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इंसानी जिंदगी लील रही जलवायु, गर्म हवा ने भारतीयों को बनाया सबसे ज्यादा शिकार

Thu, 29 Nov 2018 12:38 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 29 Nov 2018 12:38 PM IST
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more people at heat wave risk india at higher risk says report
Heat waves

जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में भारत अव्वल है। महज चार सालों में यानि 2012 से 16 के बीच इसने भारत के लगभग हर घर को प्रभावित किया है। यह आंकड़ा लगभग 40 मिलियन है। हीट वेव से कम हो रहे काम के घंटों का खुलासा विश्व की 27 शैक्षिक संस्थान, यूनाइटेड नेशंस और सरकारी संस्थानों ने किया है। 

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इस रिपोर्ट में हीट वेव्स से भारत पर पड़ रहे खतरों खासकर स्वास्थ्य पर पड़ रहे प्रभावों का खुलासा किया गया है। साथ ही सरकार से इसके लिए तत्काल कार्रवाई की मांग भी की गई है।
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रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस तरह से भारत में जलवायु परिवर्तन हो रहा है यह भारत के लिए खतरनाक है। 1901 से 2007 तक भारत के तापमान में 0.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 21 वीं शताब्दी तक उत्तर, सेंट्रल और पश्चिमी भारत में 2.2 से 5.5 डिग्री की बढ़ोतरी हो सकती है। 
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गलोबल वार्मिंग से बढ़ती बीमारियां

 हीट वेव्स हर वर्ष हर व्यक्ति को 1.4 दिन प्रभावित करता है। बढ़ते तापमान की वजह से हीट स्ट्रेस और हीट स्ट्रोक के मामलों में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है जिससे हार्ट अटैक, किडनी में परेशानी और डिहाईड्रेशन जैसी शिकायतें बढ़ गई हैं। जबकि डेंगू बुखार, त्वचा पर इसका प्रभाव बहुत तेजी से पड़ रहा है। बदलते जलवायु से सबसे अधिक बुजुर्ग और बच्चे प्रभावित हो रहे हैं। 
2015 में प्रदूषण की वजह से असमय मृत्यु 2.9 मिलियन दर्ज की गई है। अगर वैश्विक स्तर पर देखें तो कोयले की वजह से करीब 16 फीसदी लोग प्रदूषण की वजह से मौत के मुंह में समा गए हैं। 

यही नहीं इससे लोगों की मौत भी अधिक हुई है। अगर मृत्युदर की बात करें तो 2009 की तुलना में 2010 में सिर्फ अहमदाबात में 43 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। 

चार करोड़ लोगों ने किया हीट स्ट्रोक्स का सामना

यही नहीं 2017 में, 157 मिलियन अधिक हीट  एक्सपोजर घटनाएं हुईं, जो 2016 की तुलना में 18 मिलियन अधिक हैं। दुनिया की तुलना में यदि भारत की बात करें तो 2012 की तुलना में भारत में 2016 में 40 मिलियन अतिरिक्त हीट स्ट्रोक से लोगों का सामना हुआ है। जिसकी वजह से भारत ने 2017 में लगभग 75000 मिलियन काम के घंटे को खाना पड़ा। यदि इसकी तुलना 2000 से करें तो यह 43000 मिलियन घंटे का रहा है। जबकि दो दशकों में यह 30,000 मिलियन  घंटे बढ़ा है।


जलवायु परिवर्तन के पड़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत सरकार और नीति निर्माताओं को युद्ध स्तर पर तैयारी करनी होगी। सड़कों पर पैदल और साइकिल पर चलने वालों के लिए विशेष व्यवस्था करनी होगी। शहरी स्तर पर सड़क के यातायात और गाड़ियों को कम करने के लिए काम करना होगा। 

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