'धन काला या सफेद नहीं होता, सिर्फ हमारा मन काला होता है'
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आजकल देश में काला धन, काला धन बहुत चल रहा है। ये काला धन आखिर होता क्या है? सभी नोट तो काली स्याही से ही बनते हैं। सफेद स्याही से कौन सा धन बन रहा है? दरअसल धन काला या सफेद नहीं होता, काला होता है हमारा मन। मन को सफेद रखने की जरूरत है।
ये बातें जगद्गुरु शंकराचार्य श्रीश्री राजराजेश्वराश्रम ने अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के पंचायत भवन सभागार में पंडित मदन मोहन मालवीय की जयंती पर आयोजित समारोह में कही। शंकराचार्य यहां बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।
समारोह में शंकराचार्य ने कहा कि, ‘नोटबंदी सही है या गलत.. यह मैं नहीं जानता। हम तो संन्यासी हैं, हमें इससे क्या। लेकिन इतना जरूर है कि नोटबंदी के बाद से दक्षिणा बंद हो गई है।’ उनकी इस बात से हॉल में हंसी के ठहाके गूंज उठे।
नेट, मोबाइल, ई-मेल के जरिए समाज में मानसिक विकृति एकत्र हो रही है
इसके बाद मुद्दे पर गंभीर होते हुए उन्होंने कहा ‘कैशलेस होने की बात कही जा रही है। ई ईकोनॉमी तो हो सकती है, लेकिन क्या ई मिल्क, ई बटर, ई फूड हो सकता है?’ उन्होंने कहा, ‘हम आधुनिकता के नाम पर नेट, मोबाइल, ई-मेल के जरिए समाज में मानसिक विकृति एकत्र कर रहे हैं।’
समाज से गायब हो रहे संस्कार पर शंकराचार्य बोले कि ब्राह्मण समाज का मस्तिष्क होता है। वह समाज को संस्कार देता है। अगर आज समाज और देश से संस्कार समाप्त हो रहे हैं तो यह ब्राह्मण समाज की कमी है।
ब्राह्मण अपना कर्तव्य भूल रहे हैं। ब्राह्मण को तप करना होगा। तप का अर्थ है बौद्धिक कष्ट सहना। इसके बाद ही तेज आता है। ब्राह्मण का बल ही श्रेष्ठ बल है। पूरी दुनिया में संस्कार सिर्फ भारत में है। इसे पूरे विश्व में विस्तार देने के लिए ब्राह्मण समाज को आगे आना होगा।