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Mughal Rule: मजबूत बाबर, क्रूर औरंगजेब से कमजोर बहादुर शाह तक, क्या रहा मुगलों का इतिहास, कैसे ढहा किला? जानें

Tue, 04 Mar 2025 07:59 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Tue, 04 Mar 2025 07:59 PM IST
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सार
भारत में मुगल शासन का उद्गम कैसे हुआ? मुगलकाल में भारत में कितने शासक हुए? सबकी खासियतें और नाकामी किन-किन क्षेत्रों में रहीं? मुगलकाल के सबसे सफल शासक कौन रहे? इसके अलावा मुगल शासन का पतन कहां से शुरू हुआ? उसके आखिरी कुछ शासकों का भारत में क्या हाल हुआ? इसके अलावा मुगल शासन का अंत किस तरह हुआ? आइये जानते हैं...
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Mughal Rule in India detailed From Babar to Aurangzeb and Bahadu Shah Zafar how Fall of An empire happened
मुगलों का इतिहास। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत में इस वक्त औरंगजेब को लेकर चर्चाएं जारी हैं। वजह है महाराष्ट्र में समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता अबु आजमी का बयान, जिसमें उन्होंने मुगल सल्तनत के शासक औरंगजेब को लेकर सकारात्मक बयान दिए हैं। उनके इन बयानों पर महाराष्ट्र के सत्तासीन महायुति गठबंधन से लेकर विपक्ष की अहम पार्टी शिवसेना-यूबीटी तक ने निशाना साधा है और आजमी पर कार्रवाई की मांग की है। 


गौर करने वाली बात यह है कि औरंगजेब या किसी और मुगल शासक को लेकर इस तरह की बहस पहली बार नहीं हुई है। जहां एक तरफ इतिहासकार भारत में मुगल अक्रांताओं के क्रूर शासन का कई किताबों, रिसर्च और लेखों में जिक्र कर चुके हैं, वहीं कुछ ने मुगल शासन को बुरे और अच्छे दोनों प्रभावों को चिह्नित किया है। 

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत में मुगल शासन का उदय कैसे हुआ? मुगलकाल में भारत में कितने शासक हुए? सबकी खासियतें और नाकामी किन-किन क्षेत्रों में रहीं? मुगलकाल के सबसे सफल शासक कौन रहे? इसके अलावा मुगल शासन का पतन कहां से शुरू हुआ? उसके आखिरी कुछ शासकों का भारत में क्या हाल हुआ? इसके अलावा मुगल शासन का अंत किस तरह हुआ? आइये जानते हैं...

कहां से शुरू हुआ मुगल शासन?
मुगल साम्राज्य को दुनिया के कुछ सबसे अहम और ताकतवर शासनों में से माना जाता है। इसकी शुरुआत 16वीं सदी में हुई और इसका पतन 19वीं सदी के मध्य में हो गया। इतिहासकारों के मुताबिक, मुगल अक्रांताओं ने भारत में जबरदस्त तबाही मचाई। फिर चाहे वह धार्मिक स्तर पर हो, आर्थिक स्तर पर हो या सामाजिक स्तर पर। हालांकि, भारत में राजनीतिक, सांस्कृतिक और शासन से जुड़ी व्यवस्थाओं में भी मुगलों की छाप आज भी मिलती है। 

मुगलों के शासन को मोटे-मोटे स्तर पर तीन अलग-अलग कड़ियों में बांटा जा सकता है। यह हैं- 
  1. भारत में मुगलकाल की शुरुआत। 
  2. मुगल शासन का स्वर्णिमकाल, और
  3. मुगलों का पतन

1. भारत मुगलकाल की शुरुआत


कहां से आए मुगल, भारत में कैसे शासन स्थापित किया?

