और ड्रिंक्स में एक बात समान है कि वे बहुत खट्टे हैं। संतरे के रस में सिट्रिक एसिड, कोला में फॉस्फोरिक एसिड और सेब के रस में मैलिक एसिड है, जिनका पीएच 2.5 से चार के बीच रहता है। एंटीबॉडी के लिए पीएच की यह स्थिति काफी प्रतिकूल है, जिससे लेटरल फ्लो टेस्ट पर असर पड़ सकता है।

प्रतिकूल पीएच से एंटीबॉडी में होने लगता बदलाव
ज्यादा पड़ताल करने पर पता लगा कि जांच की सही क्रियाविधि के लिए पीएच का सही स्तर बना रहना बहुत जरूरी है। इसलिए सैंपल को बफर के साथ मिलाया जाता है। अगर कोला को बफर के साथ मिला दिया जाए तो लेटरल फ्लो टेस्ट निगेटिव ही आएगा। लेकिन बिना बफर के अम्लीय पीएच वाले फलों के रस या कोला के संपर्क में आने से एंटीबॉडी में नाटकीय परिवर्तन दिखने लगते हैं।

दरअसल, एंटीबॉडी प्रोटीन होती हैं, जिनमें एमिनो एसिड बिल्डिंग ब्लॉक समाहित होते हैं और ये एक रेखीय शृंखला का निर्माण करते हैं। अम्लीय स्थिति में ये प्रोटीन काफी सक्रिय (चार्ज) हो जाते हैं। नतीजतन, आपस में बंधे प्रोटीन क्रियाविधि बाधित होने के कारण ठीक ढंग से काम करना बंद कर देते हैं। इस स्थिति में वायरस के प्रति एंटीबॉडी की संवेदनशीलता खो जाती है।

आखिर में इस तरह पकड़ में आया झूठ
बच्चों की इस खुराफात को पकड़ने का तरीका भी ढूंढा है। मार्क का कहना है, अधिकांश प्रोटीनों की तरह एंटीबॉडी अनुकूल परिस्थितियों में दोबारा अपनी क्रियाविधि शुरू कर सकती हैं। इसके लिए कोला और फलों के रस से पॉजिटिव आए टेस्ट किट को बफर सॉल्यूशन से धोया गया। सूखने के बाद देखा गया कि एंटीबॉडी अपनी पुरानी स्थिति में लौट आईं, टी-लाइन से गोल्ड कण भी निकलने लगे। इससे पता लगा कि पुराने सैंपल का  परिणाम निगेटिव था।

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