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मनी लॉन्ड्रिंग मामला: विरासत की संपत्ति क्या ईडी कर सकता है अटैच? इस पर विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

Tue, 12 Oct 2021 06:14 AM IST
योगेश साहू एजेंसी, नई दिल्ली।
एजेंसी, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Tue, 12 Oct 2021 06:14 AM IST
सार

इस मामले में आरोपियों ने सरकारी कंपनी मैसूर सेल्स इंटरनेशनल लि. के साथ 50 हजार मीट्रिक टन लोहे के अयस्क की सप्लाई के दो समझौते किए थे। इनकी एवज में उनके खाते में 1.15 करोड़ व 1 करोड़ एडवांस दिए गए। वह अयस्क सप्लाई नहीं कर पाए, जिससे कंपनी को नुकसान हुआ।

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Money Laundering Case: Can ED Attach Legacy Property, Supreme Court will consider this
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ani

विस्तार

क्या प्रवर्तन निदेशालय को धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति की विरासत की संपत्ति अटैच करने का अधिकार है? क्या इस संपत्ति को अपराध से हासिल लाभ माना जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट इन कानूनी विषय पर विचार करने जा रही है। धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत होने वाली इस कार्रवाई पर कर्नाटक हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है।

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कर्नाटक हाईकोर्ट ने मैसूर जिले के दो आरोपियों पर की जा रही ईडी की कार्रवाई रद्द कर दी थी। उसने विरासत की संपत्ति पर ईडी की कार्रवाई को गलत बताया था। उसकी ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कहा कि हाईकोर्ट ने दो आरोपियों में से एक पर कार्रवाई रद कर दी थी क्योंकि उसकी मौत हो चुकी है। दूसरे पर कार्रवाई को गलत बताते हुए रद्द किया गया। जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस सीटी रविकुमार संबंधित आरोपियों को नोटिस देकर चार हफ्ते में जवाब भी मांगा है। 
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यह है मामला 
आरोपियों ने सरकारी कंपनी मैसूर सेल्स इंटरनेशनल लि. के साथ 50 हजार मीट्रिक टन लोहे के अयस्क की सप्लाई के दो समझौते किए थे। इनकी एवज में उनके खाते में 1.15 करोड़ व 1 करोड़ एडवांस दिए गए। वह अयस्क सप्लाई नहीं कर पाए, जिससे कंपनी को नुकसान हुआ। पहले आरोपी ने संपत्ति गिफ्ट डीड में बेटी व पत्नी के नाम कर दी। उनके खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज हुआ। जांच ईडी के पास गई तो उसने संपत्ति अटैच कर दी।

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डिजिटल रूप में दस्तावेज दें विधि सेवा प्राधिकरण

सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमों की सुनवाई में न्याय मित्रों व वकीलों की सहूलियत और दस्तावेजों के बेहतर रखरखाव के लिए राज्य विधि सेवा प्राधिकरणों से कहा है कि वे मांगे जाने पर मामले से जुड़े सभी दस्तावेज डिजिटल प्रारूप में भेजें। जस्टिस उदय उमेश ललित और जस्टिस एस रविंद्र भट ने यह निर्देश ऐसे मामले में दिए, जहां एक न्याय मित्र को राजस्थान के प्राधिकरण ने आपराधिक मामले में दस्तावेज और गवाहों के बयान मुहैया नहीं करवाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अक्सर इसी प्रकार से अधूरे दस्तावेज सौंपे जा रहे हैं। कानूनी मदद के मामलों में बेहतर सेवा देने के लिए यह आवश्यक होते हैं। अगर प्राधिकरण इन्हें डिजिटल प्रारूप में भेजेगा तो वकीलों और न्याय मित्रों को मदद मिलेगी।

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