(i). बाबर (1526-1530)

मुगल साम्राज्य की शुरुआत जहीरुद्दीन बाबर (1483-1530) के उदय के साथ हुई। मुगल असल में मध्य एशिया में विजयी हासिल करने वाले तुर्क शासक तैमूर लंग और मंगोल शासक चंगेज खान के वंशज हैं। मुगलों का उद्गम आज के समय के उज्बेकिस्तान और अफगानिस्तान में माना जाता है। उस दौर में मुगलों की असली पहचान 'गुरकानियां वंश' के तौर पर होती थी। बाद में ब्रिटिश शासकों ने इतिहास में उन्हें मुगल कहा। 

बताया जाता है कि मुगलकाल की स्थापना करने वाला बाबर 12 साल की उम्र में ही उज्बेकिस्तान के एक शहर फेरगाना का शासक बन गया था। यानी एक छोटी सी उम्र में ही उसने युद्ध से जुड़े अहम कौशल और सफलताएं हासिल कर लीं। बाबर 1526 में भारत आया। उसका मुख्य मकसद भारत के हिस्सों पर शासन करना और अपने वंश को स्थापित करना था। भारत पहुंचने के साथ ही उसका पहला मुकाबला दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इब्राहिम लोधी से हुआ। इसे पानीपत का युद्ध कहा गया। बाबर ने इस युद्ध में जीत हासिल की और दिल्ली पर कब्जा कर लिया। इसे भारत में मुगलकाल की शुरुआत और दिल्ली सल्तनत के अंत के तौर पर जाना जाता है। इस युद्ध के बाद उत्तर भारत में मुगल मजबूत ताकत बनकर उभरे। 

बाबर ने लोधी वंश पर जीत हासिल करने के बाद अपना साम्राज्य दिल्ली से लेकर आगरा तक मजबूत किया। हालांकि, बाबर का शासन महज चार साल का ही रहा। मुगल साम्राज्य की नींव रखने के बाद 1530 में उनका निधन हो गया। 

(ii) हुमायूं (1530-1540, 1555-1556)
बाबर की मौत के बाद मुगल शासन की गद्दी आई हुमायूं के पास। यह वह समय था, जब मुगल भारत में अपना शासन स्थापित कर ही रहे थे और अपनी सेना को भी बढ़ा रहे थे। हालांकि, इतिहासकारों के मुताबिक, हुमायूं एक कमजोर सैन्य शासक थे। उसकी वजह यह थी कि वह युद्ध के बजाय काव्य-कविताओं के प्रति ज्यादा रुचि रखते थे। इसके चलते हुमायूं को अपने सौतेले भाई से भी चुनौतियां मिलीं। आखिरकार एक और अफगान शासक शेरशाह सूरी ने हुमायूं से भारत का शासन छीन लिया और 1540 से 1555 तक हुमायूं देश से बाहर रहे। 

हालांकि, हुमायूं ने भारत में मुगल शासन को दोबारा स्थापित करने की कोशिशें जारी रखीं। 1544 में ईरान के शाह से गठबंधन करने के बाद हुमायूं ने अपनी सेना को 1555 में वापस भारत पहुंचाया और लाहौर और दिल्ली पर हमला कर मुगल शासन को दोबारा स्थापित किया। इस बार वापसी के साथ हुमायूं ने भारत में एक नया सिस्टम लागू किया जिससे मुगलों को मजबूत बनाने के लिए ज्यादा टैक्स लागू किया जाने लगा। हालांकि, इससे पहले कि यह प्रणाली लागू हो पाती, हुमायूं की 1556 में अपने पुस्तकालय के बाहर सीढ़ियों से गिरकर मौत हो गई। 

2. मुगल शासन का स्वर्णिम काल


(iii) अकबर (1556-1605)
हुमायूं की मौत के बाद मुगल साम्राज्य की कमान 13 वर्षीय जलालुद्दीन अकबर के पास आई। छोटी उम्र के चलते हुमायूं के वफादार बैरम खान ने एक अभिभावक की तरह शासन चलाया। हालांकि, अकबर ने अपनी क्षमताओं और कौशल का जबरदस्त प्रदर्शन किया और हुमायूं की मौत के पांच साल बाद ही मुगल साम्राज्य का शासन अपने हाथ में ले लिया। 18 साल की उम्र में शासन हाथ में लेते वक्त अकबर के सामने काफी चिंताएं थीं।

