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नारायण मूर्ति ने बेटी को लिखे पत्र में बताया, क्यों नहीं था घर में टीवी?
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sat, 30 Apr 2016 03:51 PM IST
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अभी बहुत दिन नहीं हुए जब आईसीआईसीआई बैंक की एमडी चंदा कोचर ने अपनी बेटी को पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने अपनी प्रेरणा, अनुभव और जीवन यात्रा के उन छोटे कदमों के बारे में लिखा था जिससे उन्हें सफलता हासिल हुई थी। उनके पत्र के बाद इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति ने अपनी बेटी अक्षता के लिए पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने लिखा है कि किस तरह से उनके जीवन में बेटी के आने बाद उनका जीवन बदल गया। उन्होंने बेटी को लिखे पत्र में लिखा है कि जीवन में सरल बातें अक्सर खुश करती हैं।
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(नारायण मूर्ति की बेटी अक्षता)
मूर्ति का उनकी बेटी अक्षता को लिखा पत्र खासा वायरल हो रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए पत्र में क्या-क्या लिखा है मूर्ति ने अपनी बेटी को पढ़ें-
अक्षता,
मैंने यह कभी नहीं सोचा था कि पिता बनने के बाद मैं इतना बदल जाउंगा। मेरी जिन्दगी में तुम्हारा आना अपार खुशियों के साथ-साथ तमाम जिम्मेदारियां भी लाया। अब मैं सिर्फ एक पति, एक बेटा या केवल एक कर्मचारी ही नहीं था वरन् अब मैं एक पिता था जिसे अपनी बेटी की हर आशा रूपी मोड़ पर खरा उतरना था। तुम्हारे जन्म ने मेरे जीवन को हर मायने में बदल दिया। मेरे कार्यस्थल पर लोगों से बातचीत पहले से ज्यादा सधी और विचारपूर्ण होने लगी, बाहर की दुनिया से मेरा संबंध पहले के मायने में ज्यादा परिपक्व, विचारशील और गरिमामय हो गया था। मैं इस बात की जरूरत महसूस करने लगा था कि हर आदमी के साथ मेरा व्यवहार संवेदनशील और शिष्ट होना चाहिए।
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मूर्ति ने आगे लिखा है 'तुम किसी दिन बड़ी होकर दुनिया को समझोगी और मैं यह नहीं चाहता कि तुम यह सोचो कि मैंने कुछ गलत किया है।' अक्सर मेरा दिमाग तुम्हारे बचपन के दिनों में चला जाता है। तुम्हारी मां और मैं युवा दिनों में थे और अपने-अपने करियर में पांव जमा रहे थे। तुम्हारे जन्म के 2 माह बाद हम तुम्हारे साथ हुबली से मुंबई आ गए लेकिन जल्द ही इस बात का पता चल गया कि बच्चे की परवरिश करना और करियर दोनों एक साथ संभालना मुश्किल है। इसलिए हमने यह तय किया कि तुम अपने जीवन के शुरुआती दिनों में हुबली में दादा-दादी के साथ रहोगी।'
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(रोहन और अक्षता के साथ नारायण मूर्ति)
स्वाभाविक रूप से यह हमारे लिए कठिन निर्णय था। हर सप्ताह के आखिर में मैं बेलगाम तक हवाई जहाज से आता था और वहां से हुबली के लिए किराए पर कार लेता था, हालांकि इसमें बहुत पैसे खर्च होते थे लेकिन मैं तुम्हें देखे बिना नहीं रह सकता था। अमूमन मुझसे यह पूछा जाता था कि मैंने अपने बच्चों को मैंने क्या संस्कार दिए हैं। मैंने इसकी जिम्मेदारी तुम्हारी मां को दे रखी थी।
मैं तुम्हारी मां का हमेशा आभारी रहूंगा कि उन्होंने तुम्हें और रोहन को उम्दा संस्कार दिए साथ ही साथ साधारण और सामान्य जीवन जीना सिखाया। मुझे याद है जब मैं तुम्हें और रोहन को कार से स्कूल भेजा जाना चाहा। तब हमारे पास बहुत पैसे थे, लेकिन तुम्हारी मां ने कहा कि तुम लोगों को अपने सहपाठियों के साथ ऑटोरिक्शा से स्कूल जाना चाहिए। प्राय:तुम कहती थी कि हमारे घर में टीवी क्यों नहीं है? तुम्हारी मां ने पहले ही फैसला लिया था कि हमारे घर में टीवी नहीं होना चाहिए ताकि तुम लोगों की पढ़ाई पर कोई असर न पड़े।
टेक केयर माई चाइल्ड, आपका प्यारा अप्पा