अकबर का शासन जब शुरू हुआ तब मुगल साम्राज्य का क्षेत्र पंजाब और दिल्ली के आसपास कुछ छोटे इलाके में था। ऐसे में अकबर का पहला लक्ष्य अपने साम्राज्य की सीमाओं को भारत के बड़े इलाके में फैलाना रहा। लेकिन मुगल साम्राज्य के पास धन की काफी कमी थी, जिससे दूर-दराज के क्षेत्रों को कब्जे में लेना या कोई अभियान चलाना मुश्किल था। अकबर के सामने खुद को पिता हुमायूं से बेहतर सैन्य शासक के तौर पर स्थापित करने की भी चुनौती थी। भारत में हिंदू आबादी के बीच कुछ मुस्लिम शासकों के साथ साम्राज्य बढ़ाना अकबर के लिए बड़ी मुश्किल थी।
 

अकबर ने भारत में अपना शासन बढ़ाने के दौरान सिर्फ जमीनों पर ही कब्जा नहीं किया, बल्कि साम्राज्य को चलाने के तरीके भी बदले। इतिहासकारों के मुताबिक, अकबर ने दहसाला नाम की एक कर व्यवस्था बनाई, जिसके तहत जमींदार बने। यह स्थानीय कर इकट्ठा करने वाले लोग होते थे, जो बादशाह के लिए काम करते थे। अकबर ने यह पद अधिकतर हिंदुओं को दिए, ताकि अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले हिंदुओं को इस्लामिक शासक की नीतियों से सीधे तौर पर कोई समस्या न हो। 

इतना ही नहीं अकबर ने जिन क्षेत्रों में अपना शासन स्थापित किया, वहां हारे हुए शासकों से संधि कर ली और मुगल शासन के लिए कर इकट्ठा करने की शर्त के साथ उन शासकों का शासन ही बरकरार रहने दिया। इससे जो हिंदू शासक अकबर के खिलाफ खड़े हो सकते थे, उन्हें भी सहयोगी बना लिया गया। 

(iv) जहांगीर (1605-1627)
अकबर के निधन के बाद मुगल साम्राज्य की गद्दी जहांगीर के पास आई। जहांगीर ने अपने शासन के करीब 22 वर्षों में काफी कम क्षेत्र पर शासन बढ़ाया। इतिहासकारों के मुताबिक, जहांगीर नशीले पदार्थों और शराब की लत का शिकार हो गया था, जिसके चलते उसके शासन के दौरान मुगल साम्राज्य में दरारें दिखने लगीं। हालांकि, जहांगीर की पत्नी नूरजहां ने मुगल शासन को संभालने में मदद की। जहांगीर जब अपनी लत के चलते शासन में असमर्थ हो गए, तब नूरजहां ने सत्ता का पूरा भार अपने कंधों में ले लिया। यह लगभग पहली बार था, जब किसी बेगम ने अप्रत्यक्ष तौर पर मुगलों का शासन संभाला। नूरजहां की वजह से ही जहांगीर का शासनकाल शांति और समृद्धि में रहते हुए कटा। 

इतिहास को देखें तो सामने आता है कि जहांगीर की कला में जबरदस्त रुचि थी। विशेष रूप से चित्रकला और कविता में। उसका शासन शांतिपूर्ण था, लेकिन उसने राजपूतों और दक्खन के सुल्तानियों के साथ संघर्ष किए और अकबर द्वारा स्थापित बड़े साम्राज्य में कुछ छोटे क्षेत्रों को जोड़ा।

(v). शाहजहां (1628-1658) 
मुगल साम्राज्य को जहांगीर के नेतृत्व में मजबूती की कमी भी दिखी। दरअसल, 1627 में जहांगीर का जब निधन हुआ तो उनके कमजोर नेतृत्व की वजह से मुगल साम्राज्य का कोई वंशज तय नहीं था। ऐसे में जहांगीर के बेटों में एक जंग छिड़ गई। जहांगीर के तीसरे बेटे शाहजहां ने अपने छोटे भाई शहरयार मिर्जा को युद्ध में हराया। इतना ही नहीं शाहजहां ने अपने एक और भाई, जिसने गद्दी पर दावा ठोका, उसे मौत की सजा भी दी। शाहजहां ने इस तरह मुगल साम्राज्य पर अपना दावा मजबूत किया और 1628 में आगरा के किले में खुद को बादशाह घोषित किया। शाहजहां ने करीब 30 साल तक शासन किया। 
 
शाहजहां का शासनकाल मुख्यतौर पर भारत में मध्य एशियाई कला के विस्तार के समय के रूप में जाना जाता है। इसे वास्तुकला का स्वर्णिम काल भी कहा जाता है। शाहजहां ने लाल किले से लेकर ताजमहल जैसी धरोहरें बनाने के लिए पानी की तरह धन बहाया। उसने कई मस्जिदें, किले भी बनवाए जिनमें कुछ आज भी खड़े हैं। इतिहासकारों के मुताबिक, ताजमहल को बनाने के लिए शाहजहां ने वास्तुकला में निपुण कारीगरों और मजदूरों को बुलाया था। ऐसे 20 हजार लोगों को मध्य एशिया और ईरान से लाया गया। 1631 में शाहजहां की बेगम मुमताज महल के निधन के बाद मुगल शासक ने ताजमहल बनवाया था। 

हालांकि, शाहजहां के शासनकाल का भी खूनी इतिहास रहा है। उसने कई युद्ध छेड़े, जिनसे मुगल शासन का दायरा दक्खन के मुहाने तक पहुंच गया। उसने अहमदनगर सल्तनत पर कब्जा किया। 

(vi) औरंगजेब (1658-1707)
औरंगजेब का जन्म 1618 में हुआ। वह शाहजहां और मुमताज महल की तीसरी संतान था। औरंगजेब को दीन का काफी जानकार माना जाता था। इतना ही नहीं वह घुड़सवारी और सैन्य नेतृत्व में भी कुशल रहा। महज 16 साल की उम्र में ही शाहजहां ने उसे उज्बेक और ईरानियों के खिलाफ युद्ध करने भेज दिया। यहां अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के बाद औरंगजेब को गुजरात, मुल्तान और दक्खन के शासन के लिए भेजा। अपने शासनकाल में उसने खुद को मजबूत सैन्य शासक के तौर पर स्थापित किया।



चौंकाने वाली बात यह रही कि शाहजहां, जो कि बाद में बीमारी से पूरी तरह उबर चुके थे, उन्हें भी औरंगजेब के क्रूर शासन का सामना करना पड़ा। औरंगजेब ने शाहजहां को 1666 में उनकी मौत तक कैद में रखा। 

औरंगजेब के शासन में लागू हुईं कट्टरपंथी नीतियां
  • औरंगजेब मुगल शासकों में सबसे क्रूर माना जाता है। धार्मिक मसलों पर वह शरिया का सबसे बड़ा समर्थक रहा। हरबंस मुखिया की किताब- द मुगल्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, जब औरंगजेब को पता चला कि मुल्तान, थट्टा और वाराणसी में हिंदू ब्राह्मणों के शिक्षण संस्थान मुस्लिमों को पढ़ने के लिए आकर्षित करते हैं, तो उसने इन स्कूलों को तबाह करवाया। इतना ही नहीं उसने पूरे भारत में हिंदुओं के मंदिरों को भी गिरवाया। इतना ही नहीं औरंगजेब ने उन मुस्लिमों को भी सजा दी, जो इस्लामिक वेशभूषा में नहीं रहते थे। 
  • औरंगजेब जबरन धर्मांतरण का भी पक्षधर था। इसी कड़ी में औरंगजेब ने सूफी संत सरमद खशानी और सिखों के नौवें गुरु- गुरु तेग बहादुर को मौत की सजा दी। गुरु तेग बहादुर ने औरंगजेब की जबरन धर्मांतरण करने की बात को मानने से इनकार कर दिया था। 
  • औरंगजेब ने हिंदुओं और पारसियों के त्योहारों को भी रोक दिया। इनमें नवरोज भी शामिल था, जिसे औरंगजेब गैर-इस्लामिक त्योहार कहता था। इस दौरान इस्लाम न कबूलने वालों और इस्लाम की बातें न मानने वालों को औरंगजेब की तरफ से क्रूर सजा देने की भी कई घटनाओं का जिक्र मिलता है।   
  • औरंगजेब ने अपने शासन वाले क्षेत्र में लोगों पर जजिया कर लगाना शुरू कर दिया था। यह कर खासतौर पर गैर-मुस्लिमों पर लगाया जाता था। 

मराठा साम्राज्य को खत्म करने का ख्वाब रहा अधूरा
औरंगजेब के शासनकाल में मुगल साम्राज्य ने सबसे बड़े क्षेत्र पर राज कायम किया। हालांकि, पूरे भारत में कब्जा करने की औरंगजेब की राह में सबसे बड़ा रोड़ा मराठा साम्राज्य रहा, जिसने दक्खन में मुगलों को कई बार हराया और बीजापुर और गोलकोंडा से आगे नहीं बढ़ने दिया। मुगल-मराठा युद्ध का असर यह हुआ कि औरंगजेब का खजाना खाली होने लगा। खुद औरंगजेब कई दशकों के संघर्ष में सफल नहीं हो पाया। यहां तक कि शासन व्यवस्था भी चरमराने लगी। आखिरकार कई वर्षों तक राज करने के बाद 1707 में औरंगजेब दक्खन की धरती में ही दफन हुआ। 

3. मुगल साम्राज्य का पतन

(vii). बहादुर शाह (1707-1712) और अन्य
औरंगजेब के बाद शुरू हुआ मुगल साम्राज्य का पतन। दरअसल, औरंगजेब के बेटे बहादुर शाह-1 ने अपने पिता की धार्मिक नीतियों को वापस ले लिया और सुधारवादी प्रशासन शुरू किया। मुगलकाल में बहादुर शाह के कई प्रतिद्वंद्वियों ने इसे कमजोर नेतृत्व कहा। 1712 में जब बहादुर शाह का निधन हुआ तब मुगल साम्राज्य में उथल-पुथल मच गई। सात साल तक मुगल शासन में गद्दी को लेकर जंग चलती रही। 


 

(viii). मोहम्मद शाह (1719-1748)
आखिरकार 1719 में मोहम्मद शाह ने सत्ता हासिल की। हालांकि, 1748 तक चले उसके शासन में मुगल साम्राज्य बिखरने लगा। मध्य भारत के अधिकतर क्षेत्र में मराठा साम्राज्य फिर से स्थापित हो गया। 1739 में ईरान के शासक नादिर शाह के हमले में दिल्ली को लूटा गया और इससे मुगल शासकों की ताकत और कमजोर हो गई। मोहम्मद शाह का शासन खत्म होने के बाद अगले 11 वर्षों तक आंतरिक राजनीति और संघर्षों की वजह से बिखरे हुए मुगल साम्राज्य को कोई शासक नहीं मिला। 

(ix). शाह आलम-II (1759-1806) और अन्य
मुगल शासक शाह आलम ने गद्दी संभालने के बाद मुगलों के पतन को रोकने की कोशिश की। हालांकि, तब तक मराठा साम्राज्य दिल्ली के करीब पहुंच चुका था। दूसरी तरफ अफगानों ने भी दिल्ली पर हमला किया। इसके चलते 1761 में मराठों और अहमद शाह दुर्रानी के नेतृत्व में अफगानों के बीच पानीपत का तीसरा युद्ध हुआ। इसमें अफगान विजयी रहे। यह समय भारत के लिए काफी अहम रहा, क्योंकि शाह आलम द्वितीय ने इसी दौरान ब्रिटिश साम्राज्य से शरण मांग ली। यह मौका अंग्रेजी शासन के भारत में कदम जमाने से जोड़कर भी देखा जाता है। 

1771 में मराठों ने रोहिल्लाओं को हराकर दिल्ली पर शासन कायम कर लिया। हालांकि, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में राज करने के लिए मुगलों को सुरक्षा प्रदान की और मराठों से युद्ध किया। इस दौरान ब्रिटिश शासन ने बंगाल-बिहार पर कब्जा किया और स्थानीय शासनों को एक के बाद एक उखाड़ फेंका। 1857 आते-आते मुगलों के जरिए ब्रिटिश सरकार भारत के बड़े हिस्से को नियंत्रित कर रही थी। आखिरकार 1857 में ही भारतीय सिपाहियों के विद्रोह (सेपॉय म्यूटिनी) को कुचलने के बाद ब्रिटिशों ने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को गुलाम कर दिया और साम्राज्य का अंत किया, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना हुई। 
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